हिंदू भारत, मुस्लिम भारत

क्या भारत में दो संवेदना-क्षेत्र बन चुके हैं:हिंदू संवेदना क्षेत्र और मुस्लिम संवेदना-क्षेत्र? क्या यह नाटकीय वक्तव्य है,या ऐसी आशंका जिसे हकीकत बनते देर नहीं लगेगी और  जिसे भारत के राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी भी स्वीकार नहीं करना चाहते.उनका कहना है कि भारत जैसे विशाल देश के क्षेत्रफल और जनसंख्या के लिहाज से अटाली,गाज़ियाबाद,शामली,मुज़फ्फरनगर,लखनऊ,जहानाबाद,नागौर,छीपागढ़,जैसी घटनाएं नगण्य हैं और इनसे पूरे देश के बारे में कोई भी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता.लेकिन वे भूल रहे हैं कि टेलीविज़न और इंटरनेट के इस वक्त में कोई भी घटना,कितनी ही छोटी क्यों न हो,स्थानीय नहीं रह जाती.वह घटित की जाती है एक सीमित, स्थानीय स्तर पर लेकिन उसका लक्ष्य वह व्यापक जनसमूह है जो भौतिक रूप से बिखरा हुआ और उस घटना स्थल से दूर है, यहाँ तक कि अमरीका और ऑस्ट्रेलिया में.

हिंसक संवेदना के प्रशिक्षण, गठन और गोलबंदी के लिए इंटरनेट कितना कारगर है,यह समझने के लिए अक्सर ‘इस्लामिक स्टेट’के भर्ती अभियान का हवाला दिया जाता है.लेकिन भारत में मुस्लिम विरोधी हिंसक मानस के गठन में इस माध्यम के उपयोग को ध्यान से नहीं देखा गया है.यह प्रचार किसी एक संगठन के माध्यम से नहीं होता,प्रायः अनाम और अनौपचारिक नेटवर्क के जरिए नकली पतों से किया जाता है.इसके दो फ़ायदे हैं:किसी एक संगठन को चिह्नित करना और जिम्मेदार ठहराना असंभव हो जाता है,दूसरे मुसलमान और अल्पसंख्यक समूह भी मानने को बाध्य होते हैं कि ‘अराजनीतिक’,‘सामान्य’ हिंदू इस प्रचार में शामिल हैं. उदाहरण के लिए,फेसबुक और सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से इस तरह की तसवीरें प्रसारित होती रहती हैं जिनमें तिरंगे झंडे के ऊपर रखकर दाढ़ीवाले मर्द गाय काट रहे हैं. गौर से देखने पर मालूम हो जाएगा कि यह फोटोशॉप से किया गया है लेकिन ज़्यादातर लोग यह नहीं समझते.इस घृणा-अभियान के स्रोत के अनिश्चय के कारण मुसलमान हमेशा असुरक्षित महसूस करते हैं क्योंकि उन्हें नहीं मालूम कि इसका दायरा कितना बड़ा है,यह सब क्या व्यापक हिंदू-सहमति से हो रहा है.इस तरह आम हिंदू इस अभियान का सदस्य बन जाता है और मुसलमानों के लिए हिंसा का संभावित स्रोत भी.

हरियाणा के गाँव अटाली से बहुत दूर मधुबनी या कुन्नूर में वहाँ की मुस्लिम विरोधी हिंसा की व्याख्या किस प्रकार की जा रही है,इसका अध्ययन नहीं किया गया है.यह कतई मुमकिन है कि ऐसी ‘छोटी-छोटी’ घटनाओं के प्रति मुस्लिम ‘सजगता’ अधिक हो और ‘हिंदू’ प्रायः बेपरवाह हों.इन इलाकों से अलग रहने वाले हिंदू इन्हें ‘स्थानीय’,‘क्षणिक’ और नज़रअंदाज करने लायक मानते हैं,लेकिन प्रायः हिंसा से चिंतित नहीं होते,उसकी आलोचना की तो बात ही दूर है.इस हिंसा का कोई प्रभाव उनपर पड़ेगा, सोचना उनके लिए कठिन है. जबकि मुसलमान प्रत्येक ऐसी ‘छोटी’ घटना को नोट करते हैं, उनके पीछे की योजना को भांपना चाहते हैं और अपने लिए उसके आशय के बारे में विचार करते हैं.वे यह भी देखते हैं कि उनके इलाकाई हिंदू इन घटनाओं का वही अर्थ नहीं कर रहे जो वे कर रहे हैं.कुरेदने पर मालूम पड़ता है कि प्रायः हिंदू हिंसा का कारण मुसलमानों को ही मानते हैं भले ही अधिकतर,बल्कि लगभग सभी मामलों में हिंसा के शिकार मुसलमान हुए हों. ऐसी घटनाओं में दूसरी जगहों के हिंदुओं की सीधी भागीदारी नहीं होती लेकिन उन्हें एक प्रकार का सतोष उपलब्ध कराया जाता है कि उनकी ओर से मुसलमानों को सबक सिखाया गया है.बाबरी मस्जिद विध्वंस  के बाद कोई बड़ी मुस्लिम विरोधी राष्ट्रीय हिंदू गोलबंदी नहीं की गई है.गुजरात हो या बोडोलैंड या मुज़फ्फरनगर, किसी को भी एक केंद्रीकृत राष्ट्रीय अभियान का नतीजा बताना मुश्किल है जबकि सभी, हिंदू हों या मुसलमान, महसूस यह ज़रूर करते हैं.

