हिंदू राष्ट्र बरास्ते गोरक्षा

पाकिस्तान में कोई भी अल्पसंख्यक सुरक्षित महसूस नहीं करता.यह बात पहले कही जाती थी. धीरे-धीरे हालात ऐसे हुए कि अब कहा जाता है कि वहाँ  मुसलमान भी सुरक्षित नहीं.अल्पसंख्यकों की असुरक्षा का एक बड़ा स्रोत पाकिस्तान का धार्मिक-दूषण संबंधी कानून है.मूलतः यह कानून अविभाजित भारत में अंग्रजों के द्वारा लाया लागू किया गया था. इस क़ानून में किसी भी धर्म से जुड़े पवित्र स्थल, या पवित्र मानी जाने वाली वस्तु, आदि की क्षति करने या उसका अपमान करने पर दंड का प्रावधान है. यह धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता. यह भारत में आज भी लागू है. भारत में अक्सर इसका उपयोग लेखकों या कलाकारों के खिलाफ किया गया है.आरोप लगानेवालों में हिंदू,मुस्लिम, ईसाई नामों पर बने संगठन और उनकी इज्जत की हिफाजत के लिए परेशान लोग हैं .

लेकिन पाकिस्तान में इसमें वक्त के साथ तब्दीली  की गई.पहले तो यह जोड़ा गया कि अगर कोई पवित्र कुरआन की तौहीन करता है, तो दंड का भागी होगा और बाद में जोड़ दिया गया कि अगर कोई मुहम्मद साहब की शान में गुस्ताखी करता है तो उसे मौत की सज़ा तक दी जा सकती है.

कुरआन या मुहम्मद साहब का अपमान करने के आरोप में पाकिस्तान में ईसाइयों, हिन्दुओं, अहमदियों और वैसे मुस्लिम समूहों के लोगों को निशाना बनाया गया है जो पाकिस्तान के मुख्य ताकतवर समूह से इतर हैं.प्रायः इसका इस्तेमाल ईसाइयों के खिलाफ किया गया है.इसका इस्तेमाल सुविधानुसार किया जाता है.लेकिन हम यह जानते हैं कि इस क़ानून के तहत सबसे आसानी से किसी पर आरोप लगाया जा सकता है.पाकिस्तान के हालात ऐसे हैं कि शायद ही कोई अदालत इस आरोप को निरस्त करे.

धार्मिक-दूषण के नाम पर कानून सजा दे, उसके पहले खुद को सच्चा मुसलमान कहने वाला खुद ही यह काम कर डालता है.हाल का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण पाकिस्तान के राजनेता सलमान तासीर की ह्त्या का है.तासीर इस कानूनी प्रावधान के खिलाफ थे. न सिर्फ यह, बल्कि वे इसके बहाने  अल्पसंख्यकों पर आक्रमण के भी खिलाफ थे.उनके इस जुर्म में मुमताज कादरी ने उनकी ह्त्या कर दी. कादरी को पाकिस्तान में  इस्लामपंथी नायक की तरह पूजते हैं. हालांकि पाकिस्तान की सबसे बड़ी अदालत ने उसकी सजा बरक़रार रखी है,लेकिन उसे यह दी जा सकेगी,यह लगभग नामुमकिन लगता है.उसके नाम पर जुलूस निकलते हैं,उसकी पूजा होती है और वह खुद अब जेल के भीतर धार्मिक उपदेश देता है.

मुमताज कादरी को उसी तरह राष्ट्रीय नायक माना जाए जैसे इल्म दीन को माना जाता है,यह मांग उठ रही है.इल्म दीन वह शख्स था जिसने ‘रंगीला रसूल’ के प्रकाशक महाशय राजपाल का क़त्ल किया था क्योंकि वह रसूल का अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकता था.यह बात आज से पचासी साल साल पहले की है:ब्रिटिश भारत की.इल्म दीन को इसके लिए फाँसी की सजा सुनाई गई.उसकी वकालत करने बंबई से मोहम्मद अली जिन्ना आए और बाद में उसकी आख़िरी रस्म के वक्त शायर इकबाल ने तक़रीर भी की.

यह एक विडम्बनापूर्ण तथ्य है कि सलमान तासीर के पिता, शायर मोहम्मद दीन तासीर ने इल्म दीन के लिए चंदा इकट्ठा किया था.उन्हें क्या पता रहा होगा कि बरसों बाद उनके बेटे के कातिल को उसी इल्म दीन का दर्जा दिया जाएगा जिसके पक्ष में वे जिन्ना और इकबाल की तरह खड़े थे.

पाकिस्तान के धर्मनिरपेक्ष और उदार मुसलमान इस क़ानून को रद्द करने की माँग लगातार कर रहे हैं.ऐसा करना पाकिस्तान में कितना खतरनाक है, इसका अंदाज किया जा सकता है.लेकिन वहाँ धर्मनिरपेक्ष जमात ने यह माँग छोड़ी नहीं है. वह अपने देश के बहुमत लोकप्रिय विचार के आगे झुक नहीं गई है.

पाकिस्तान में जो कुरआन या मोहम्मद साहब का अपमान है, अब भारत में धीरे-धीरे गोहत्या होती जा रही है.गोहत्या नहीं,उसके शक पर भी आपकी पिटाई हो सकती है और आपको मार डाला जा सकता है.जैसे कुरआन या मोहम्मद साहब का अपमान सबसे बड़ा जुर्म मान लिया गया है, जिसकी माफी नहीं है, वैसे ही गोहत्या या गोमांस भक्षण को सबसे बड़ा अपराध मान लिया गया है.और यह तब जब भारत हिंदू राष्ट्र नहीं है.अनेक राज्यों में इसे लेकर क़ानून हैं और अब एक एक बाद एक अदालतें खुद इसके आगे सर झुका रही हैं.

