बंगाल क्या पार्टी-समाज ही रहेगा? (West Bengal elections the question goes beyond win-loss)

दुर्जय मंडल ने कल अपना वोट डाला.सर फटा होने के बावजूद वे मतदान केंद्र पर गए. सर कोई गिरने या टकराने से नहीं फूटा या फटा था. उन्हें वोट देने से रोकने के लिए उनपर हमला किया गया था. वे हल्दिया के गोपालपुर में रहते हैं और ठेके पर मजदूरी करते हैं.

लेकिन उनकी बड़ी पहचान यह है कि वे सीपीएम की ट्रेड यूनियन सीटू के सदस्य हैं .बल्कि कहें, एकमात्र पहचान. इसीलिए उन्हें शासक दल तृणमूल के लोगों ने धमकाया था कि वोट न दें. लेकिन मतदान की पिछली रात उन्होेंने मतदान केंद्र पर जाने का अपना इरादा जाहिर किया. इसकी सजा उन्हें फौरन दी गई.

दुर्जय सस्ते छूट गए. अगर आप पिछले दिनों के बंगाल के अखबार पलटें तो हमले, ह्त्या की वारदातों की खबरों की तादाद से आप हैरान रह जाएंगे. हर जगह किस्सा एक-सा है.शासक दल की ओर से अपने विरोधी दलों के समर्थकों को चेतावनी के लिए मारपीट, बमबाजी, हर तरह की हिंसा.

यह खबर आयी कि नंदीग्राम में केंद्रीय सुरक्षा बल को मतदान केंद्रों तक पहुँचने से रोकने के लिए सड़क खोद डाली गयी. बगल के खेजुरी में भी यही करने की कोशिश हुई.ऐसा और जगहों पर भी किया गया .कोलकात के पुलिस प्रमुख ने मतदान ठीक से संपन्न करवाया तो मुख्यमंत्री ने ही उन्हें धमकी दी कि पंद्रह दिन की बादशाहत तो खत्म होगी ही. यानी,अभी भले बंगाल में चुनाव आयोग का नियंत्रण हो, चुनाव के बाद तो पुलिस को उन्हीं के साथ रहना होगा!

दुर्जय मंडल अकेले नहीं .उनके साथ उन्हीं की तरह के सौ मजदूरों ने और वोट डाला. ये सब वे हैं जिन्हें पिछले दिनों काम नहीं मिल रहा है. वह भी इसीलिए कि वे शासक दल के प्रमुख विरोधी पक्ष की यूनियन के सदस्य हैं.फिर भी धमकी, भय के बावजूद इन सबने वोट डाला.

इसके पहले यह खबर आ चुकी है कि एक छोटे बच्चे ने पतंग बनाने के लिए जब तृणमूल कांग्रेस का एक पोस्टर फाड़ लिया तो उसे पीट-पीट कर अधमरा कर दिया गया .

भारत में नवजागरण के अग्रदूत बंगाल की इस हिंसा कैसे समझें? उसके पहले इसे देखें कि बंगाल में हर व्यक्ति की पहचान एक स्तर पर, बल्कि ज़्यादातर मामलों में उसकी पार्टी पहचान में ही शेष कर दी जाती है. कहा जा सकता है कि उसके बिना किसी का अस्तित्व सम्भव ही नहीं. यह बात शहरों से अधिक गाँवों के लिए सही है.हर कोई कर किसी को जानता है,इसलिए राजनीतिक पहचान को छिपाना मुमकिन नहीं. इस तरह हर मतदाता चिह्नित है. बंगाल में गुप्त मतदान जैसी कोई कोई चीज़ नहीं.

शहरों में पाड़ा या मोहल्ले प रक्लब यही काम करते हैं, यानी हर व्यक्ति की राजनीतिक पहचान को चिह्नित करना और फिर उसके साथ कैसे बर्ताव किया जाए, तय करना. क्लब एक तरह से सामाजिक जीवन को अपने काबू में रखने के लिए राजनीतिक दलों के उपकरण बन गए हैं.वे हर किसी की हर गतिविधि पर निगाह रखते हैं.इस प्रकार शायद ही कोई घर हो जो राजनीतिक दलों के लिए अनजाना हो .हर किसी की पसंद और उसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता बिलकुल खुली हुई है .

बंगाल में होनेवाली दुर्गापूजा भी पार्टी-प्रभुत्व को बनाए रखने और उसका दायरा बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाती है. उसका धार्मिक या आध्यात्मिक पक्ष प्रायः धूमिल हो गया है. बंगाल से दूर रहनेवालों के लिए ताज्जुब की बात थी कि सीपीएम भी दुर्गापूजा में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती है. सीपीएम उसे नितांत भौतिक या सांसारिक उद्देश्य के लिहाज से देखती है . एक समय तक वाम समर्थक इसे सांस्कृतिक पक्ष में वाम की भागीदारी कहकर इस का समर्थन करते रहे.

