हिंसा की भर्त्सना

छत्तीसगढ़ में 17 मई के बम धमाके में एक सवारी बस को उड़ा दिए जाने से चालीस से  ज़्यादा लोगों की मौत क्रूरता और  बेरहमी कीउस किताब का नया अध्याय भर है जो छत्तीसगढ़ और दूसरे राज्यों में लिखी जा रही है. इस हत्या के समाचार के साथ ही झारखंड में एक कॉंग्रेसी नेता हेमंत बेगे की ह्त्या की खबर आयी. पिछले दस दिनों में हत्याओं का एक सिलसिला सा बन गया : ओडीसा में दो ग्राम रक्षक पुलिस के मुखबिर होने के शक में मार डाले गए. बंगाल में चार ग्रामीणों की ह्त्या सी.पी.एम. के समर्थक और पुलिस मुखबिर होने के चलते की गई.  इस सूची में   सी.आर.पी.ऍफ़ के उन छः जवानों को शामिल नहीं  किया गया है जो दंतेवाडा में एक ज़मीनी  सुरंग के  विस्फोट में मारे गए.
इस तरह की हर ह्त्या के बाद एक शोर सा बरपा हो जाता जाता है जिसमें कुछ भी शान्ति से सोचने का अवसर नहीं रहता. एक तरफ  केन्द्रीय गृह मंत्री शिकायत करते हैं कि उनके हाथ बंधे हुए हैं और यह कि माओवादियों के प्रभाव के राज्यों के मुख्य मंत्री उनसे सहमत हैं कि माओवादियों से मुकाबला करने के लिए वायु-शक्ति की ज़रुरत है, दूसरी तरफ फौरन यह भी कहते हैं कि अगर माओवादी बहत्तर घंटे के लिए भी हिंसा रोक दें तो वे उनसे बात करने को राजी हैं.
ठीक इसी समय क़ानून मंत्री न्यायालयों की जनहित याचिका फौरन सुनने की आदत को माओवादी प्रभाव के विस्तार की एक वजह मानते हैं. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री कहते हैं कि माओवाद-विरोधी अभियान की रणनीति पर फिर से सोचने की ज़रूरत है. उनके पुलिस प्रमुख अपनी रणनीति को बिलकुल ठीक बताते हैं और कहते हैं कि कोया भाषियों से विशेष पुलिस कर्मी भर्ती अभियान जारी रहेगा.यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि ये विशेष पुलिस कर्मी और कुछ नहीं, सस्ते पुलिस कर्मी हैं , जिन्हें भयंकर  बेरोजगारी  और छत्तीसगढ़ की विशेष स्थिति इसका विकल्प  नहीं देती कि वे कुछ और कर सकें. क्या हम नहीं जानते कि सी.आर.पी.ऍफ़. या सामान्य पुलिस दस्तों के पहले सड़क साफ़ करने के लिए इन विशेष पुलिस कर्मियों का इस्तेमाल करने की हिदायत सबको दी गई है ?
यह बात भी अब भुला दी गयी है कि कोई एक साल पहले उच्चतम न्यायालय ने सलवा जुडूम पर सख्त ऐतराज जताया था. केन्द्रीय कानून मंत्री  और गृह मंत्री भी इसे गलत ठहराते रहे हैं. वहीं केन्द्रीय पुलिस सेवा के अधिकारी, जो छत्तीसगढ़ के पुलिस प्रमुख हैं  इसकी शिकायत करते हैं कि सलवा जुडूम को बदनाम किया जा रहा है. गरीब लोगों के लिए जिस तरह शिक्षा कर्मी भर्ती किये जाते हैं और उससे अब मध्य वर्ग को कोई  ऐतराज नहीं, उसी तरह ‘माओवाद-प्रभावित’ इलाकों में , जहां कम कीमत पर अपने जान देने को तैयार लोगों की ज़रुरत है, सलवा जुडूम जैसे अभियान पर भी मध्य वर्ग को कोई शिकायत नहीं. उन्हें ज़्यादा कीमती जानों के लिए सुरक्षा कवच के तौर पर इस्तेमाल किये जाने पर किसी भी ऐतराज़ को हैरानी से देखा जाता है; “क्या हम अपनी सैन्य शक्ति या अर्धसैन्य शक्ति  को यों ही गँवा  दें?”