तो क्या हिंदू भौगोलिक संदर्भ में सोचते हैं और मुसलमान सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भ में? हिंदू हिंसा को स्थानीयता तक सीमित करने पर जोर देता है और इसलिए हर हिंसा का कोई मूल स्थानीय कारण खोजता है:वह गाय काटना हो,लड़की को छेड़ना हो या धार्मिक स्थल का प्रदूषण हो.वह मानता नहीं कि हिंसा मुस्लिम-विरोधी घृणा के कारण हुई है, वह उसकी वक्ती, स्थानीय व्याख्या करता है.दिलचस्प यह है कि मुस्लिम-विरोधी  हिंसा को तो वह स्थान विशेष तक सीमित करता है लेकिन प्रत्येक स्थानीय मुस्लिम गतिविधि को एक व्यापक वैश्विक इस्लामी हुकूमत कायम करने की साजिश का हिस्सा मानता है. इसलिए अगर किसी गाँव के मुसलमान,अपनी बढ़ी समृद्धि के कारण मस्जिद बनाएँ या उसका विस्तार करें तो यह गाँव के स्वरुप को विकृत करने का प्रयास माना जाता है और उसे इस्लामी साजिश के केंद्र के रूप में खतरनाक माना जाता है.मस्जिद सिर्फ उपासना स्थल नहीं, मुसलमानों के सामूहिकीकरण का साधन है.चार मुसलमान जब एक साथ हों तो हिंसा की योजना बन रही होगी, यह आम हिंदू समझ है.मुसलमानों के घर मस्जिदों की तरह हथियारों के भंडार हैं,उन्हें हिंसा की स्वाभाविक ट्रेनिंग है,यह सब कुछ आप त्रिलोकपुरी से लेकर अटाली तक सुन सकते हैं. इस पर किसी हिंदू ने ठहर कर न सोचा कि अगर मुसलमान हथियार रखते हैं और उनका इस्तेमाल जानते हैं तो नेल्ली,भागलपुर से गुजरात, मुज़फ्फरनगर या अटाली तक वे ही क्यों मारे जाते हैं और विस्थापित होते हैं?

हिंदू यह कल्पना करते हैं कि हिंसा हर जगह दोतरफा होती है. इसलिए वे मानने को तैयार नहीं होते कि शिकार सिर्फ मुसलमान हुए हो सकते हैं. 2002 में कई मुस्लिम पहचान वाले स्मारकों की बर्बादी पर बड़ोदा में वास्तुकारों की बैठक बुलाई गई .जब उन सबके उद्धार का प्रस्ताव लाया गया तो एक वास्तुकार ने कहा कि यह एकपक्षीय है क्योंकि सूची में किसी हिंदू स्मारक का नाम नहीं है. यह कहने पर कि किसी हिंदू नामधारी स्मारक को नुक्सान नहीं पहुँचा है,वे किसी तरह मानने को राजी न हुए.ठीक यही रवैया रामशिला पूजन के समय पटने में हुई मुस्लिम विरोधी हिंसा के बाद पटना सिटी में क्षतिग्रस्त मस्जिदों का जायजा पेश करते वक्त हमने देखा जब हमपर पक्षपात का आरोप लगाया गया कि हमने किसी क्षतिग्रस्त मंदिर की तस्वीर जान बूझ कर नहीं ली है! सच यह था कि हिंसा में सिर्फ मस्जिदों को नुकसान पहुँचा था और कोइ मंदिर क्षतिग्रस्त हुआ ही नहीं था.लेकिन यह मनवाना लगभग असंभव था.

