2016 विदा लेता है (Why our world remained unsecured tired and empty in 2016)

2016 विदा लेता है. खून से लथपथ और आँसुओं से तर, इंसानी मूर्खताओं, क्षुद्रताओं, चालाकियों और बेईमानियों से ठगा गया और थका-हारा. अपने से और सबसे माफी माँगता-सा कि वह दुनिया को बेहतर छोड़कर नहीं जा रहा, कि उसके उम्मीद की कोई कंदील रौशन नहीं, जिसे वह हमें थमाकर चैन से गुजर सके.

कोई दुनिया पहले से अधिक समझदार हुई है या भ्रमित? अलेप्पो खाली करा लिया गया है. लेकिन उसके साथ ही यह भी तय हो गया है कि अरब के वसंत का वायदा, यानी जनतंत्र की बहार एक मधुर स्वप्न-स्मृति ही रह जाए. बशर-अल असद की तानाशाही के खिलाफ लड़नेवाले कातिल ही निकले और कातिलों से अलेप्पो का उद्धार करनेवाले पुतिन और असद बचे.

संयुक्त राष्ट्र संघ ने फिलीस्तीन की लूटी हुई ज़मीन पर इस्राइली बस्ती को बढ़ाने की आलोचना की, यह खबर आ ही इसलिए पाई कि बराक ओबामा ने प्रस्ताव को पारित हो जाने में रुकावट न बनने का फैसला किया. फिलस्तीन के प्रति ओबामा की यह रुद्ध मानवीयता इतनी देर से प्रकट हुई कि वह अमरीका की भी रह न सकी. उनके उत्तराधिकारी डोनाल्ड ट्रम्प ने इस्राइल की आलोचना करने वाले संयुक्त राष्ट्र संघ को निठल्लों का जमावड़ा कहा और इस्राइल को यकीन दिलाया कि उनके पद ग्रहण करते ही अमरीका का रुख पलट दिया जाएगा. अमरीका की इस विलंबित मानवीयता की बस चार हफ्ते की उम्र है. यह तो होना ही था कि इस्राइल इस अन्तराष्ट्रीय भर्त्सना से शर्मिंदा होने की जगह अपने लोगों को फिलस्तीनी ज़मीन पर बसाते रहने का ऐलान करे. लेकिन इस प्रस्ताव से भले ही हम तसल्ली करें कि फिलस्तीन की बिसरी दास्तान की फिर से दुनिया को याद तो आ गई है.

सीरिया, लीबिया और मध्य पूर्व के पनाहगुजीरों के लिए तमाम शंकाओं को मानने से इनकार करते हुए बाँहें खोलनेवाले जर्मनी में बड़े दिन के जश्न में दहशत का धमाका हुआ. नतीजा तकलीफ से ज्यादा राष्ट्रपति मर्केल के उन विरोधियों की खुशी के इजहार में हुआ जो इन अरब शरणार्थियों के मुँह पर जर्मनी का दरवाज़ा बंद करने के हामी हैं. फ्रांस में 2002 में पीछे धकेल दी गई ले पेन की पार्टी ब्रिटेन में फाराजे और जॉन्सन के उभार और यूरोपीयन यूनियन से अलग होने के उसके फैसले के चलते दोगुनी नफरत के जोर से सामने आ गई है और खुद को दुनिया में संस्कृति का अगुवा माननेवाले फ्रांस के सामने चुनौती वापस यह है कि क्या वह इस राष्ट्रवादी मूर्खता और असभ्यता को रोक पाएगा?

कांगो गणतंत्र खूँरेजी के नए दौर में जा सकता है. यह चेतावनी भी संयुक्त राष्ट्र संघ ने दी. गाम्बिया में भी कांगो की तरह ही जनतंत्र स्थगित है और जिम्बाब्वे में बयानवे साल के राष्ट्रपति मुगाबे चुनाव के नाम पर अपनी हुकूमत को कायम रखने की तैयारी में हैं.

जनतंत्र अनिश्चय के दौर में पहुँच गया है. क्या वह बहुमत की वक्ती बेचैनियों का कोई वक्ती मरहम भर है या कुछ इंसानी उसूलों का नाम है? आज़ादी के माने क्या हैं अगर उसमें सबके लिए हमदर्दी की हिम्मत न हो? भारत के करीब म्यांमार की नेता, जिन्हें उनके जनतांत्रिक जीवट के लिए सबने अपना नया आदर्श माना और जो खुद को गाँधीवादी बताती हैं, गांधीवाद की पहली कसौटी पर ही खोटी साबित हुईं जब वे अपने धर्म के बौद्धों के द्वारा म्यांमार के अल्पसंख्यक रोहंगिया मुसलमानों की हत्या और बेदखली के खिलाफ खड़ी न हो सकीं, बल्कि इस मसले से ही उन्होंने मुँह फेर लिया. अगर पिछले साल की कोई सबसे बड़ी शर्म है, तो वह यह है. गाँधी की वह कसौटी क्या है?अगर बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों में चुनाव करना हो तो बेझिझक अल्पसंख्यकों के साथ खड़े होना.

क्या यह हैरानी की बात है कि दुनिया भर में अल्पसंख्यकों के प्रति बहुसंख्यकों का भय बढ़ता जाता है? ईराक में मुसलमान ईसाईयों से अपने मुल्क को पाक कर रहे हैं, बांग्ला देश में, जो मजहब की जगह बांग्ला ज़ुबान को अपने वजूद की बुनियाद बता कर खड़ा हुआ, हिन्दुओं पर हमले हो रहे हैं. पाकिस्तान में नए अल्पसंख्यक खोजे जा रहे हैं जिनका सफाया किया जा सके और श्रीलंका एक बार फिर खुद को बौद्ध साबित करने पर तुला है, अपने तमिल हिन्दुओं, ईसाईयों और मुसलमानों को दोयम दर्जे पर धकेलकर.