केंद्रीय गृह मंत्री ऐसी हर घटना के बाद तुरत मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को कठघरे में खडा करते हैं और कहते हैं कि वे क्यों नहीं माओवादी हिंसा की भर्त्सना कर रहे.यह शिकायत आम है. इसके पीछे समझ यह है कि मानवाधिकार-कार्यकर्ता माओवादियों के लिए एक सामाजिक स्वीकृति का माहौल बनाते हैं और माओवादी उनसे नैतिक वैधता हासिल करते हैं.क्या सचमुच ऐसा है? क्या माओवादी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों की वाकई कदर करते हैं और उनकी बात सुनने को उनके कान तैयार हैं? अगर ऐसा है, यानी  अगर इन बुद्धिजीवियों की माओवादी थोड़ी भी परवाह करते हैं तो ऐसा क्यों हुआ कि शान्ति की अपील के साथ प्रोफ़ेसर यशपाल जैसी शख्सियत के छतीसगढ़ दौरे के फौरन बाद माओवादियों ने ज़मीनी सुरंग से सी.आर.पी.ऍफ़. के जवानों को उड़ा दिया? तिरासी साल के  बूढ़े वैज्ञानिक के लिए, जिसका दिल हिन्दुस्तान के गरीब बच्चों के लिए धड़कता है, माओवादियों के मन में इतनी ही इज्ज़त है कि उन्होंने  इस बम विस्फोट से उन जैसों को यह सन्देश दिया कि वे उनकी भावुकता भरी शान्ति की अपीलों का जवाब यह है.
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के प्रभाव को कुछ अधिक ही आंका जा रहा है. इसके साथ इस बात को भी ध्यान में रखें कि मानवाधिकार या लोकतांत्रिक अधिकार के लिए काम करने वालों की जमात में खासी विविधता है. लेकिन यह सच है कि घटनाओं की तीव्रता और उनकी गति ने इन्हें हैरान कर दिया है और वे अपना रवैया कैसे तय करें , यह समझ नहीं  पा रहे.  एक तरफ तो ऐसे लोगों की कमी नहीं जो इस बात पर ही शक करते हैं कि ये हत्याएं माओवादियों ने की होंगी. वे पूछते हैं कि क्या ऐसा तो नहीं कि हिंसा के इस माहौल  का लाभ उठा कर कोइ राज्य समर्थित समूह यह कर रहा हो! ऐसी हर ह्त्या के बाद एक बार यह ज़रूर कहा जाता है कि माओवादी पहले इसका जिम्मा लें , फिर हम अपनी प्रतिक्रिया देंगे. हाँ, वे यह कहते हैं कि अगर वे अपनी भूमिका से इनकार करते हैं , फिर हमें जांच करके पता करना होगा किकिसने यह किया. शायद इसके पीछे यह समझ है कि आखिरकार माओवादी एक अधिक उन्नत मानववादी चेतना से युक्त प्राणी हैं. वे ऐसा जघन्य काम कैसे कर सकते हैं?हत्याओं में फर्क करने को भी कहा जाता है. पुलिस कर्मियों या सैन्य बल के सदस्यों की ह्त्या को भर्त्सना के काबिल नहीं माना जाता. एक मानवाधिकार समूह ने यहाँ तक कहा कि हम सिद्धांततः   सैन्य कारवाई में शामिल लोगों की ह्त्या की निंदा नहीं करते. मौत के प्रति इस  ठन्डे , पेशेवर मानवाधिकारी रवैय्ये से अगर आपकी  रीढ़ की हड्डी सिहर जाती हो तो आपको अपनी भावुकता का इलाज कराने की ज़रुरत है.
जब ये हत्याएं हो रही हैं, तभी ओडीसा में आदिवासी पॉस्को या वेदान्त कंपनियों का विरोध भी कर रहे होते हैं जिनका राज्य दमन कर रहा होता है. या झारखंड में भूमि-अधिग्रहण के विरुद्ध जनता का प्रतिरोध हो रहा होता है और कई मानवाधिकार समूह उनके साथ खड़े होते हैं. इन सबसे स्थिति पूरी तरह उलझ जाती है और विवेक काम करना बंद कर देता है. दो घटनाएं, जिनका एक-दूसरे से कोई  रिश्ता नहीं, राज्य द्वारा  और माओवादियों के द्वारा भी एक दूसरे में  उलझा दी जाती हैं. मसलन अगर ओडीसा में पुलिस गोली चलाए और उसी समय माओवादी छत्तीसगढ़ में हत्याकांड करें  तो मान  लिया जाता है कि दूसरी कारवाई पहले का जवाब है.  राज्य भी अपने हिंसक रवैय्ये की वैधता फौरन माओवादी कार्रवाई  में तलाश लेता है. बुद्धिजीवी भी इन दोनों के बीच कार्य-कारण सम्बन्ध देखते हैं.
