शाकाहार, मांसाहार और बुद्धि का अधिकार

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने लखनऊ में भीमराव आंबेडकर की जयंती के अवसर पर लखनऊ में हुए एक कार्यक्रम में प्रोफ़ेसर कांचा इलैया के वक्तव्य की रिपोर्ट प्रकाशित की है.रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्होंने कहा कि शाकाहार राष्ट्र विरोधी है: “मेरा राष्ट्र गोमांस खाने से शुरू होता है.दुर्भाग्यवश, हमने गोमांस खाना छोड़ दिया और इस कारण हमारे दिमाग अब बढ़ नहीं रहे हैं.” आगे उन्होंने कहा कि शाकाहार राष्ट्र को नष्ट कर देगा. शाकाहारी राष्ट्रवाद  के सहारे  हम चीन, कोरिया,जापान और अमरीका से प्रतियोगिता नहीं कर सकते जो पूरी तरह गोमांसाहारी हैं.

यह वक्तव्य आक्रामक है और उस समय के लिहाज से साहसी कहा जा सकता है जब गोमांस रखने और खाने के नाम पर लोगों को मारा जा रहा हो. अखबार ने बताया कि इस बयान पर काफी तालियाँ मिलीं.रिपोर्ट ने इसके साथ यह बताना ज़रूरी समझा कि  श्रोताओं में अच्छी संख्या दलितों की थी.

इस प्रतिक्रिया को समझा जा सकता है.मुसलमानों को गोमांस के नाम पर मारे जाने के बहुत पहले हरियाणा के झज्झर में 2002 के दशहरा के दिन पांच दलित युवकों ,विरेंदर,दयाचंद, तोलाराम,राजू और कैलाश को भीड़ ने घेरकर मार डाला था: उनकी आँखें निकाल ली गईं,और देह क्षत-विक्षत कर दी गई.उनपर सड़क पर एक गाय की खाल उतारने का आरोप था.2002 में ही हरियाणा से बहुत दूर गुजरात में शाकाहारी हिंदू धर्म का नारा लगाकर ‘मांसाहारी हिंसक’ मुसलमानों को मारा गया था.

प्रोफ़ेसर इलैया के इस वक्तव्य का एक परोक्ष आशय  है: गोमांस खाना सिर्फ मुसलमानों की भोजन की संस्कृति का अंग नहीं,भारत में दलितों के खाने में यह शामिल रहा है. गोमांस पर प्रतिबंध या उसके खिलाफ अभियान का निशाना सिर्फ मुसलमान नहीं हैं,दलित भी  हैं.

लेकिन उनका वक्तव्य यह कहने तक रुकता नहीं,उससे आगे चला जाता है.वे फिर गोमांस खाने के अधिकार की वकालत करने के लिए उसके गुणों का वर्णन करने लगते हैं और यह ज़रूरी समझते हैं कि उसे शाकाहार से श्रेष्ठ बताया जाए.इस वक्तव्य में प्रायः  वही अतार्किकता है जो मांसाहार या गोमांस के खिलाफ की जाने वाली बहस में दिखलाई पड़ती है.

मांसाहार का विरोध करने वाले इसे तामसी भोजन कहते हैं.उनके अनुसार मांसाहार से स्वभाव में आक्रामकता और हिंसा आ जाती है. शाकाहार इसके उलट सात्विक है और अहिंसक प्रवृत्ति का पोषक है. हम जानते हैं कि यह हास्यास्पद तर्क है. शेर या बाघ स्वभावतया हिंसक नहीं होते.मांसाहार का विरोध कोई हिंसा का विरोध नहीं. कम से कम मांसाहार और गो-ह्त्या का विरोध करने वालों से यह तो पूछा जाना ही चाहिए कि जब वे तामसी भोजन करने वालों पर खुद हमला करते हैं या उनकी ह्त्या तक डालते हैं तो क्या वे अहिंसा के सिद्धांत का  उदाहरण प्रस्तुत  कर रहे होते हैं?

उसी तरह मांसाहार के अधिकार के लिए यह कहने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए कि वह शाकाहार से बेहतर है.जैसे शाकाहार सात्विक विचारों का स्रोत नहीं ,वैसे ही मांसाहार कुशाग्रता का कारण नहीं हो सकता.

इस मामले में हम सबको मोहनदास करमचंद गांधी  की तर्क पद्धतिवाली स्पष्टता को समझने की ज़रूरत है. गाँधी कट्टर शाकाहारी थे बल्कि शाकाहार के आन्दोलन से एक समय उनका घनिष्ठ रिश्ता था. वे खुद को गोभक्त भी कहते थे. लेकिन आज़ादी के वक्त जब राजेन्द्र प्रसाद ने उनसे कहा कि उन्हें हज़ारों प्रतिवेदन मिले हैं कि भारत में गोहत्या पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए तो गांधी ने जवाब दिया कि यह नहीं किया जा सकता.भारत सिर्फ  वैसे हिंदुओं का देश नहीं जो गोमांस नहीं खाते, यहाँ वैसे लोग बसते हैं जिनके भोजन के अभ्यास में गोमांस शामिल है. हिन्दुओं की भोजन पद्धति भारत की राष्ट्रीय भोजन पद्धति नहें हो सकती.