साम्प्रदायिक हिंसा भारत में प्रायः मुस्लिम विरोधी हिंसा है,साफ़-साफ़ नहीं कहा जाता,उसे हमेशा हिंदू-मुस्लिम द्वंद्व की तरह पेश किया जाता है.इसके चलते कभी इसके सही स्वरूप की पहचान हो ही नहीं पाती.दूसरी ओर, यह मान लेने पर कि समन्वित हिंदू पहचान जैसी कोई चीज़ नहीं क्योंकि हिंदू जाति-विभाजित हैं,किसी हिंदूवादी परियोजना के सफल होने की संभावना से ही इनकार कर दिया जाता है.

विगत तीन दशकों की पिछड़ी और दलित राजनीति अपना एक दौर पूरा कर चुकी है. उसने इन जातियों को राजनीतिक रूप से इतना प्रभावी बना दिया कि भारतीय जनता पार्टी तक उसे नज़रअंदाज नहीं कर सकती. लेकिन इसका अर्थ यही है कि संसदीय राजनीति की प्रतियोगिता में ये जातियाँ किसी एक दल के साथ खुद को बाँधने में लाभ नहीं देखतीं.यदि भाजपा उन्हें पर्याप्त संख्या में जगह दे तो उन्हें गुरेज नहीं क्योंकि इससे उनकी मोल तोल की ताकत बढ़ती है.बीस साल पहले का पिछड़ा-दलित-मुस्लिम गठजोड़ अब प्रायः अप्रासंगिक हो चुका है.दलित और पिछड़ा राजनीति अब व्यापक हिंदू राजनीति से तालमेल बैठाना बेहतर मानती है क्योंकि वोटरों की एकमुश्त संख्या वहाँ है.बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों ने भी अपना आक्रामक अस्मितावादी स्वर नीचा कर लिया है.जो सामाजिक न्यायवादी हैं वे भी मुसलमानों को संबोधित करते नहीं दीखना चाहते.बल्कि वे अपने पक्ष में मुसलमानों की सक्रियता भी नहीं चाहते. बनारस में जब ‘आम आदमी पार्टी’ की ओर मुसलमानों का उत्साह देखा गया तो उसके एक वरिष्ठ नेता उसकी मुखरता से चिंतित हो उठे. अब मुसलमानों के हितैषी भी उन्हें खामोश रहने की सलाह देते हैं.इस मामले में लालू प्रसाद एकमात्र अपवाद जान पड़ते हैं.

संसदीय राजनीति की प्रतियोगिता में उनकी संख्या के इस्तेमाल के बावजूद उनके विलोपन ने मुसलमानों को मुखरता के लिए मजलिस-ए-इत्तहादुल-मुसलमीन जैसे दलों की ओर धकेला है जो मुसलमानियत के इजहार में कोई शर्मिंदगी नहीं देखते.इसे मुसलमानों का संप्रदायीकरण कहा जाता है.उन्हें उपदेश दिया जाता है कि इनसे प्रभावित होना आत्मघाती है.यह भुलाते हुए कि आज़ादी के बाद से अब तक उन्होंने कभी अलग पहचान की राजनीति नहीं की और,जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी को छोड़ कर हिंदू-बहुल राजनीतिक दलों के साथ ही,वह चाहे कांग्रेस हो या समाजवादी या साम्यवादी या बाद के पिछड़ा और दलितवादी दल या आम आदमी पार्टी या एआईडीएमके,खुद को जोड़ा है.उन्होंने हमेशा साझा राजनीति में शिरकत की जबकि उनको वोट बैंक कह लांछित किया गया.क्या उन्नीस सौ सड़सठ, उन्नीस सौ सतहत्तर,उन्नीस सौ उनासी, आदि में उन्होंने आम ‘राष्ट्रीय’ रुझान से अलग रास्ता लिया?

