गाँधी की भारत वापसी

जनवरी,2015 को गाँधी की भारत वापसी की सदी के तौर पर मनाया जा रहा है. लेकिन जनवरी से गांधी का जुड़ाव और भी कई स्तरों पर है. जनवरी में ही गांधी ने अपने जीवन का आखिरी उपवास किया . जनवरी खत्म होने को ही थी कि गाँधी के ज़िंदगी ख़त्म कर दी गई. इसलिए जनवरी गांधी और भारत के बीच के रिश्ते को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण महीना है. इसकी शुरुआत भारत और गांधी के  प्रेम प्रसंग के आरंभ से होती है जो बत्तीस साल चलने वाला था. इसका मध्य गांधी के साथ भारत के संघर्ष का समय है. वे अपने ही मुल्क से लड़ रहे थे और हारा हुआ महसूस कर रहे थे.और इसका अंत भारत की गाँधी से निराशा, कम से कम हिंदू भारत के बड़े हिस्से की निराशा की चरम अभिव्यक्ति थी. गांधी उसके लिए गैरज़रूरी ही नहीं हो चुके थे, उनका और जीवित रहना भारत के लिए खतरनाक हो सकता था. इसलिए जब नाथूराम गोडसे ने उन्हें गोली मारकर उनकी इहलीला समाप्त कर दी तो अनेकानेक घरों में चूल्हा नहीं जला लेकिन दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों और समर्थकों ने मिठाइयाँ बांटी और दीवाली मनाई. आज वह संघ भारत की सत्ता पर काबिज है.तो यह मौका है विचार करने का कि क्या अंतिम रूप से गाँधी के विचार को विदाई दे दी गई है.

बारह जनवरी,1948 को गांधी ने अपनी शाम की प्रार्थना सभा में अगले दिन से बेमियादी उपवास का ऐलान किया. गाँधी अठहत्तर साल के हो चुके थे. वे उपवासों के माहिर थे और हर बार उनमें से निखरकर निकल आए थे. लेकिन इस थकी देह और उम्र में इस फैसले ने पूरे देश को चिंता और हैरानी में डाल दिया.गांधी की मांग इस बार अपने लोगों से थी. खासकर हिंदुओं से.वे हिंदुओं, सिखों और मुसलामानों के दिलों के मिलने की मांग कर रहे थे.

1946-47 गाँधी ही नहीं देश के सभी नेताओं के लिए बेहद थकान भरे साल थे. आज़ादी करीब आ रही थी.लेकिन यह दो मुल्कों के बनने का वक्त भी था.पूरे देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अकल्पनीय हिंसा भड़क उठी थे. दोनों  ही अमानवीयता के चरम को छूने को बेताब थे.  जिन्ना की सीधी कार्रवाई के ऐलान ने कलकत्ते में कत्लोगारत की शुरुआत कर दी थी. गांधी वहां गए और उपवास पर बैठ गए.सुहरावर्दी,जो हिंसा के प्रतीक थे,आए और माफी माँगी.कलकत्ते में अमन कायम हुआ.

बारह जनवरी को गांधी ने कहा, “ जब मैं नौ सितंबर को कलकत्ते से दिल्ली लौटा तो इरादा पश्चिम पंजाब जाने का था.लेकिन वह न होने को था. खुशदिल दिल्ली मुर्दों का शहर लग रही थी.मैं ट्रेन से जब उतरा तो हर चेहरे पर उदासी पुती थी…सरदार प्लेटफ़ॉर्म पर मौजूद थे…उन्होने बिना वक्त गँवाए मुझे इस महानगर की गड़बड़ियों के बारे में बताया.मैंने फौरन समझ लिया कि मुझे दिल्ली में ही होना है और ‘करना है या मरना है’.”

फौज और पुलिस की वजह से ऊपरी अमन था लेकिन  दिलों में तूफ़ान था.वह कभी भी फूट पड़ सकता था. “इससे मेरा ‘करने’ का संकल्प पूरा नहीं होता था, और वही मुझे मौत से अलग रख सकता था, मौत जो अतुलनीय मित्र है.”

जिस दिल्ली में जाकिर हुसैन इत्मीनान से न चल-फिर सकें, वह उनकी नहीं हो सकती थी. गांधी ने अपने करने को नाकाफी मानकर मौत की तरफ कदम बढाने का फैसला किया. कल तक जो एक थे, वे हिंदू और मुसलमान जब तक उन्हें यकीन न दिला दें कि उन्होंने आपसी रंजिश मिटा दी है और साथ-साथ रहने को तैयार हैं, वे उपवास नहीं तोड़ेंगे.

दिल्ली पाकिस्तान से आए शरणार्थियों से भरी हुई थी.उनके साथ पाकिस्तान में हिंदुओं पर हुए ज़ुल्म की भयानक कहानियां भी आई थीं. यहाँ मुसलमानों पर हमले हो रहे थे,वे अपने इलाकों को छोड़ने को मजबूर थे.मस्जिदों को तोड़ा और मंदिरों में बदला जा रहा था.महरौली के ख्वाजा कुतुबुद्दीन के मजार पर हिन्दुओं का कब्जा हो गया था.

