रोहित वेमुला की बेचैनी कोई समझना नहीं चाहता (Rohith Vemula’s restlessness)

रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी को एक साल बीत गया। इस अवसर पर सभाएँ होंगी,जुलूस निकलेंगे, लेख लिखे जाएँगे। यह मौक़ा हम सबके लिए आत्म परीक्षण का है। शिक्षकों, छात्रों, छात्र संगठनों, विश्वविद्यालय प्रशासन, राजनीतिक दलों, सरकारों ,और समाज सबके लिए।

क्या हम इस आत्महत्या की ज़िम्मेदारी महसूस करते हैं या उससे पीछा छुड़ाना चाहते हैं? बीते एक साल में, आत्महत्या के तुरंत बाद, और आज तक जो प्रतिक्रिया हुई है, उसने हमारे समाज और राजनीति के फूहड़पन, असभ्यता, संकीर्णता, बेहिसी और बेरहमी को और उजागर कर दिया है।

होना तो यह चाहिए था कि विश्वविद्यालय समुदाय इसके बाद स्वयं ही एक दीर्घ विचार मंथन आरंभ करता जो उसकी आत्मलोचना हो सकती थी। सरकारों का काम  व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त का है, यह सुनिश्चित करने का कि उनका उल्लंघन न हो रहा हो। राजनीतिक दलों का दायित्व है कि वे एक मित्रतापूर्ण नागरिकता के विचार को दृढ़ करें जो हमदर्दी पर टिकी हो। व्यापक समाज का दायित्व यह देखने का है कि वह अपने सदस्यों के लिए आश्वस्तिकर है या नहीं, वे उसमें इत्मीनान महसूस करते हैं या नहीं।

रोहित की आत्महत्या पर हुई प्रतिक्रियाओं ने साबित किया कि इनमें से किसी भी कसौटी पर कोई खरा नहीं उतर पाया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने सरकारों के पीछे मुँह छिपा लिया। सरकारें यह साबित करने में लग गईं कि रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी को इसलिए ख़ास नहीं माना जाना चाहिए कि वह दलित था ही नहीं।

यह आत्महत्या हमें हिला न पाती, अगर उस ख़बर के साथ हम वह नोट न पढ़ते जो रोहित ने आत्महत्या के पहले लिखा था। रोहित इस नौजवानी में ही अपने माहौल से निराश हो गया था। एक ख़ालीपन उसे महसूस हो रहा था। अपने भीतर की सारी मानवीय सम्भावना को सिर्फ़ एक पहचान में शेष कर दिए जाने का दर्द। एक आज़ाद दिल और दिमाग़ के तौर पर क़बूल न किए जाने की तकलीफ़।

रोहित ने लिखा कि उसका जन्म एक दुर्घटना थी। उससे जुड़े अकेलेपन से उसका दम घुट रहा था। और अब यह अहसास इतना तीखा हो उठा था कि जीते जाने के कोई मायने नहीं रह गए थे।

रोहित विश्वविद्यालय में था, जहाँ आप अपनी गाँव, कस्बे, जाति और धर्म की पहचानों में कुछ नया जोड़ते हैं। इसके मौक़े और साधन कक्षा और बाहर परिसर में मिलने चाहिए। एक हिंदू परिसर में रहने के बाद सिर्फ़ हिंदू नहीं रहता, एक मणिपुरी सिर्फ़ मणिपुर का नहीं रह जाता, एक दलित अपनी पहचान को और विस्तार दे पाता है।लेकिन रोहित के ख़त ने याद दिलाया कि हमारे शिक्षा के इदारे इसके उल्टा काम कर रहे हैं। वे पहचानों के बीच रास्ते बनाने की जगह उनके इर्द-गिर्द ऊँची दीवारें खड़ी कर रहे हैं।

विश्वविद्यालय हम सबको अपने अकेलेपन का सामना करने और उससे बाहर निकलने में मदद भी करते हैं। या उन्हें ऐसा करना चाहिए। रोहित का विश्वविद्यालय इसमें असफल रहा।

रोहित की आत्महत्या को सांस्थानिक हत्या कहा गया है।  रोहित ने ख़ुदकुशी के फ़ैसले के लिए किसी शख़्स या संस्था  को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया। लेकिन आत्महत्या के पहले और उसके बाद उसके विश्वविद्यालय ने जो सलूक किया, वह व्यक्ति के प्रति संस्थान की उदासीनता की क्रूरता का सिर्फ़ एक उदाहरण है। 

