औसतपन के दिन

भारतीय फिल्म एवं टेलीविज़न संस्थान  के छात्रों की हड़ताल लम्बी खिंच रही है. उनका ऐतराज स्थान के अध्यक्ष पद पर ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किए जाने से है जो फिल्म और टेलीविज़न की दुनिया में औसत से भी नीचे दर्जे के माने जाते हैं.फिर उनकी किस योग्यता की बाध्यता थी कि वे उस स्थान पर बैठाए गए जिसके साथ मृणाल सेन, अडूर गोपालकृष्णन,श्याम बेनेगल,गिरीश कर्नाड, विनोद खन्ना सरीखे श्रेष्ठ निर्देशकों और अभिनेताओं का नाम जुड़ा है?एक अनुमान शासक दल से उनके जुड़ाव को लेकर लगाया जा रहा है. यह अनुमान मात्र नहीं है, संस्थान की शासी परिषद में भी सत्तधारी दल से जुड़े अनाम लोगों को जगह मिली है, जिन्हें फ़िल्मी या संस्कृति की दुनिया में कोई नहीं जानता. इन नियुक्तियों के प्रति छात्रों के विरोध को यह कह कर लांछित किया जा  रहा है कि वे उनका विरोध मात्र उनकी विचारधारा और शासक दल से उनके संबंध  को लेकर कर रहे हैं.लेकिन क्या ऐसा कहना उचित है?

यह पूरा संघर्ष श्रेष्ठता और औसतपन के बीच का है. छात्रों ने कहा कि इसके पहले विनोद खन्ना इस पद पर रह चुके हैं, लेकिन किसी ने उनके भारतीय जनता पार्टी से रिश्ते के चलते उनका विरोध नहीं किया था क्योंकि सिने जगत में अपने काम के कारण उनकी प्रतिष्ठा है. दूसरे शब्दों में उन्होंने यह पद अपनी पेशे से इतर योग्यता के कारण नहीं,बल्कि अपने पेशे में अपनी ख़ास जगह के चलते ही हासिल किया.

नवनियुक्त अध्यक्ष को यह असुविधाजनक प्रश्न पूछना ही पड़ेगा कि क्यों उनके हमपेशा उन्हें अपना नेता मानने को तैयार नहीं.फिल्म जगत से जिन्होंने छात्रों को समर्थन दिया है,वे अलग-अलग राजनीतिक विचारों के हैं.एक आरोप छात्रों पर यह लगाया गया है कि वे वामपंथी हैं या वामपंथियों के द्वारा भड़काए गए हैं. क्या संस्थान के सभी छात्र वामपंथी हैं?क्या उनका साथ देनेवाले फिल्म जगत के लोग वामपंथी हैं?यह आरोप छात्रों या फिल्मकारों की बुद्धि की स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं करता,प्रत्येक अभिव्यक्ति को एक षड्यन्त्र मानता है.इस प्रवृत्ति ने गुजर गई सरकार के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय में भी चार साला स्नातक कार्यक्रम के विरोध पर हमला किया था.सारे आलोचक शिक्षकों को वामपंथी कह कर उनकी आपत्ति को खारिज कर दिया गया था.याद है कि कांग्रेस के मंत्री ने पूछा था कि सुना है कि यह विरोध वामपंथियों द्वारा प्रेरित है! गोया कि किसी मुद्दे से वामपंथियों की सम्बद्धता अपने आप में उसे नज़रअंदाज कर देने का पर्याप्त कारण हो! विडंबना यह कि यह शंका उस कांग्रेस की थी जिसपर वामपंथी बुद्धिजीवियों को प्रश्रय देने का आरोप है. दूसरी विडंबना यह कि इस तरह प्रताप भानु मेहता, रामचन्द्र गुहा जैसे बौद्धिक भी या तो खुद वामपंथी हो गए या वाम-षड्यंत्र के बहकावे में आ गए!

दूसरा आरोप छात्रों पर अभिजनवाद का है.कहा जा रहा है कि छोटे परदे और तीसरे दर्जे की फिल्मों के एक कलाकार के प्रति उनका विरोध वस्तुतः उनके अभिजनवादी अहंकार से पैदा हुआ है.यह दिलचस्प है कि एक ही साथ वे वामपंथी और अभिजनवादी कहे जा रहे हैं.क्या श्रेष्ठता पर छात्रों का जोर एक अभिजात या वामपंथी जिद है?