गांधी की मांग थे कि शरणार्थी हिंदू और सिख मुस्लिम घरों और पूजा स्थलों से निकलें.ये पाकिस्तान से अपना सब कुछ खो कर आए थे और यहाँ उनसे जनवरी की कडाके की ठंड को झेलने को कहा जा रहा था.वे गाँधी के उपवास से बेहद नाराज थे. दिल्ली में ‘मरता है तो मरने दो’ के नारे लग रहे थे.गाँधी अविचलित थे.

वे पाकिस्तान जाना चाहते थे और वहां मुसलमानों को वही कहना चाहते थे जो यहाँ हिन्दुओं को कह रहे थे. आखिर नोआखाली के हमलावर मुसलमानों की नफरत झेलकर भी उन्होंने उन्हें हिंसा के रास्ते से अलग कर लिया था.लेकिन अगर यहाँ मुसलमानों पर हमले होते रहे तो वे किस मुंह से पाकिस्तान जाएं. उन्होंने बँटवारे की वजह से संसाधनों के बँटवारे में भी भारत से इंसाफ और उदारता की माँग की और पाकिस्तान को उसका हिस्सा देने को कहा.

गाँधी के बेटे ने कहा कि वे उपवास करके गलत कर रहे थे. उनके जीवित रहने पर लाखों जानें बच  सकती थीं. गाँधी ने बेटे की अपील भी ठुकरा दी.

गाँधी का यह उपवास सत्रह तारीख तक चला. दिल्ली और भारत ही नहीं पूरी दुनिया की निगाहें इस विचित्र उपवास पर लगी थीं. एक सनातनी हिंदू अपने ही धर्मवालों से इस उपवास के जरिए बहस कर रहा था.वह उन्हें अपने ह्रदय को जाग्रत करने को कह रहा था.यह तकरीबन नामुमकिन माँग थी.

गाँधी मुसलमानों से किसी भी वफादारी के ऐलान की मांग के खिलाफ थे. जिन मुसलमानों ने यहाँ रहने का फैसला किया था, उनपर शक करना गुनाह था. भारत को धर्म-निरपेक्ष होना था. क्या यह प्रयोग नाकामयाब हो जाएगा? फिर गाँधी के बचे रहने का भी कोई मतलब न था.

सत्रह जनवरी को राजेन्द्र प्रसाद के घर पर करोल बाग़ , पहाडगंज, सब्जी मंडी और दूसरे इलाकों के अगुओं की बठक हुई. शरणार्थी शिविरों के हिन्दुओं और सिखों ने इस वादे पर दस्तखत किए कि वे मुस्लिम मिल्कियत वाली जगहों को और मस्जिदों को खाली कर देंगे.

अठारह की सुबह सब फिर राज्नेद्र प्रसाद के घर इकठ्ठा हुए और दुबारा संकल्प पर गौर किया. फिर सब गांधी के पास पहुँचे. राजेंद्र बाबू ने उनकी ओर से गाँधी को विश्वास दिलाया कि सबने सच्चे ह्रदय से हिंसा और दुराव ख़त्म करने का निर्णय किया है.महरौली के ख्वाजा का सालाना उर्स भी पहले जैसे ही मिल कर मनाया जाएगा.

आठारह तारीख को भारत में यह अनोखी घटना हुई. साम्प्रदायिक सौहार्द का घोषणा पत्र हिंसा के बीच सबने कबूल किया. गाँधी ने इसके बाद दिन के पौन बजे अपना उपवास तोड़ा.

गाँधी के इस उपवास ने धर्मनिरपेक्ष भारत की नींव रखी. जाहिर है, वे उनकी आंख में सबसे बड़े दुश्मन हुए जो इसे पाकिस्तान की तर्ज पर हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते थे. शपथ तोड़ना किसी भी धर्म में पाप माना जाता है. लेकिन उनकी नज़रों में गांधी ने भारत में मुसलमानों की इज्जत, हिफाजत और बराबरी  का इंतजाम करके सबसे बड़ा पाप किया था. इसके लिए उन्हें सजा दी जानी ही थी.

उपवास खत्म होने के बाद गाँधी की प्रार्थना सभा पर बम विस्फोट हुए और मदन लाल पहवा नाम का व्यक्ति गिरफ्तार हुआ. नाथूराम गोडसे, जो अपने दल के साथ दिल्ली में डेरा डाले था, इसके बाद यहाँ से निकल गया,लेकिन वह फिर लौटा. तीस जनवरी को वह प्रार्थना सभा की ओर जाते हुए गांधी के आगे रुका, उसने उन्हें प्रणाम किया और फिर  उनपर गोलियाँ दाग दीं.

  • जनवरी, 2015
Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s