जब गृह मंत्री यह कह रहे होते हैं कि वे सारी सैन्य कार्रवाई रोक देंगे तो निश्चय ही इसमें वे पॉस्को या झारखण्ड जैसी पुलिस कारवाई को शामिल नहीं कर रहे. तकनीकी और कानूनी रूप से ये राज्य के अधिकार क्षेत्र में आते हैं. अगर राज्य सरकार के मुताबिक़ क़ानून व्यवस्था संकट में हो तो क्या गृह मंत्री के कहने पर वे पुलिस कार्रवाई रोक देगी ? और अगर ऐसा नहीं हुआ तो माओवादियों के लिए हमेशा यह कहने का मौक़ा रहेगा कि राज्य ने हिंसा नहीं रोकी है और इसलिए वे हिंसा का अपना अधिकार सुरक्षित रखते हैं.
इस बहस में मानवाधिकार समूह कहाँ हैं? क्या वे राज्य की अपेक्षाओं को पूरा करें या क्रांतिकारी अपेक्षाओं पर खरे उतरें? जहां तक माओवादी कार्रवाइयों का सवाल है , इसमें कोई  शक नहीं होना चाहिए कि वे अभी के  किसी पुलिस- दमन या आदिवासियों के शोषण का उत्तर नहीं हैं.  खुद माओवादियों ने कुछ वक्त पहले चिदंबरम के शान्ति-प्रस्ताव की खिल्ली उड़ाते हुए कहा था कि वे जब राजनीति में आये नहीं थे तब से यह युद्ध चल रहा है. अगर यह दीर्घ -जन -युद्ध है तो इसका रुकना मानवतावादी apeel से संभव नहीं. रणनीतिक कारणों से इसमें  कुछ समय का विराम दिया जा सकता है, लेकिन यह स्वयं  क्रान्तिकारियों के अपने शक्ति के आकलन पर निर्भर है और समय की क्रांतिकारी संभावना पर भी. यह मानना भ्रामक होगा कि वे किसी मानवाधिकार समूह के प्रति उत्तरदायी हैं , या हम जिसे जनता कहते हैं , उसके प्रति जवाबदेह हैं. क्रान्ति की उनकी योजना में मानवाधिकार-समूहों की  एक सीमित उपयोगिता है और वहां तक वे उनका इस्तेमाल करने का अधिकार अपने पास सुरक्षित समझते हैं.चूंकि  वे एक उन्नत, वैज्ञानिक विचारधारा से लैस हैं , उनके पास ही इसका अधिकार है कि वे मानवाधिकार-समूहों को यह बताएँ कि वे कब सहे हैं और कब गलत. लोकतंत्र माओवादियों के लिए कोइ आकर्षक अवधारणा नहीं है. इसलिए वे इसे नैय्यायिक सिद्धांतों से परिचालित होने को बाध्य नहीं, न इसके दार्शनिक सिद्धांतों के उनकी परियोजना में कोइ प्रासंगिकता है.
वर्ग-आधारित विचारसरणी में मानव जैसी किसी अवधारणा की गुंजाइश नहीं है.इसलिए माओवादियों से संवाद का स्सोत्र खोज पाना अत्यंत कठिन है, अगर असंभव नहीं तो. अगर वह हुआ भी तो रणनीतिक बाध्यताओं के कारण होगा, संवाद की लोकतांत्रिक सैद्धांतिक स्वीकृति के चलते नहीं. ऐसी किसी भी अवधारणा के लिए क्रांतिकारियों के मन में एक उपहास का भाव ही है. उसे तरह हिंसा और अहिंसा का प्रश्न उनके लिए तो विचारणीय ही नहीं है.
