सोनी सोरी भी मादरे हिन्द की बेटी है

सोनी सोरी भी मादरे हिन्द की बेटी है.लेकिन भारत माता की इस पुत्री पर  भारत माता के राष्ट्रवादी रक्षकों ने फिर हमला किया है.मैं जब ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ,सोनी सोरी दिल्ली पहुँच चुकी हैं.अपोलो अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है.

इसके पहले वे जगदलपुर के महारानी जिला हस्पताल में अपने पुलिस और सैन्य बालों से घिरी हुई थीं. पिछली रात उन्हें जगदलपुर से गीदम के रास्ते में, जहां उनका घर है, घेर लिया गया. वे मोटर साइकिल पर पीछे बैठी थीं और उनकी सहकर्मी  रिंकी मोटर साइकिल चला रही थीं. रिंकी को चाकू दिखाया गया और सोनी को कुछ दूर ले जाकर  कर उनपर हमला किया गया. उनके चेहरे पर कोई जलनेवाली चीज़ मल दी गई,जिससे उनका चेहरा सूज गया  और उन्हें दिखलाई नहीं दे रहा है.उन्हें बोलने में भी परेशानी हो रही है.अभी उनकी सूजन खत्म हो गई है लेकिन देखने और बोलने में दिक्कत बनी हुई है.

आज सुबह उन्होंने किसी तरह बताया कि जिन लोगों ने उनपर हमला किया उन्होंने धमकी दी कि अगर उन्होंने मारडुम की मुठभेड़ का मामला उठाना बंद नहीं किया और वहाँ के पुलिस अधिकारियों के खिलाफ जाँच और  कार्रवाई की माँग बंद नहीं  की तो यही सलूक उनकी बेटी के साथ भी किया जाएगा.

यह दिलचस्प है कि पुलिस ने तुरत कहा कि मामला गंभीर नहीं है. सोनी सोरी के चेहरे पर सिर्फ कालिख पोती गई है.यह  सुनकर फौरन दिल्ली पुलिस प्रमुख का बयान याद आ गया जिसमें उन्होंने कहा था कि दिल्ली की पटियाला अदालत में कन्हैया पर हमला नहीं हुआ, मामूली धक्का-मुक्की हुई है.

एन एन आई ने उनके सूजे हुए चेहरे की जो तस्वीर ट्विटर पर प्रसारित की है,उसपर ऐसी टिप्पणियाँ आई हैं कि यह सब कुछ नाटक है, कि वे चेहरे पर पेंट लगाकर बैठी हैं.

सोनी आदिवासी हैं.और वे आदिवासियों पर हो रहे जुल्म का लगातार विरोध कर रही हैं.वे हाल में बस्तर के मारडुम में  हुई एक फर्जी मुठभेड़ की जाँच की माँगकर रही थीं.इस मुठभेड़ में हिडमा नाम के एक आदिवासी को मार डाला गया था. पुलिस ने दावा किया कि हिडमा इनामी नक्सल है. लेकिन हिडमा के गाँववालों ने पुलिस के मुठभेड़ के दावे को गलत बताया और कहा कि हिडमा को उसके घर से उठाकर पुलिस ले गई थी.उन्हें उस पुलिस ऑफिसर का नाम भी याद था जो वहाँ आया था. सोनी इन गाँव वालों को यह सच दुनिया को बतलाने मदद करने के लिए रायपुर ले गई थीं और उनकी प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करवाई थी. वे इस घटना के लिए ऍफ़.आई.आर दायर करवाने की कोशिश कर रही थीं. वे इसके पहले भी आदिवासियों पर सुरक्षा बालों के हमले का विरोध करती रही हैं. इसके लिए वे कानूनी रास्ता अपनाती हैं और जनतांत्रिक गोलबंदी का भी.

सोनी को इन सबके लिए धमकियां  रही थीं और इस हमले के पहले भी उन्हें सावधान किया गया था.

आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने का संकल्प हमारी राष्ट्रीय पार्टियां करती रही हैं.वे आदिवासियों पर यह आरोप लगाती रही हैं कि वे संसदीय राजनीति की जगह माओवादी राजनीति का साथ दे रहे हैं.इसकी सजा उनके घर उजाड़कर, उनके मुर्गे, बकरियाँ लूट कर, उनकी फसल  और फिर गाँव के गाँव जलाकर  दी जा रही है. पिछले दस साल से भी ज्यादा से भारतीय राज्य का यह भयानक आक्रमण छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर चल रहा है.

यह बात हमारे सामने साफ़ होनी ही चाहिए कि यह सब माओवादियों के सफाए के नाम पर हो रहा है लेकिन यह तब भी होता जब माओवादी वहाँ नहीं होते. आदिवासियों की जमीन हड़पे बिना अब भारत और विश्व के पूँजीवाद की भूख मिट नहीं सकती. उसे इस जमीन में दबे खनिज चाहिए और इसके लिए जिसकी भी बलि देनी हो, वह इसके लिए तैयार है.

सोनी सोरी आदिवासी हैं और शिक्षित हैं. वे अध्यापिका थीं.वे अपने जनतांत्रिक अधिकारों से परिचित हैं और उनका प्रयोग करना चाहती हैं. सिर्फ अपने लिए नहीं अपने आदिवासी बंधुओं के लिए भी.

