बातें हैं, बातों का क्या …

“गद्य चीज़ों को उनके सही नाम से पुकारने की कला है”, प्रख्यात लेखक रैल्फ फॉक्स ने कभी लिखा था.लेकिन गद्य का इस्तेमाल कभी-कभी सचाई पर पर्दा डालने के लिए किया जाता है.या कहा जा सकता है कि भाषा या शब्द दरअसल खाली बर्तन हैं,जिनमें अर्थ कहीं और से भरा जाता है.भारत के प्रधान मंत्री के वक्तव्यों को पढ़ते हुए शब्द और अर्थ के बीच के रिश्ते पर कुछ इसी तरह के विचार मन में आते हैं.

टाइम पत्रिका में उन्होंने अपने कार्यकाल के साल पूरा होने के उपलक्ष्य में एक लंबा इंटरव्यू दिया है. इसकी नोटिस भारत के मीडिया ने ली है. इसमें अनेक बातें कही गई हैं. प्रधान मंत्री के लिए संविधान ही एकमात्र पवित्र पुस्तक है, ऐसा उन्होंने कहा है. पवित्र पुस्तकों के साथ हम कैसा रिश्ता रखते हैं, यह हम सबको मालूम है.वे पूजा किए जाने के लिए होती हैं, उन्हें धूप-अगरबत्ती दिखाई जाती है,दुनियावी मसलों में हम उनका इस्तेमाल नहीं करते. रोजमर्रा की गन्दगी में हम पवित्र पुस्तकों को नहीं घसीटते. और अगर संविधान नामक पुस्तक,जो लिखी और छपी है,इतनी ही श्रेष्ठ है तो जापान हो अमरीका, जो किताब बतौर प्रधान मंत्री वे राज्याध्यक्षों को उपहार में देते रहे हैं,वह तो गीता है,यह संविधान नहीं,और गीता के बारे में उनका ख्याल है कि इससे बड़ी कोई  देन भारतीय सभ्यता की है ही नहीं.

भारत को डिक्टेटरशिप की ज़रूरत नहीं, वह यहाँ चल नहीं सकती क्योंकि हमारे डी.एन.ए. में लोकतन्त्र है, यह दूसरी बात कही गई. डी एन ए शब्द को जितना लोकप्रिय आज के प्रधान मंत्री ने बनाया है, उसे देखते हुए जीव वैज्ञानिकों को उन्हें सम्मानित  करना चाहिए.लेकिन जिस देश में जाति के नाम पर ह्त्या आम बात हो,जो देश उंच-नीच की बीमारी से इस कदर पीड़ित हो कि इस्लाम हो ईसाइयत,जाति से न बच पाए,उसके लोगों के बारे में यह कहना कि लोकतन्त्र उसके डी एन ए में है, काव्यात्मक उड़ान भी नहीं.

खुद प्रधानमंत्री डिक्टेटर हैं या नहीं, यह तो आप उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों से जा कर पूछ लें.या भारतीय जनता पार्टी के नए-पुराने सदस्यों से. अब तो उनकी मौजूदगी में प्राचीन लौह पुरुष तक,जो कभी उनके गुरु और संरक्षक हुआ करते थे,मुँह नहीं खोल सकते.डिक्टेटर शब्द बदनाम हो चुका है और अगर उसके इस्तेमाल के बिना ही डिक्टेटरशिप चल सकती हो, तो फिर यह कहने की ज़रुरत ही कहाँ रह जाती है कि मैं डिक्टेटर बनना चाहता हूँ. लेकिन जिस व्यक्ति का आदर्श सिंगापुर का संस्थापक राज्याध्यक्ष या चीन हो,उससे अलग से यह पूछना भी हद दर्जे का भोलापन है कि आप डिक्टेटर होना चाहते हैं या नहीं.

सरकार सभी धर्मो के लोगों को समान भाव से देखती है. बात सही है. देखती है लेकिन अगर कुछ धार्मिक सा,समूहों के खिलाफ घृणा अभियान चल रहा हो तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर वह चलने देती है: आखिर वह लोकतांत्रिक सरकार है. जब जूलियो रिबेरो जैसा व्यक्ति यह कहने लगे कि यह देश अब उसे पराया लगने लगा है, तब यह कहना कि अल्पसंख्यकों के भय लगने की बात काल्पनिक और निराधार है,दरअसल एक छिपी हुई धमकी है:आप यह कहने की हिम्मत भी कैसे कर रहे हैं.

ग्रीन पीस पर रोक, फोर्ड फाउंडेशन पर पाबंदी, सिविल सोसाइटी संगठनों पर रोक-थाम, तरह-तरह के कानूनी बदलाओं के जारी ताकत को केंद्रीकृत करने की कोशिश:इसके बावजूद लोकतन्त्र के सुरक्षित होने का दावा! संघीय ताने बाने की दुहाई और बिना राज्य सरकार से बात किए अरुणाचल प्रदेश में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट लागू करना, जी.एस.टी. क़ानून के जारी राज्य की टैक्स की कमाई को हथियाने की कवायद!

प्रधान मंत्री के बयानों के बारे में अब उनके दल के अध्यक्ष के हवाले से कहा जाने लगा है कि वे तो बातें हैं, बातों का क्या! लेकिन आपको अगर इसका गंभीरता से अध्ययन करना हो तो आपको राष्ट्रीय स्वयंसेवक  संघ के भाषा-व्यवहार को देखना होगा. यह समझना होगा कि कि उसने अपने इरादों को  हमेशा सह्ब्दों  की आड़ देकर छिपाए रखा है.आपको अटल बिहारी वाजपेयी के भाषणों का विश्लेषण करना होगा. फिर शब्द और मंशा के बीच की खाई दिखाई पड़ेगी.

शब्द ताकतवर के कली अकसर ढाल का काम करते हैं. उन्हें सामने रखकर वे किसी भी हमले का समना कर ले जाते हैं. लेकिन आखिर जॉर्ज ऑरवेल ने बताया है कि कैसे भाषा तानाशाहों के हाथ आकर मायने खो देती है. भारत के ली यह ऐसा ही वक्त है. शायद ही इसके इतिहास में ऐसा मौक़ा कभी आया हो कि शब्द जो कहे जाते हों, उनके मायने ठीक उसके उलट हों.

 

 

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