इस पर किसी ने गौर नहीं किया कि पूजा का यह संसारीकरण क्या उचित था या क्या उसे स्वीकार करना चाहिए? प्रत्येक मानवीय अनुभव या गतिविधि को सांसारिक मकसद से इस्तेमाल की वस्तु में बदल देना क्या मार्क्सवाद के अनुरूप था जो उपयोगितावाद का विरोधी है? लेकिन इस पर बहस भी नहीं हुई. एक चतुर रणनीति मानकर ,कि यह आपको हर घर से परिचय और उसमें प्रवेश का अवसर देती है, इसे कबूल कर लिया गया .

ध्यान दें तो बड़ी भयानक बात लगती है कि आप एक ऐसे समाज में रहे जहां आपका हर कुछ उघाड़ हो, और उससे भी आगे आपकी ज़िंदगी के हर पक्ष पर सत्ता अपनी राय भी देती रहे.

बंगाल में घर की खरीद-बिक्री, शादी-ब्याह या रिश्ता, हर कुछ ही पार्टी की निगरानी में है.इस तरह समाज पूरी तरह पार्टी-समाज में बदल गया है.

यह कोई तृणमूल के समय में, पिछले पांच वर्षों में हुआ हो, ऐसा नहीं. इसे वाम मोर्चे के पैंतीस वर्षों के शासन में सामाजिक स्वभाव बना दिया गया. उसी तरह समाज में विरोध को पूरी तरह निर्मूल कर देना भी उचित मान गया.   ऐसा समाज, जहाँ प्रतिपक्ष के प्रति कोई सहिष्णुता न हो, और कुछ हो, जनतांत्रिक तो नहीं है .

बंगाल में गाँव से लेकर सबसे परिष्कृत और आधुनिक परिसरों यानी विश्वविद्यालयों को भी इसी तरह पार्टी के इस्तेमाल की जगह में बदल दिया गया. आश्चर्य यह है कि इस प्रक्रिया का प्रभावी मुखर विरोध नहीं हुआ. आखिर इसका निर्णय भी समय ने किया, उस कहावत के मुताबिक़ कि पाप का घड़ा जब पूरा भर जाए, तभी कुछ होता है.

बंगाल में समाज का पार्टी लाइन पर ऐसा तीव्र विभाजन उसके स्वास्थ्य के लिए ठीक न था, इसे पहचानना चाहिए था. इसे भी कि हर तरह सिर्फ अपनी तस्वीर देखने की जिद एक भ्रम पैदा करती है. इससे आप में एक मूर्खतापूर्ण निश्चिंतता आ जाती है और आप को लगता है कि सब कुछ ठीक है.जबकि अंदर अंदर फोड़ा पक रहा होता है.

बंगाल में वाम मोर्चे को, खासकर सीपीएम को यही खुशफहमी रही कि उसने समाज का पूरी तरह पार्टीकरण कर दिया है और अनंत काल के लिए अब उसका राज्य स्थिर हो गया है.लेकिन अचानक जो लोहे सा मजबूत लग रहा था , वह बालू का किला निकला.

वाम मोर्चे ने इस बार कांग्रेस पार्टी से समझौता करके चुनाव लड़ा है और उसे वापस पाँव जमाने का मौक़ा दीख रहा है. लेकिन उसने सार्वनजिक तौर पर अपने पिछले राजनीतिक स्वभाव की कोई समीक्षा की हो, इसके प्रमाण नहीं हैं.

तृणमूल कांग्रेस क्यों सीपीएम का अक्स बन गयी? क्यों उसके समर्थक बुद्धिजीवियों ने अब तक इस पर चुप्पी रखी? क्यों सीपीएम के खिलाफ हिंसा उन्हें सह्य थी? क्यों वे देख न पाए कि हिंसा का शिकार तो मनुष्य होता है, अमूर्त पार्टी नहीं. ज़ख़्मी, अपाहिज होता है आदमी, मरता वही है. क्यों इस मामूली बात को समझा नहीं जा सका? क्यों व्यक्ति को पार्टी मानकर उसके साथ हर व्यवहार का औचित्य खोजा गया?

लेकिन दुर्जय मंडल में दुर्जय क्या है? मृत्यु के भी सामने मनुष्यता का कौन सा तत्त्व उठकर खड़ा हो जाता है? सत्ता   अपने मद में मनुष्यता के इसी पक्ष को भूल जाती है. तृणमूल इस बार बंगाल में सत्ताच्युत होती है या नहीं, इससे बड़ा प्रश्न बंगाल में मनुष्यता के पुनर्वास और पार्टी से उसकी मुक्ति का है .

(7 मई, 2016 के सत्याग्रह में पूर्व प्रकाशित)

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