भारतीय जनता पार्टी ने अब रणनीतिक तौर पर यह कहना छोड़ दिया है कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है.यह काम राष्ट्रीय स्वयमसेवक संघ और उसके अन्य घटक करते ही रहते हैं. इस श्रम विभाजन के अतिरिक्त यह समझ भी आम होती जाती है कि भारत तो हिंदू राष्ट्र है ही! जैसे उच्च जाति के लोग स्वाभावतः जातिनिरपेक्ष होते हैं,उसी तरह हिंदू धर्मनिरपेक्ष होते हैं.हिंदू राष्ट्रीकरण के तरीके अनेक हैं. राजस्थान में एक अधिकारी ने बताया कि आधिकारिक दौरे पर उन्हें सिर्फ निरामिष भोजन का भुगतान मिलता है आमिष भोजन का नहीं. स्कूलों या आँगनबाड़ी में अंडा देने के आदेश पर अधिकारी का तबादला खबर भी नहीं बनता. रक्षा बंधन का आह्वान केंद्र सरकार के मुखिया की ओर से सांस्कृतिक आह्वान मान लिया जाता है.योग या सूर्य नमस्कार को धर्म निरपेक्ष ठहराने के लिए पन्ने रेंज जाते है, यह भुलाते हुए कि बहस योग पर नहीं है बल्कि उस परियोजना पर है जो इसे सारे नागरिकों के लिए अनिवार्य करना चाहती है. केंद्रीय गृह मंत्री दीक्षांत अस्मारोह में छात्रों को माँ-पिता के चरण स्पर्श का उपदेश देते हैं, भूलते हुए(?)कि यह कोई सर्वमान्य परम्परा नहीं है जो इस भारतीय कहकर प्रचारित और सम्मानित किया जाए. इनसे ऐतराज को व्यापक राष्ट्रीय सांस्कृतिक पहचान के अहिंसक अभियान में विसंवादी स्वर बताया जाता है.प्रेमचंद की अस्सी साल पहले की बात किसी को याद नहीं आती कि साम्प्रदायिकता को असली रूप में निकलते लाज आती है,इसलिए वह संस्कृति की खाल ओढ़कर बाहर निकलती है. नागरिक अधिकारों के लिए पिछड़ों और दलितों को अपनी पहचान बार-बार बतानी होती है और मुसलमानों को अपना धर्म, इससे दोनों ही अनावश्यक रूप से जातिवादी और साम्प्रदायिक सिद्ध होते हैं जो कभी अपनी पहचान से मुक्त नहीं होना चाहते.

पिछले वर्ष पूर्ण बहुमत के साथ केन्द्रीय सत्ता पर आक्रामक हिंदुत्ववाद के कब्जे के बाद मुस्लिम समुदाय में बेचैनी बढ़ गई है. रक्तहीन मुस्लिम विरोधी हिंसा का विकेंद्रीकरण अब जाति और नातेदारी के परंपरागत नेटवर्क के माध्यम से किया जा रहा है. इससे संघ जैसा संगठन अदृश्य बना रहता है और सामुदायिक गर्व को उकसा कर हिंसा संगठित करता है. मुज़फ्फरनगर या अटाली की हिंसा जाट हिंसा है या हिंदू हिंसा,या दोनों? अब भारतीय संविधान को बदलने की जगह छोटे-छोटे अनौपचारिक हिंदू राष्ट्रों की संख्या बढ़ाने में हिन्दुत्ववादी राजनीति की दिलचस्पी है.वह मुसलमानों को एक चिर अस्थायित्व की असुरक्षा और व्यग्रता में डाल रही है,अलग मुस्लिम आबादियों का गठन कर रही है और उनके बीच अलंघ्य हिंदू बाधा पैदा कर रही है.अटाली के मुसलमानों ने अपनी लाचारी यों बताई कि सबसे निकटस्थ बड़ी मुस्लिम आबादी और उनके बीच छह हिंदू बहुल गाँव हैं. वे चाहकर भी इस दूरी को पारकर सुरक्षित उन तक नहीं पहुँच सकते.

नक्सलवादी नारे, ‘गांवों से शहरों को घेरो’ की जगह ‘मुसलमानों को हिन्दुओं से घेरो’ का नारा क्या अलग से लगाने की ज़रूरत है?

क्या हर जगह के हिंदू सजग रूप से इस अभियान में हिस्सा ले रहे हैं? उत्तर है, नहीं. लेकिन इसी से इस हिन्दुत्ववादी अभियान की सफलता का अंदाज किया जा सकता है:वह अब इस कदर सामूहिक अवचेतन में प्रवेश कर गया है या उसने हिंदू मन को यों अनुकूलित कर लिया है कि किसी बाह्य संगठन के बिना ही वह निरंतर सक्रियता को अपना धर्म मानता है.हिंदू मन से शायद ही किसी को ऐतराज हो लेकिन भारतीय समाज के लिए हिन्दुत्ववादी अवचेतन के गठन के आशय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है.

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