कुछ वक्त पहले झारखण्ड में जब एक आदिवासी पुलिस कर्मी फ्रांसिस इन्दुवार की माओवादियों ने गला काट कर ह्त्या की तो उनके समर्थक भी  हिल गए. माओवादियों को पहली बार निंदा का सामना करना पडा. निंदा करने वाले हालांकि यह याद नहीं  रख पाए कि यह न तो ऐसी पहली घटना थी , न इसमें कुछ अनूठा था. मध्य बिहार और अब झारखण्ड के इलाकों में न जाने ह्त्या के इससे भी अधिक वहशतनाक तरीके माओवादियों और क्रांतिकारियों ने अपनाए थे.  उन्हें उसी तरह याद नहीं  रखा गया जैसे नंदीग्राम के पहले बंगाल और अन्यत्र सी.पी.एम्. की क्रूरताओं की चर्चा करना राजनीतिक रूप से उचित नहीं   माना जाता था.
गला काट कर ह्त्या के इस तरीके पर ऐतराज करते हुए और माओवादियों के विवेक को पर विशवास करते हुए बंगाल के मानवाधिकार -कार्यकर्ता सुजातो भद्र ने उन्हें एक लम्बी चिट्ठी लिखी और यह कहने की कोशिश की कि मृत्युदंड पर 224 देशों ने प्रतिबन्ध  लगा दिया है, फिर यह कितना उचित है कि माओवादी ह्त्या करें. माओवादियों के इस तर्क पर कि वे दरअसल इस दीर्घ जन युद्ध में राज्य के दलालों और मुखबिरों की ह्त्या करते हैं, भद्र ने यह कहने की कोशिश की कि पहले पूरी जांच होनी चाहिए , फिर जुर्म के अनुपात में दंड का प्रावधान होना चाहिए.  भद्र ने अपने पक्ष में यहाँ तक कहा कि मुखबिरों को समाज के सहयोग से  अलग-थलग किया जा सकता है.  उन्होंने माओ के हवाले से समझाने की कोशिश भी कि वे भी अपवादस्वरूप ही गला काटने की सजा देते थे!  गला काटा जा सकता है, अगर वह अपवाद हो तो! करोड़ों की जनसंख्या में अपवाद का निर्धारण कौन करेगा?
सुजातो भद्र के इस पत्र का उत्तर माओवादी किशनजी ने जो दिया उसके पहले अमित भट्टाचार्य के हस्तक्षेप पर विचार करना उपयोगी  होगा. उन्होंने भद्र की अपील के आधार पर सवाल उठाया. उनका कहना था कि मृत्यु दंड पर रोक का प्रश्न राज्यों के प्रसंग में ही उठाया जा सकता है. आखिर हम माओवादियों पर इसे कैसे लागू कर सकते है क्योंकि वे तो राज्य हैं नहीं, अभी राज्य सत्ता अपर अधिकार के लिए संघर्ष ही कर रहे हैं! हाँ, वे भद्र से यहाँ तक सहमत थे कि पूरी छान-बीन और जांच-पड़ताल के बाद ही दंड  दिया जाना चाहिए.
किशनजी ने सुजातो भद्र के प्रति पूरा सम्मान तो व्यक्त किया लेकिन अपने पत्र में यह बता दिया कि वे पिछड़ी समझ से ग्रस्त हैं. उन्होंने यह कहा कि बंगाल का मानवाधिकार आन्दोलन अभी पूरी तरह परिपक्व नहीं  हुआ है और अभी उसे उन्नत होना शेष है. किशनजी ने आंध्र प्रदेश का उदाहरण देते हुए बताया कि जब वहां की शोषित जनता ने योद्धा की भूमिका पाना ली तब मानवाधिकार आन्दोलन के सामने भी यह सवाल आ गया कि वह जो अब तक शोषितों के पक्ष में रहा है, क्या वह अब इस योद्धा जन के पक्ष में खडा होने की हिम्मत रखता है! उनके अनुसार बंगाल और अन्य  इलाकों में अब जनता योद्धा की भूमिका अख्तियार कर रही है और अब वक्त आ गया है कि मानवाधिकार समूह अपना पक्ष तय करें! किशनजी ने  कहा कि जब क्रांतिकारी संघर्ष  इस नए स्तर पर पहुँच जाता है  , मानवाधिकार समूहों में एक संकट उत्पन्न होता है. यह संकट इस चुनौती से जुड़ा है: वे किधर हैं!