1947 में अपने वतन से ही बेदखल कर दिए गए और अपनी जान बचाने को सबसे करीबी जम्मू में पनाह लेने को मजबूर कर दिए हिन्दुओं और सिखों को सिर्फ रिहायशी पहचान का हक दिए जाने पर जम्मू कश्मीर में आज़ादी की मांग करनेवालों ने जो रुख अपनाया है, उससे उनकी आज़ादी का चेहरा कुछ और साफ़ हुआ है. वे इसे राज्य की आबाई पहचान को बदलने की साजिश बता रहे हैं. इसका जवाब कैसे दिया जा रहा है? सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी म्यांमार से जान बचा कर भागे रोहंगिया मुसलमानों को शरण दिए जाने पर ऐतराज कर रही है. यह कहकर कि वे दहशतगर्दों का साथ दे सकते हैं. इसलिए उन्हें सीमा पर बसाना खतरनाक हो सकता है!

सीमा राष्ट्रों की है, मुल्कों की है, इंसानियत की सरहद कहाँ खींची जाएगी? क्या है जो उसके भीतर है और क्या जिसे वतनबदर किया जाए?

दिसंबर और वर्षांत की इस ठण्ड में ठिठुरते हुए हम रहम, इंसानपरस्त उम्मीद के अल्फाज़ की गर्माहट की तलाश में हैं और विडंबना यह है कि मानवीयता की याद अब उन कोनों से दिलाई जा रही है, जिन्हें जनतंत्र के लिए अप्रासंगिक और गुजरे जमाने के अवशेष प्रतीक मान लिया गया था.

ब्रिटेन में प्रिंस चार्ल्स ने बीती सदी के तीस के दशक की वापसी की चेतावनी दी और कहा कि जैसे ईराक में ईसाई होना खतरनाक है, वैसे ही पूरी दुनिया में अल्पसंख्यकों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता रोज़ाना की ज़िंदगी और मौत का मसला बन गई है. हॉलैंड के राज प्रमुख ने क्रिसमस के मौके पर अपने उद्बोधन में कहा कि पूरी दुनिया असुरक्षित महसूस कर रही है और हिफाजत की तलाश में हमने अति को नया सामान्य मान लिया है.  सुरक्षा की खोज में हम सब अपने ने खुद को अपने खूँटे से और कसकर बांध लिया है. इस वजह से ईमानदार और खुला संवाद असंभव हो गया है. अक्सर लगता है कि हम ऐसे मुल्क में रह रहे हैं जहाँ सुननेवाले नहीं हैं.

सबसे मार्मिक शब्द लेकिन पोप फ्रांसिस के इस साल के क्रिसमस के सन्देश के हैं. शिशु यीशु के चेहरे की याद करते हुए संत ऑगस्तीन के शब्दों को उन्होंने दुहराया, “ प्रभु रूप में विराट और दास-रूप में लघु.” शिशु रूप में प्रभु के अवतरण के रहस्य का वर्णन चौथी सदी के संत मकारिउस ने यों किया: ध्यान से सुनो: अनंत, अगम्य और अजन्मे प्रभु ने अपनी विराट अनिर्वचनीय मंगलमयता में देह धारण की है, और मैं कहने का साहस करूं, ऐसा करके उसने अपनी शान को बेइंतिहा कम कर लिया है.

पोप उस ईश्वर की उस प्रीतिमय विनम्रता का उत्सव मनाने का आह्वान करते हैं. वे अपने पहले के पोप पॉल छठे के 1971 के क्रिसमस के संदेश को याद करते हैं: खुदा चाहता तो अपनी पूरी शानो शौकत, रुआब, बिजली और ताकत की चकाचौंध में हमारे भीतर भय का संचार करने अवतरित हो सकता था, जिससे उसकी झलक से हम अपनी आँखें मलने को मजबूर हो जाएँ. इसकी जगह उसने सबसे कमजोर, सबसे लघु और असहाय रूप में अवतार लेना तय किया. ताकि कोई उसके करीब जाने में झिझके नहीं, उसकी निकटता की सहज इच्छा सबमें हो, वे उसके सान्निध्य में हीन न महसूस करें.

लघुता और विनम्रता जो प्रेम को निमंत्रित करती है, विराटता और शक्ति नहीं. प्रभु चाहता है कि हम इसी लघुता में उसे उपलब्ध करें. अपने समकालीन मत्ता अल मसकीन के हवाले से वे कहते हैं, हमारी दुनिया थकी और खाली है तो इसलिए कि हर कोई इस होड़ में है सबसे महान कौन है! सरकारों, गिरिजाघरों, लोगों और परिवारों में भी एक निष्ठुर प्रतियोगिता है: हममें सबसे बड़ा कौन है?

पोप ने कहा कि इंसानियत का नया प्रतीक होना चाहिए एक वतन बदर, पनाहगुजीर परिवार और इस हालत में एक झोंपड़ी में पालने की जगह एक नांद में पड़ा एक शिशु. क्या हम अपने शिशुओं की चुनौती सुनने की ताकत रखते हैं? और वह चुनौती क्या हो सकती है?

 

 

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