बांग्ला देश: इस्लामी राष्ट्र, धर्मनिरपेक्ष फाँसी

बांग्लादेश की जमाते इस्लामी के प्रमुख मोतिउर रहमान निजामी को फाँसी के बाद पाबना में दफना दिया गया है.निजामी पर 1971 के युद्ध के दौरान,जो बांग्लादेश के मुक्ति-संग्राम के नाम से प्रसिद्ध है, पाकिस्तानी सेना की मदद करने और बांग्लादेशियों की सामूहिक ह्त्या,औरतों के बलात्कार का आरोप है.निजामी कुख्यात अल-बद्र के नेता थे जिस पर उस वक्त पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर ,खासकर पाबना के लोगों के कत्लेआम का इल्जाम है.

निजामी की फाँसी  के बाद बांग्लादेश में तनाव है.एक तरफ जहाँ फाँसी की खबर सुनते ही शानबाग में खुशी का इजहार करते हुए लोग सडकों पर उतर आए, तो दूसरी ओर जमात से जुड़े छात्र संगठनों की पुलिस से झड़प हुई, बंद का आह्वान किया गया.जाहिर है, बांग्लादेश में निजामी के समर्थक बड़ी तादाद में मौजूद हैं. जमात पर पाबंदी की मांग उठ रही है लेकिन साथ ही निजामी के पक्ष में गुस्से के प्रदर्शन को कम करके आँकना भूल होगी.इसके पहले हसीना वाजेद की सरकार और चार लोगों को इसी तरह के आरोपों के आधार पर फाँसी दे चुकी है.

फाँसी इस सरकार के द्वारा गठित ट्रिब्यूनल के फैसलों और बांग्लादेश की न्यायप्रक्रिया के तहत दी गई.निजामी ने माफी मांगने के आख़िरी अवसर का इस्तेमाल नहीं किया. उनकी ओर से कहा गया कि माफी सिर्फ खुदा से ही माँगी जा सकती है.लेकिन इस प्रक्रिया के निर्दोष और पुख्ता होने को लेकर  मानवाधिकार संगठनों ने शंका जाहिर की है और कहा है कि इनके काम में एक तरह की जल्दबाजी थी और अभियुक्तों के खिलाफ पूर्वग्रहों ने प्रक्रिया को दूषित भी किया है.दूसरी आपत्ति उनकी है जो उसूलन फाँसी के खिलाफ हैं.

पाकिस्तान की संसद ने इस फाँसी के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किया है.खबर है कि तुर्की ने इसकी निंदा की है और शायद अपने राजदूत को इसी मुद्दे पर वापस बुला लिया है.पाकिस्तान का कहना है कि निज़ामी ने कोेई अपराध नहीं किया,वे सिर्फ पाकिस्तानी संविधान का पालन कर रहे थे.क्या पाकिस्तानी सेना भी संविधान का पालन नहीं कर रही थी? क्या उसने लाखों बांग्लादेशियों का क़त्ल नहीं किया, क्या बलात्कार नहीं हुए? क्या यह डींग नहीं मारी गई की इनकी नस्ल बदल कर रख  देंगे? क्या आज की बांग्ला केश की जमात ने , निजामी जिसके नेता थे, इसमें सेना का सक्रीय साथ नहीं दिया?

भारत में कुछ संगठन इसका विरोध कर रहे हैं.मजलिसे मुशावरत ने बयान जारी किया है जिसमें इस फाँसी को पूरी दुनिया में मिल्लत को कमजोर करने की एक साजिश बताया गया है.उसके मुताबिक़ अभी चारों ओर मुस्लिम विरोधी वातावरण है और यह फाँसी उसी का हिस्सा है. निजामी को यह बयान दुनिया के मुसलमानों का नेता मानता है.मुशावरत कट्टर संगठन नहीं माना जा रहा है,भारत के सारे मुसलमानों के मत का प्रतिनिधित्व भी वह नहीं करता लेकिन एक विचार तो वह है.

और साथ ही सवाल यह उठता है कि मिल्लत क्या है? मुसलमानों  की मिल्लत का शेष मानवता से क्या रिश्ता है? क्या मुशावरत इस पर विचार करेगी?

अवामी लीग की शेख हसीना वाजेद के नेतृत्व की सरकार ने 1971 के युद्ध में हुए अपराधों के शिकार लोगों की इन्साफ की माँग के उत्तर में जो प्रक्रिया चलाई,यह फाँसी उसका एक हिस्सा है.जैसा पहले कहा गया,इस प्रक्रिया के दोषमुक्त होने पर संदेह हैं. लेकिन उसके बाद और सवाल भी हैं.

1971 अभी भी बहुत पुराना नहीं पड़ा है.तब तो और भी ताजा था जब निजामी को बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने अपनी सरकार में मंत्री बनाया था.कहने का मतलब यह है कि यह सजा बांग्लादेश में सामाजिक स्तर पर उस राष्ट्र के जन्म को लेकर मौजूद अलग-अलग किस्सों और नजरियों को एक बार फिर प्रकट ही कर रही है.यह कोई आज ही हुआ हो, ऐसा नहीं.

बांग्लादेश के जनक और बंगबंधु कहे जाने जानेवाले शेख मुजीबुर्रहमान की ह्त्या राष्ट्र बनने के तुरत बाद ही कर दी गई थी. तब इस पर बड़ी हैरानी जाहिर की गई थी,कुछ ने इसे इस्लामी समाज में धर्मनिरपेक्षता की अस्वीकार्यता का परिणाम और उदाहरण बताया.मुजीब को इस्लामी राष्ट्र को खंडित करने और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत की हिमायत की सजा दी गई,ऐसा मानने वाले हैं.उनके मुताबिक़ यह मुस्लिम समाज के,वह उर्दू बोले या बांग्ला,आतंरिक दोष के कारण ही हुआ.