भारतीय राष्ट्र नहीं चाहता कि आदिवासियों को जुबान मिले. इसलिए सोनी सोरी को सजा दी गई. उनपर हमला हुआ, वे गिरफ्तार हुईं,उनके साथ पुलिस ने बलात्कार किया. उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के कारण वे अभी आज़ाद हैं.

सोनी सोरी आज़ाद हैं और नहीं हैं. वे ऐसे राज्य में हैं जहाँ आप पुलिस और पुलिस के साथ मिले गुंडों की मेहरबानी पर ही ज़िंदा हैं. अभी इसी हफ्ते जगदलपुर लीगल ऐड ग्रुप की शालिनी गेरा और इशा खंडेलवाल को उनका मकान ही नहीं जगदलपुर छोड़ने को मजबूर कर दिया गया. वे अभी ढाई साल पहले आदिवासियों को कानूनी मदद दिलाने के खयाल से दिल्ली, मुम्बई जैसे शहरों की महानगरीय सुविधा छोड़कर जगदलपुर गई थीं. ऐसा ही मालिनी सुब्रमण्यम के साथ हुआ जो अंतर्राष्ट्रीय गैरसरकारी संस्था का अपना काम छोड़कर छत्तीसगढ़ के असली हालात से दुनिया को परिचित कराने के विचार से वहाँ रह कर पत्रकारिता कर रही थीं.

शालिनी और ईशा पर लंबे समय से दबाव बढ़ रहा था. पहले वहाँ के वकीलों ने, पुलिस ने उनके खिलाफ अभियान चलाया और उन्हें वकालत करने में हर संभव रुकावट डाली. पुलिस की मिलीभगत से उनके खिलाफ पर्चे निकलवाए गए. बस्तर के पुलिस प्रमुख ने उनके बस्तर छोड़ने को उचित ठहराते हुए कहा कि वे स्थानीय लोगों का रोजगार छीन रही थीं.

लिखने  की तैयारी में जब मैंने अपने मित्र पत्रकार आलोक पुतुल को फोन किया तो उन्होंने बताया कि वे किसी तरह सुरक्षित बस्तर से वापस रायपुर पहुँचे हैं. वे दस दिन रहकर रिपोर्टिंग के इरादे से वहाँ गए थे और रास्ते में ही सर्वोच्च पुलिस अधिकारियों  को अपने आने की खबर तो की ही थी,उनसे मिलने का वक्त भी माँगा था.लंबे समय तक कोई जवाब नहीं आया. इसी बीच सोनी सोरी पर हमले की घटना हुई. आलोक ने इसकी रिपोर्ट की.

इस रिपोर्ट के जारी होते ही उनके पास दोनों ही पुलिस आधिकारियों के सन्देश आए. उन्होंने आलोक को दुत्कारते हुए कहा कि उनकी तरत के पूर्वग्रहग्रस्त पत्रकारों के लिए उनके पास समय नहीं है. उनके पास राष्ट्र के लिए करने को बहुत कुछ है और वे उनपर यह कीमती वक्त बर्बाद नहीं कर सकते. एक ने कहा कि उन्हें आलोक जैसे पत्रकारों की ज़रूरत भी नहीं,कई राष्ट्रवादी पत्रकार उनके साथ काम कर रहे हैं.

आलोक को बताया गया कि बे खतरे में हैं और उन्हें सुरक्षित जगह लौट जाना चाहिए.वे किसी तरह रायपुर लौते.

रायपुर भी छत्तीसगढ़ है और बस्तर या दंतेवाड़ा भी. लेकिन ये दोनों  अलग-अलग राज्य हैं.रायपुर हवाई अड्डे से शहर जाते और लौटने आपको इसका नदाज भी नहीं होगा कि जिस राज्य की यह राजधानी है, उसी में उसी वक्त आदिवासियों की  नकली मुठभेड़ में ह्त्या की जा रही होगी.

बस्तर को माओवादग्रस्त इलाका कहा जाता है. भारतीय राज्य का कहना है कि वह उसे माओवादियों के चंगुल से आज़ाद करने के उपाय कर रहा है. ये दुखदाई हो सकते हैं लेकिन आवश्यक हैं.

जो दीख रहा है वह यह कि बस्तर एक अतिवादी,विकासवादी राष्ट्रवाद की चपेट में है और वह भारतीय संविधान की दायरे से बिलकुल बाहर कर दिया गया है. वहाँ भारतीय नागरिकों को वे अधिकार नहीं हैं जो बिहार, उत्तर प्रदेश या दिल्ली में हैं.आदिवासी दोयम दर्जे के नागरिक हैं और उन्हें कमतर इंसान माना जा रहा है.

आदिवासी और ‘सभ्य’ भारत एक दूसरे से संवाद न  कर सकें, इसके सारे उपाय छत्तीसगढ़ की पुलिस और सरकार कर आरही है.

क्या भारत की सबसे ऊँची अदालत अपनी निगाह इस अभागे प्रदेश की और फेरेगी? क्या वह इस इलाके को भारतीय राष्ट्रवादी सुरक्षा बल के कब्जे से आज़ाद करने मेंकोई पहल करेगी? क्या वह छत्तीसगढ़ में भारतीय क़ानून का शासन बहाल करेगी?

क्या ये सवाल सिर्फ सोनी सोरी के होने चाहिए? और क्या इसकी कीमत उन्हें देते हुए हम देखते रहें?

 

 

 

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