जहां तक ह्त्या का प्रश्न है, किशन जी को इसमें कोई  संदेह नहीं कि वह उनका क्रांतिकारी अधिकार है. जांच-पडताल और जुर्म के अनुपात में सजा के सन्दर्भ में वे एक दिलचस्प बात कहते हैं: दंडकारण्य में, जहां हमारा नियंत्रण है  हम मुखबिरों या जन-शत्रुओं पर  जन अदालतों में मुकदमा चलाते हैं और सबको नहीं मार डालते. कईयों को जनता के जेलों में कैद करते हैं. चूंकि  बंगाल में ऐसी स्थिति नहीं है, उनके पास  क्रांति के लिए बाधक तत्वों को मार डालने के अलावा कोइ कोई चारा ही नहीं है. अब क्रांतिकारियों की इस बेचारगी पर उनसे सहानुभूति ही जाहिर की जा सकती है. या वहां दंडकारण्य जैसी स्थिति लाने में उनकी सहायता की जा सकती है!
किशनजी के इस तर्क की रोशनी में फिर हाल की छत्तीसगढ़ में की जा रही हत्याओं को कैसे देखें? उनका उत्तर तैयार है: हालात बदल चुके हैं.  संयुक्त सुरक्षा बलों का  इन क्षेत्रों में प्रवेश ही इस तरह के विस्फोटों के लिए पर्याप्त औचित्य है. इसलिए अगर आप इसे रोकना चाहते है तो राज्य पर दबाव डालें कि वह अपने सुरक्षाबलों को वापस ले ले. क्या सुरक्षा बलों का   वापस हो जाना शान्ति की गारंटी है? स्थित का आकलन क्रांतिकारी निरन्तर करते हैं और रणनीति बदलते हैं. इसलिए उन पर किसी तरह की कोइ नैतिक बाध्यता नहीं रह जाती.
पॉस्को विरोधी आन्दोलन या अलग- अलग विस्थापन विरोधी आन्दोलनों से माओवादियों का कोई  लेना देना नहीं है. इन आन्दोलनों से वे ज़मीन के पकने के इशारे भर  खोजते हैं. आन्दोलनों पर कब्जा करना और उसमें अपनी सैन्य शक्ति का पूरा इस्तेमाल करना , यह पहचानी हुई लेनिनवादी रणनीति है. बलपूर्वक ऐसे सभी तत्वों का सफाया कर देना या उनके लिए काम करना असंभव कर देना जो उनका प्रभुत्व स्वीकार नहीं   करते, यह भी लेनिनवादी रणनीति है.इसके लिए माओ तक जाने की ज़रूरत भी नहीं.
क्रांतिकारी जनता  के लिए काम करते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे अपने कार्यों की वैधता जनता से हासिल करते हैं. चेतना के निम्न धरातल पर जी रही जनता में इसकी क्षमता ही नहीं कि वह सही और गलत की पहचान कर सके. वह करना तो उसके आगे बढे हुए दस्ते कीऐतिहासिक जिम्मेवारी है.
मानवाधिकार या लोकतांत्रिक अधिकार की  शब्दावली में माओवादी क्रांतिकारियों से कोई भी संवाद संभव नहीं है. यह बात मानवाधिकार-समूह शायद समझने भी लगे हैं. लेकिन जब मानवाधिकार उल्लंघन को सिर्फ राज्य के सन्दर्भ में परिभाषित करते है तो शायद इसके पूरे अभिप्राय को सीमित कर रहे होते हैं. दूसरे , जो संगठित समूह शक्ति का उपयोग करने की क्षमता रखता है उसमें राज्य के गुण और उसकीमहत्वाकांक्षाएं पैदा होना लाजिमी है.
मानवाधिकार समूहों को नए सन्दर्भ को परिभाषित करना ही होगा और अपना नैतिक केंद्र स्थिर करना ही  होगा. दूसरा प्रश्न राज्य के सामने है. क्या वह भी मानवाधिकार की अवधारणा से पीछा छुडाना चाहता है और चीन की तरह का राज्य बन जाना चाहता है जहां जनता के लिए विकास का रास्ता तय करने का पूरा हक सिर्फ उसके पास हो और कोई आलोचना न हो? चीनी मॉडल   के प्रति भारत के मध्य वर्ग में बढ़ते आकर्षण को देखते हुए इस रास्ते की और जाने का पूरा प्रलोभन मौजूद दीखता है.
इस परिस्थिति में मानवाधिकार-समूहों को न तो राज्य को उत्तर देना है, न क्रांतिकारियों की निगाह में अपने आप को साबित करना है. उन्हें मानवाधिकार के मूल सैद्धांतिक केंद्र की नैतिकता और उसकी  स्वायत्तता पर फिर से बल देना है.
– जनसत्ता के लिए, मई, 2010
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