युवावस्था का टूट जाना किसी समाज के लिए अच्छी खबर नहीं होती

रोहित वेमुला की आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया है. रोहित जैसे युवा की ऐसी मौत हम सारे प्रौढ़ों के जीवन के खिलाफ सख्त टिप्पणी भी है.यह दुनिया आखिरकार हम चलाते हैं,जिसके नियम-कायदों की जकड़ में जाने कितने युवा सपनों का दम घुटकर रह जाता है. हम धीरे-धीरे बेहिस हो जाते हैं और उस बेचनी को समझ पाने में असमर्थ भी जो रोहित जैसे युवाओं में एक ‘हड़बड़ी’ भर देती है. उस युवापन का सम्मान करना, इसके क्षोभ को जगह देना अक्सर हमारे लिए संभव नहीं होता.

आलोचक नंदकिशोर नवल ने कभी बनारस की एक सभा का एक प्रसंग सुनाया था. सारे ब्योरे याद नहीं लेकिन मुख्य बातें स्मृति में अटक गई हैं:हजारी प्रसाद द्विवेदी का व्याख्यान चल रहा था. उसके बीच सभागार में धूमिल आए.कुछ देर वे सुनते रहे,फिर अचानक क्रुद्ध स्वर में चीख पड़े:आपको कुछ मालूम नहीं, गाँव के बारे में आप कुछ नहीं जानते. सन्नाटा छा गया,द्विवेदीजी बैठ गए.बाहर निकलते समय वे धूमिल के पास रुके, उनके कन्धों पर हाथ रखा और कहा, ‘इस आग को बुझने मत देना.’

हम अक्सर इससे उलट सलाह अपने युवाओं को देते हैं.उन्हें समझदार होने,दुनिया को समझकर उसके नियम-कायदों के मुताबिक़ चलने का मशविरा ही उन्हें हमसे मिलता है.उनके विद्रोही आचरण को हम वयस्क-मोद भाव से देखते हैं और कहते हैं कि यह ज्वार उतर जाएगा.फिर भी कुछ ऐसे होते हैं जिनके लिए इस भाव का कभी अस्त नहीं है.उन्हें भी उनके समवयस्क मोद-भाव से ही देखते हैं और सर हिलाते हैं:यह बड़ा नहीं हो सका.

विद्रोह,क्षोभ युवावस्था का स्वभाव है.युवावस्था का अर्थ है नवीनता,एक नूतन ऊर्जा जिसे जज्ब करने की क्षमता जड़ ढाँचों में नहीं होती.इन ढाँचों की हिफाजत इस युवावस्था को कुचले बिना करना संभव नहीं है.

लेकिन युवा एक ऐसी श्रेणी नहीं जिसमें सब समा जाएं.क्या युवावस्था सिर्फ इससे तय होगी कि कौन अठारह से पचीस या तीस के दायरे में है? क्या इस वयवृत्त में आने वाले सभी युवापन का दावा कर सकते हैं?

क्या वे भी युवा हैं जो स्थापित ढाँचे की सुविधा के साए से कभी निकले नहीं और उसकी ईंट या कंगूरा बन कर रहने की ही जिनकी आकांक्षा है?

विश्विद्यालय अठारह से पचीस आयु समूह के युवाओं का परिसर है.लेकिन ये सब एक तरह के नहीं हैं.इनमें से कुछ ऐसे निकल आते हैं जो पाठ्यक्रम से बाहर दुनिया को देखने-समझने की कोशिश करने लगते हैं, जो सिर्फ उनके हॉस्टल में दाल ठीक बनी या नहीं पर उत्तेजित होने की जगह यह देखते हैं कि हॉस्टल की हिफाजत के लिए जो सुरक्षा-गार्ड रखा गया है, उसे उसकी पूरी पगार मिल रही है या नहीं, कि विश्वविद्यालय में जो नई इमारत बन रही है उसमें लगे कामगारों को श्रम-कानूनों के मुताबिक़ मेहनताना मिल रहा है या नहीं.जो सिर्फ अपने पाठ्यक्रम के बारे में आधिकारिक राय से सहमत नहीं हो जाते और उस ज्ञान की भी जांच करते हैं.

असहमति और प्रतिरोध युवावस्था को परिभाषित करते हैं. एक और चीज़ जो युवावस्था की खासियत है, वह है अपने पहचाने,सुरक्षित दायरे से निकलने और नए दूसरे से रिश्ता बनाने की ललक और तड़प. और इन सबके लिए जोखिम उठाने की हिम्मत.

यह कहा जा सकता है,भारत के सन्दर्भ में कि कोई युवा राष्ट्रवादी नहीं हो सकता.वैसे ही हर युवा का नारीवादी होना अनिवार्य है और हाशियापरस्त होना भी. जो युवा होगा,वह पूँजीवाद का हामी नहीं हो सकता.

हर वयस्क की अपनी युवावस्था की एक स्मृति होती है. बेहतर हो कि वह उस स्मृति को नए युवा-स्वभाव से बेहतर न ठहराए.

व्यवस्था से युवावस्था का टकराव अवश्यम्भावी है और उसे टूटना ही चाहिए.युवावस्था का टूट जाना या हार जाना किसी समाज के लिए अच्छी खबर नहीं है.

रोहित की मौत इसीलिए हमारे खिलाफ एक टिप्पणी है.उनके पर भी जो उसकी उम्र के तो थे लेकिन कभी जिन्होंने युवावस्था के अर्थ पर विचार नहीं किया.

रोहित की इस आत्महत्या के पीछे के क्षोभ को जीवित रखना ही युग धर्म है, जिसका मतलब है भारत में जातिगत भेदभाव की क्रूरता की सचाई को पहचानना,अपने जन्म और समाज की सीमाओं की घुटन को समझना, नये रिश्ते बनाने के संघर्ष की कठिनाई को महसूस करना.

रोहित जैसे युवा के साथ गतयुवा पीढ़ी का रिश्ता क्या हो? नागार्जुन की आज से चालीस साल पहले की एक कविता मैं तुम्हें अपना चुम्बन दूँगा याद आ गई:

तुम उनकी साजिशों को खत्म कर डोज

तुम प्रवंचना की उनकी कुटिल चालों का अंत कर दोगे

हत्याएँ करने-करवाने की-

ठंडी फाँसियाँ देने-दिलवाने की

चुपचाप ज़हर घोलने-घुलवाने की

कारागार की नारकीय कोठरियों में मानवता को गलाने-गलवाने की-

यानी, उनकी एक-एक साजिश को

तुम खत्म कर दोगे

हमेशा-हमेशा के लिए !

…..

…..

मैं तुन्हीन को अपनी यह शेष आत्मा अर्पित करूँगा

मैं तुम्हारे ही लिए जीऊंगा, मरूँगा

मैं तुम्हारे ही इर्द-गिर्द रहना चाहूँगा

मैं तुम्हारे ही प्रति अपनी वफादारी निबाहूँगा

…..

..

आओ भई, सामने आओ !

मैं तुम्हारा चुम्बन लूँगा

मैं तुममें से एक-एक का सर सूंघूंगा

आओ भई, सामने आओ !

मुझ पगलेट के साथ बातचीत करो

हँसो-खेलो मेरे साथ

मैं तुम्हारी जूतियाँ चमकाऊंगा

दिल बहलाऊँगा तुम्हारा

कुछ भी करूँगा तुम्हारे लिए…

मैं तुम्हें अपना चुम्बन दूँगा….

 

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