फिर गाँधी की ह्त्या की क्या व्याख्या की जाएगी? अब तक भारत ने भी तो साहसपूर्वक तीस जनवरी, 1948 के उस क्षण का कायदे से सामना नहीं किया है. वह ह्त्या आखिर किसी जुनून में नहीं की गई थी!फिर हम उसे टाल क्यों जाते हैं? क्या यह सच नहीं कि भले सार्वजनिक इजहार न किया जाता हो, लेकिन  गाँधी की ह्त्या को जायज मानने वाले हिंदुओं की तादाद क्या नगण्य  है?लेकिन अभी यह विचारणीय नहीं है.सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि राष्ट्र निर्माण का  जो एक तर्क सर्वमान्य माना जाता रहा है,उसे चुनौती देने वाला तर्क भी साथ-साथ उसी समाज में पलता है. यह संघर्ष या द्वंद्व अंतिम तौर पर हल होने में काफी वक्त लगता है. उसकी  प्रक्रिया क्या है?

क्या बांग्लादेश ने ट्रिब्यूनल का जो रास्ता चुना, जिसके नतीजे में एक के बाद एक फाँसी हो रही है,वह आख़िरी तौर पर इस द्वंद्व का शमन कर पाएगा? क्या वह समाज में अंतरावलोकन की प्रेरणा देगा या वह द्वेष और हिंसा को और गाढ़ा, और तीव्र करेगा?

बांग्लादेश में उसके जन्म को दुर्भाग्य मानने वाले हैं. वे मानते हैं कि भले ही अब इस राष्ट्र को अनकिया नहीं किया जा सकता लेकिन इसका पूर्ण इस्लामीकरण करके प्रतिकार किया जा सकता है.वैसे ही जैसे भारत में उसके धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को पाप मानने वाले उसका हिन्दूकरण करके प्रायश्चित करना चाहते हैं.

निजामी और उनके पहले और अभियुक्तों की फाँसी बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्षता के लिए क्या विरेचन का एक क्षण भर है?क्या यह उसके एक कदम आगे बढ़ने का सबूत है? फिर बांग्लादेश में एक के बाद के लेखकों,शिक्षकों के क़त्ल के सिलसिले को कैसे समझें? जो सरकार इस फाँसी को लेकर नहीं हिचकिचाई, उसी की नेता इन हत्याओं पर यह इशारा क्यों करती हैं कि यह सब कुछ उनके गैरजिम्मेदार लेखन के कारण हो रहा है?

क्यों ऐसा लग रहा है कि इन फाँसियों में बांग्ला देश के धर्म निरपेक्षीकरण का इरादा जितना नहीं, उतना प्रतिशोध है?क्या इसके सामानांतर समाज में कोइ बहस है या क्या सरकार वह बहस चलाने में रूचि रखती है?

सरलीकरण करके इन सबका उत्तर दिया जा सकता है.कहा जा सकता है कि बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरता बढ़ रही है.उसका जवाब यह है कि उसके आगे घुटने टेक नहीं दिए गए हैं.बांग्लादेश में ऐसे निर्णय देने वाले न्यायाधीश हिंदू हैं,और वे वहीं हैं,उसी तरह मारे गए ब्लॉगरों और बुद्धिजीवियों की तरफ से मुखर लोगों की संख्या कम नहीं हुई है.

हम सब जो बांग्लादेश को कुछ दूरी से देख रहे हैं,बेहतर हो,उसके द्वंद्व को उसकी पूरी जटिलता में समझने की कोशिश करें.हिंसा,रक्तपात और ह्त्या,वह ‘न्यायसम्मत’ ही क्यों न हो क्या राष्ट्र के आख्यान को  मानवीय बनाने में मदद करती है? दूसरे, क्या कोई भी राष्ट्र अकेले यह काम कर सकता है? क्या अब इसका समय नहीं आ गया है कि राष्ट्र एक मानवीय, अहिंसक समाज बनाने के सामूहिक प्रयास के बारे में सोचें? ठीक है कि राष्ट्र एक यथार्थ है लेकिन क्या बंधुता के नए मुहावरे गढ़ने में उसकी असफलता पर विचार नहीं होना चाहिए? एक ही राष्ट्र में पल रही अनेक राष्ट्रों की कल्पनाएँ कैसे एक दूसरे के साथ तालमेल बैठाएँ?

इन सवालों का जवाब आसान नहीं.आखिर आंग सान सू ची भी बौद्ध राष्ट्रवाद के भय से रोहंगियों का अस्तित्व कबूल करना नहीं चाहतीं.उनका वह साहस जो फौजी हुकूमत नहीं तोड़ पाई, इस धार्मिक राष्ट्रवाद का सामना करने में उनकी मदद नहीं कर पाया.इसीलिए, सवाल जितना पेचीदा है, जवाब भी उतना ही मुश्किल.लेकिन पहले इसका सामना करना ज़रूरी है,फाँसियों के आसान रास्ते इसका हल नहीं मिलेगा.

http://satyagrah.scroll.in/article/100709/can-these-executions-end-the-conflict-that-has-been-a-part-of-bangladesh-since-its-birth

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