माध्यम की अच्छी समझ और रचनात्मकता के बिना अच्छी फिल्म बनाना या अच्छा अभिनय संभव नहीं है.यह बात हर क्षेत्र पर लागू है.क्या मेरा शिक्षक वह हो सकता है जो मेरे ज्ञान के क्षेत्र में मुझसे भी कम समझ रखता हो? क्या किसी संस्था का नेतृत्व वह कर सकता है जिसका कद उसमें काम करने वालों से नीचा हो?क्या उसका वामपंथी होना या दक्षिणपंथी होना उसकी उस योग्यता का ठीक स्थानापन्न है?

किसी सत्ता के चरित्र की एक पहचान श्रेष्ठता के प्रति उसके नज़रिए से की जा सकती है. नेहरू की कांग्रेसी सरकार ने इसीलिए अलग-अलग पेशों और ज्ञान-क्षेत्रों में राजनीतिक झुकाव या वैचारिक वफादारी के मुकाबले श्रेष्ठता पर जोर दिया था. नेहरू पर भी वाम रुझान का आरोप है हालाँकि वामपंथी इसे लाकर स्वयं आश्वस्त नहीं हैं! अभी विसर्जित किए गए योजना आयोग को भी साम्यवादी गोत्र का माना जाता है. लेकिन राकेश अंकित  ने अपने शोधपूर्ण लेख में बताया है कि वास्तव में एक अमरीकी सोलोमन अब्रामोविच त्रोन,जो अमरीकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिकल्स के पूर्व निदेशक थे, आर्थिक मामलों में नेहरू के निजी सलाहकार थे और योजना आयोग की परिकल्पना का काफी कुछ श्रेय उन्हें है.

त्रोन की तरह अनेक नाम लिए जा सकते हैं जिन्हें नेहरू ने अपने राष्ट्र या राज्य निर्माण के काम में एकत्र और संगठित किया.शर्त थी उनकी अपने-अपने क्षेत्र में महारत और श्रेष्ठता.उनके राजनीतिक विचार एक हों,आवश्यक न था. वैचारिक मतभेद के बावजूद अगर वे एक-दूसरे का आदर कर पाते थे तो मात्र इसी श्रेष्ठता के कारण.नेहरू ने शायद यह अपने गुरू गांधी से सीखा हो जो महान हुए तो इस कारण कि  उनमें प्रतिभा और श्रेष्ठता की गज़ब की परख थी.इसी कारण उनके एक तरफ राजगोपालाचारी थे,तो दूसरी और नेहरू.मौलाना आज़ाद,सरोजिनी नायडू,विनोबा भावे या जयप्रकाश नारायण या नरेंद्र देव, सब गांधी के दल में हो सकते थे.इन सबमें विचारभिन्नता की कमी न थी लेकिन गांधी को इसे लेकर घबराहट या असुरक्षा नहीं थी.

क्या गोविन्द चन्द्र पाण्डेय का सम्मान वामपंथी दार्शनिक या विद्वान इसलिए न करें कि वे प्रायः दक्षिणपंथी थे?अगर हिंदी आलोचना से किसी को चुनना हो तो विष्णुकांत शास्त्री, जो घोर दक्षिणपंथी थे, किसी औसत प्रतिभा के श्रद्धालु की जगह विधर्मी नामवर सिंह को ही पसंद करते, यह निःसंकोच कहा जा सकता है. राम ने जब लक्ष्मण को रावण से शत्रुता के बावजूद सीखने को कहा तो उसके पांडित्य के कारण ही.

एक श्रेष्ठ नेता की पहचान उसकी टीम से की जा सकती है.वह कितना आत्म-आश्वस्त है और कितना डरा हुआ है, इसका पता इससे चलता है कि वह अपने साथ किसको रखता है.लेनिन की टीम के तो लगभग सभी प्रतिभावान थे,स्टालिन ने औसत दर्जे के लोगों को चुना.अपवादों के बावजूद यह कहा जा सकता है कि अमरीकी विश्वविद्यालय अगर सर्वश्रेष्ठ हैं तो इस कारण कि अपने परिसरों में उन्होंने अध्यापक के चयन में उसके राजनीतिक विचार को नहीं,ज्ञान-क्षेत्र में उसकी उपलब्धि को आधार बनाया.