पाकिस्तान में जो चीज़ खुलेआम है और बेधड़क कही जाती है,भारत में लुका-छिपाकर एक पाखंड के परदे में.इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान में यह चूँकि इस्लाम विरोधी है,पाप मान लिया गया है. यह अलग बात है कि उदार मुसलमान कुरआन से उद्धरण निकाल कर यह समझाने की कोशिश करते हैं कि वहां कहा गया है कि जो दूषण में लिप्त हैं,उनकी ओर से निगाह फेर लो. यानी उन्हें महत्त्व न दो. कुरान के इस संदेश की कोई सुनवाई है, इसका प्रमाण पाकिस्तान ने नहीं दिया है.

लेकिन खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले भारत ने गोमांस को लेकर हिंदू उच्चवर्ण के एक विशेष हिस्से की मान्यता को सम्पूर्ण भारत पर थोपने के तरीके निकाल लिए हैं. बस!यहाँ हिंदू धर्म का नाम जितना लिया जाता है, उससे ज्यादा गाय के कृषि जीवन में महत्त्व, उसके दूध देने,उसके गोबर की कीमत, आदि की दुहाई दी जाती है.यह कहने की ईमानदारी या हिम्मत या कहें बेशर्मी अब तक नहीं आई है कि चूँकि ताकतवर और बहुसंख्यक हिंदू गाय को पवित्र मानते हैं,बाकी धर्मावालम्बियों को भी उनके मुताबिक़ ही चलना होगा.

पाकिस्तान में जो हो रहा है, उसे ठीक ही इस्लामी कट्टरपन और क्रूरता कहा जाता है, लेकिन भारत में जो हो रहा है, उसे वैज्ञानिक,पर्यावरणवादी, जीव दया के तर्कों से ढँकने की कोशिश की जाती है.दुर्भाग्य कि इस काम में सबसे ऊँची अदालत ने भी हाथ बँटाया है.

गाय की रक्षा के नाम पर ह्त्या करने वाले दयालुता के अवतार और धर्मरक्षक घोषित किए जाते हैं और उन्हें हाथ लगाने से क़ानून भी डरता है.पाकिस्तान के कुरआन रक्षकों की तरह ही भारत में गोरक्षकों की छोटी- बड़ी सेनाएं कायम हो गई हैं. वे मुस्लिम बस्तियों पर छापा मारती हैं, मवेशियों का व्यापार करने वालों पर हमले करती हैं और कई मामलों में ह्त्या भी कर डालती हैं.कुछ बरस पहले हरियाणा के झज्झर में यही आरोप लगाकर मुसलमान नहीं,दलित मार डाले गए थे.

सबसे ताजा घटना हिमाचल प्र्स्देश की राजधानी से सिर्फ अस्सी किलोमीटर दूर सिरमौर की है. गौरक्षक हिंदू भीड़ ने नोमन और उसके सहयोगियों का पीछा किया. वे एक ट्रक में गाय और बैल लिए जा रहे थे.नोमान को पीट-पीट कर मार डाला गया और बाकी घायल हुए.पुलिस ने घायलों को गिरफ्तार कर लिया. हत्यारों को? उनका पता ही नहीं चल रहा है जबकि खबर यह है कि भीड़ के साथ पुलिस थी. अब पुलिस कह आरही है कि घायल हमलावरों की पहचान नहीं बता पा आरहे हैं, तो वह क्या करे?

सिरमौर के पहले उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में  तकरीबन एक-डेढ़ हजार की भीड़ ने , जो जाहिरा तौर पर हिंदुओं की रही होगी, मोहम्मद शफीक और मोहम्मद कलाम को लगभग मार ही डाला था. उनपर एक गाय की ह्त्या का आरोप था,जबकि वे एक मरी हुई गाय का चमड़ा उतार रहे थे. वे बच गए, उनके पहले दादरी का मोहमद अखलाक नहीं बच पाया.

गोरक्षा के नाम पर निजी पुलिस को कैसे कबूल किया जा सकता है? क्या यह भारत के क़ानून का सीधा उल्लंघन नहीं है? इतना ही नहीं, भारत की पुलिस इन निजी हिंदू-सेनाओं की शिकायत पर सीधे कैसे कार्रवाई करती हैं? यह कैसे स्वीकार्य है कि ये गोरक्षक सेनाएँ मवेशियों से भरी गाड़ियों को रोकें और पुलिस उनके साथ खड़ी हो?यह अधिकार उन्हीं क़ानून की किस धारा के तहत दिया गया है?

गोमांस न खाने को लेकर हिन्दू स्वतंत्र हैं. उनके पूर्वज क्या करते थे, इससे उनका आज का व्यवहार तय नहीं होता.लेकिन उन्हें इसका हक नहीं कि वे अपनी जीवन-पद्धति मुसलमानों या ईसाइयों पर थोपें.अगर वे ऐसा करते हैं और इसमें अदालतें उनका साथ देती हैं,तो मान लेना पड़ेगा कि भारत एक छद्म-धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, यानी वस्तुतः वह हिंदू राष्ट्र है.

 

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