सिर्फ़ विश्वविद्यालय नहीं, राज्य सरकार और केंद्रीय सरकार ने जो रुख लिया, उससे भी ज़ाहिर हुआ कि किसी आत्मपरीक्षण और पश्चात्ताप की जगह, अपनी ज़िम्मेवारी क़बूल करने के बजाय, जो मारा गया, उसे ही बदनाम करके वे ख़ुदकुशी की गंभीरता को ख़त्म कर देना चाहती हैं।

राज्य सरकार और केंद्रीय सरकार का पूरा ज़ोर यह साबित करने पर है कि रोहित दलित नहीं था, कि रोहित की माँ ने झूठ बोलकर अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र ले लिया था। इशारा यह है कि रोहित को तो क़ायदे से विश्वविद्यालय में होना ही न था, कि उसने झूठे जाति प्रमाणपत्र से फ़ायदा उठाया। सरकारी तंत्र की पूरी ताक़त एक औरत के ख़िलाफ़ इस्तेमाल की जा रही है जिसका वह जवाब नहीं दे सकती।

रोहित की आत्महत्या के बाद के साल ने साबित किया है कि समाज के भीतर की विभाजन रेखाओं को गहरा करने में ही हमारी दिलचस्पी है। दलित समुदाय को अगर यह लग रहा है कि ग़ैर दलित समाज की सहानुभूति उथली है और उसमें ईमानदारी नहीं है, तो क्या यह उनकी कल्पना मात्र है? दलित को सिर्फ़ और सिर्फ़ क़ानूनी इकाई में घटा कर उसके प्रति अपने रवैए की जाँच करने से क्या यह साबित नहीं होता कि सुविधाप्राप्त समुदाय मात्र अपनी सुविधाओं की रक्षा में सन्नद्ध हैं?

रोहित की मौत क़ुदरती न थी। इसीलिए रोहित की माँ राधिका की माँग इंसाफ़ की है। एक बड़े समूह को भय है कि न्याय की इस खोज में वह कहीं अभियुक्त और अपराधी साबित न हो। इसलिए इंसाफ़ की इस माँग को ही ग़लत साबित करने की कोशिश की जा रही है।

रोहित वेमुला की मौत आख़िरकार सिर्फ़ एक दलित सवाल बनकर रह गई है। रोहित का पत्र इस पूरे घटनाक्रम पर एक विडंबनापूर्ण व्यंग्य है। वह अपनी पहचान को संकुचित कर दिए जाने और उससे पैदा हुए एकाकीपन से जूझने में अपनी नाकामयाबी क़बूल करता है और इस ज़िंदगी से इस्तीफ़ा देने का ऐलान करता है। लेकिन उसकी इस बेचैन उदासी को महसूस कर पाने के हम क़ाबिल नहीं, यह हमने साबित किया है।

रोहित की आत्महत्या के पहले इखलाक की हत्या, उसके बाद झारखंड मोहम्मद मजलूम और इनायतुल्लाह खान की हत्या और गुजरात में दलितों की बेरहम पिटाई से भी साबित हुआ है कि भारत दलितों और मुसलमानों के लिए असुरक्षित बना हुआ है। राज्य, व्यापक राजनीतिक वर्ग, समाज में हमसाएपन के अहसास की कमी से मालूम होता है कि समाज  स्वस्थ नहीं है।

रोहित वेमुला ने हमारी मदद करने की कोशिश की थी। नाइंसाफ़ी, हमदर्दी की कमी की बाढ़ ख़तरे का निशान पार कर गई है, वह उसमें डूबते हुए हमें बताने की कोशिश कर रहा था। वह पानी इस एक साल में और ऊपर चला गया है और हमने ख़ुद को उससे बचाने के उपाय नहीं किए हैं। 

रोहित ने लिखा था, “शायद मैंने ही दुनिया को समझने में ग़लती की है। प्रेम, दर्द, ज़िंदगी और मौत को समझने में। (मैंने पाया कि इन मामलों में) किसी को कोई जल्दी न थी। शायद मैं ही हड़बड़ी में था।”

रोहित की इस छटपटाहट को समझने की कोई जल्दी अभी भी नहीं दीखती।

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