संस्थाओं में प्रवेश के लिए राजनीतिक विचारशुद्धता जब पहली शर्त हो तो पतन का रास्ता खुल जाता है. पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के पतन का एक कारण श्रेष्ठता की जगह पार्टी-प्रतिबद्धता को वरीयता देना ही था.इसने वहां के शिक्षण-संस्थानों के ध्वंस को सुनिश्चित कर दिया.उसी तरह परिसरों पर छात्र संघों और कर्मचारी संघों की सहायता से नियंत्रण करके वाम दलों को अस्थायी सुरक्षा बोध हुआ हो लेकिन उसने ऐसी सार्वजनिक संस्कृति को जन्म दिया कि अब सांस्थानिक जीवन पर तृणमूल कांग्रेस के कब्जे के अभियान के विरोध का नैतिक आधार उसके पास नहीं रह गया लगता है.

भारत में आज़ादी के बाद से लम्बे समय तक कांग्रेस का शासन रहा.ध्यान दिया जाए तो मालूम होता है कि इस अवधि में वामपंथी, उदारमतावलंबी या दक्षिणपंथी,विविध प्रकार के लोगों के प्रवेश की संभावना हमेशा अधिक रही है.यह गुंजाइश भारतीय जनता पार्टी या वाम दलों के शासन में कांग्रेस के मुकाबले कहीं कम रहती है. इसका उन्हें फायदा हुआ या नुकसान? जो जैव विविधता के सिद्धांत से परिचित हैं उन्हें पता है कि विविधतापूर्ण पर्यावरण ही समृद्ध माना जाता है.

विविधता से घबराने का कारण अपनी श्रेष्ठता में पूरे विश्वास का न होना है.दूसरी बात यह भी है कि औसतपन में एक प्रकार की आक्रामकता देखी जाती है जो श्रेष्ठता से घृणा के कारण पैदा होती है, अपने हीनता बोध के कारण.इसलिए सत्ता हमेशा औसतपन को पसंद करती है क्योंकि वह उसकी रक्षा करने को तत्पर रहती है.

इस टिप्पणी को लिखे जाते समय राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति की बहाली की खबर मिली है.कहा जा रहा है कि उनकी योग्यता भी पुणे संस्थान के नवनियुक्त अध्यक्ष जैसी है.अखबार उन्हें ‘दूसरा युधिष्ठिर’ कह रहे हैं. क्या किसी कुलपति के ऐसे उपहास के लिए यह अवसर प्रदान किया जाना चाहिए था? क्या यह  राजस्थान विश्वविद्यालय के साथ अन्याय नहीं?यह प्रश्न राजस्थान सरकार को खुद से  करना होगा.दूसरा प्रश्न यह है कि एक विशेष प्रकार के दल के सत्तासीन होते ही औसतपन के दिन क्यों आ जाते हैं?तीसरा विचारणीय बिंदु यह है कि क्या कांग्रेस के पतन की शुरुआत श्रेष्ठ के ऊपर की जगह औसत को तरजीह देने से तो नहीं हुई? विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष के चयन और उसके भी पहले राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् के निदेशक के चुनाव में पहली चयन समिति के निर्णय को अस्वीकार करने जैसे उदाहरण तुरत याद आते हैं.औसत की चापलूसी और लॉबीबाजी का मुकाबला करने की इच्छा मात्र भी श्रेष्ठ के लिए शर्मनाक है, इसलिए उसके सामने उसकी पराजय निश्चित है.

औसतपन से साधारण का भ्रम न होना चाहिए. साधारण और श्रेष्ठ में परस्पर विरोध नहीं. लेकिन औसतपन के पर्यावरण में श्रेष्ठ का जीना असंभव है.भारत के संस्थानों में श्रेष्ठ के प्रति अगर तिसकार नहीं तो उदासीनता ज़रूर पाई जाती है.प्रशासक प्रायः श्रेष्ठ को यह अहसास दिलाते हैं कि वह संस्थान के लिए अनिवार्य नहीं.इसका खामियाजा तो संस्थान भुगतता है.जब यह विलाप किया जाता है कि भारत के विश्वविद्यालय दुनिया के श्रेष्ठतम विश्वविद्यालयों की सूची में कहीं नहीं, तो इस पर बात ही नहीं की जाती कि हमने लम्बे समय तक औसतपन की संस्कृति को प्रश्रय दिया है और वह श्रेष्ठता को जन्म नहीं दे सकती. पुणे के भारतीय फिल्म एवं टेलीविज़न संस्थान के छात्रों का  संघर्ष एक व्यापक चिंता से जुड़ा है. उनकी सफलता, असफलता तो उनके समर्थकों की  राजनीतिक शक्ति से जुड़ी है लेकिन उनकी माँग एक सार्थक बहस को जन्म दे रही है और  इसके लिए  हमें उनका शुक्रगुजार होना चाहिए.

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