स्वयं गोभक्त होते हुए भी  गाँधी को क्यों गोमांसाहार करने वालों के पक्ष से बोलने में हिचक न हुई? इसलिए कि उनकी चिंतन और तर्क पद्धति मूलतः जनतांत्रिक थी.

मांसाहार या शाकाहार का अभियान चलाने की भी सबको छूट है. अभियानों में अक्सर भावुकतापूर्ण और मूर्खतापूर्ण तर्क भी दिए जाते हैं. आखिर मूर्खता करने का अधिकार भी एक जनतांत्रिक अधिकार ही है.

जिनका पेशा बुद्धि से जुड़ा हुआ है, उन्हें अभियानों की बदहवासी का शिकार होने की सुविधा नहीं, वे अतिरंजनापूर्ण भावुकता का आसान रास्ता भी नहीं ले सकते. इस प्रसंग में रोहित वेमुला ने ओस्मानिया विश्वविद्यालय के गोमांस-उत्सव के समर्थन के लिए जो तर्क दिया था, उसमें अधिक स्पष्टता और दृढ़ता है. आज के लोगों के गोमांस खाने के अधिकार के समर्थन के लिए अतीत में जाने की ज़रूरत नहीं, यह कहकर कि आपके पूर्वज माँसाहारी थे, आज आपको मांस खाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता या न खाने के लिए शर्मिन्दा भी नहीं किया जा सकता. आपका कुछ खाने या न खाने का निर्णय अपने-आप में ही पर्याप्त है.आपके माँसाहार खाने के अधिकार का समर्थन करने के लिए मुझे खुद माँस खाना शुरू करना आवश्यक नहीं. गोमाँस उत्सव का समर्थन इसलिए करना ज़रूरी है कि आज सार्वजनिक तौर पर गोमांसाहार  का अपराधीकरण किया जा रहा है. भोजन एक निजी, व्यक्तिगत निर्णय है लेकिन अगर मेरे इस निर्णय में सार्वजनिक हस्तक्षेप होगा तो मुझे भी अपने इस निजीपन की सार्वजनिक रक्षा करनी होगी और उसे उत्सव जैसी सम्माननीयता देनी होगी.

प्रोफ़ेसर इलैया की तर्क पद्धति से यह भिन्न तर्क पद्धति है और अधिक उपयोगी और कारगर भी.

प्रोफ़ेसर कांचा इलैया ने काम सूत्र लिखे जाने को भी समय और बुद्धि का अपव्यय माना. उनके अनुसार पशु भी यौन जीवन बिताना जानते हैं फिर उसके लिए ग्रन्थ लिखने का क्या काम! मनुष्य का यौन जीवन अन्य प्राणी जगत से मिलता-जुलता हो कर भी कितना भिन्न है, यह बताने की ज़रूरत नहीं. ऐसा कहने वाले काम भावना को अनावश्यक और अनेक बार  त्याज्य भी ठहरा बैठते हैं.दिलचस्प यह है कि मनुष्य के यौन जीवन को वे ही लोग सीमित करना चाहते हैं जो उसके खानपान को नियंत्रित करते हैं.

हमारे सामाजिक विचार-विमर्श की भाषा पर आज के समय की आक्रामकता का असर पड़ रहा है.सार्वजनिक भाषा नारेबाजी या तुकबंदी में बदल गई दीखती है.इसका नतीजा यह हुआ है कि दीर्घ तार्किक चिंतन कठिन होता जा रहा है.यह राजनीतिक दलों के नेताओं की ही आदत बन गई हो, ऐसा नहीं. ऊपर के उदाहरण से साफ़ है कि हम सब अब तर्क करने की पद्धति पर जोर देने की जगह श्रेष्ठता-हीनता के उसी तर्क का सहारा ले रहे हैं, जिनका सहारा ले कर किसी एक राष्ट्र को दूसरे  से श्रेष्ठ बताया जाता है.

हमें ज्ञान क्यों चाहिए?क्या यूरोप, अमरीका और चीन से आगे निकल जाने के लिए? क्या उनका मुकाबला करने के लिए?

ज्ञान की आवश्यकता किसी से आगे निकलने या किसी को हराने के लिए नहीं, खुद को अधिक मानवीय बनाने के लिए है.हम जो भी कहें या लिखें वह इस बुनियाद को पुख्ता करता है या कमजोर,इसी पर उसकी श्रेष्ठता निर्भर है.

 

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