स्पार्टाकस को ही मैं क्यों याद करना चाहता हूँ ?

किसी ऐसी नाट्य प्रस्तुति को याद करना जिसने आपके ऊपर गहरी छाप छोडी हो आसान नहीं. उस छाप को समझने का और उसकी व्याख्या का क्या अर्थ है? फिर यह प्रश्न भी है कि नाट्य प्रस्तुति को उस क्षण से अलग करके जिसमें वह संभव हुई थी,देखने का मतलब है उसका अर्थ खो देना. कोई भी  नाट्य प्रस्तुति दीर्घजीवी नहीं होती. उसका जीवन उस एक प्रस्तुति भर  का ही होता है. हाल में नीम अंधेरे में पर्दा उठने के इंतज़ार या मंच पर पहली हरकत की प्रतीक्षा के दौरान दर्शक को यह पता नहीं होता कि अगले एक-डेढ घंटॆ में उसे कौन सा अनुभव  मिलने जा रहा है. अगर उसे नाटक छपे याकिसी और रूप में मिल भी गया हो, और वह उसे पढ़कर भी आया हो तो भी वह यह नहीं कह सकता, नाटक देखते हुए और उसे देख चुकने के बाद कि उसने वही देखा है जो पढा था. एक तो पढने और देखने की क्रियाएं बिलकुल अलग हैं और उनसेहमारी अपेक्षाएं भी एक सी नहीं होतीं. दूसरे, नाटक देखना एक विशिष्ट क्रिया है और नाटक का दर्शक  होने की अर्हता हासिल करनी होती है . क्या आप  नाटक के आकस्मिक दर्शक हैं या पेशेवर? क्या नाटक आपको आसानी से देखने को मिल जाए तो देख लेते हैं या उसके लिए कोशिश करते हैं? क्या कभी यह मौका आपके सामने आया कि नाटक के हाउसफुल होनेकी खबर से आपका दिल बैठ गया, फिर भी आप हाल के इर्द- गिर्द मंडराते रहे और टिकट या पास का जुगाड भिडाने कीकोशिश करते रहे? क्या इसके लिए आप किसी का भी अहसान ले सकते हैं? क्या आप हाल के बाहर से निराश लौट जानेकी आशंका के बावजूद वहां तक जाने की जहमत उठाते रहे हैं?

नाटक का दर्शक बनने के लिए नियमितता ज़रूरी है और सिर्फ नियमितता नहीं,आपके देखे हुए नाटकों में पर्याप्त विविधता भी होनी चाहिए. नाट्येतर कारणों से नाटक देखनेवालों की कमी नहीं.राजनीतिक या किसी अन्य कारण से किसी एक नाट्यदल विशेष तक जिनका अनुभव सीमित है, उन्हें नाटक का दर्शक मानने में कठिनाई है.कहने का अर्थ यह  है कि दर्शक के रूप में आपके नाट्यानुभवों में पर्याप्त विस्तार और विविधता होनी चाहिए. अभी भी ऐसे दर्शकों की कमी नहीं जो अपने शहर या गांव से दूर किसी प्रस्तुति की खबर सुन कर धक्के खाते हुए उसे देखने पहुंचते हैं और दो घंटे अंधेरे और उजाले में विभिन्न शारीरिक मुद्राऑ का जादू देख कृत-कृत्य होकर लौटते हैं. इसके साथ ही शायद यह कहना भी ठीक  है किनाटक का असली दर्शक वह है जो नाटक देखने के बाद ग्रीन रूम का रास्ता नहीं लेता बल्कि देखेहुए को धीरे-धीरे अपनी नसों में प्रवाहित होते खून में मिलाता हुआ अपने घर को लौटता है. ऐसे भाग्यशालियों की बात मैं नहीं कर रहा नाटक देखना ही जिनका पेशा बन जाता है. वे तो उस दुर्लभ प्रजाति के सदस्य हैं जिनका नशा ही उनका पेशा है. जिनका नसीब ऐसा नहीं वे नाटक देखते रहने की अपनी सनक को जीवन की साधरणता में कैसे बचाए रखते हैं?

नाट्यानुभवों और जीवनानुभवों में एक दूरी  शायद हमेशा बनी रहेगी लेकिन नाटक के दर्शक तो वही कहलाएंगे जिनके जीवनानुभव बिना नाट्यानुभव के पूरे ही नहीं होते.या जो मरने के बाद शायद अपनी कब्र में कुछ नाटकों की स्मारिकाएं रखने की वसीयत कर जाएं. मैं ऐसा दर्शक हूं या नहीं? अगर ऊपर गिनाई गई शर्तों की बात करें तो खुद को नाटक का दर्शक मानने में हिचक होती है. कई ऐसे नाटक हैं जिन्हें देखने के मौके थे लेकिन उन्हें गवां बैठा. लेकिन उसका जो अफसोस कलेजे में एक फांस की तरह अटका रहता है और जैसे पछुआ चलने पर  पुराना घाव टीस मारता है उसी तरह उस नाटक की चर्चा चलने पर उभर उठता है , उसे मैं शायद नाटक का दर्शक बने रहने की अपनी तमन्ना की गवाही मान सकता हूं. इसलिए अपने उन छात्रों के प्रति मेरे मन में आदर है जो नाटक देखने मुम्बई या भोपाल तक जाते हैं और उनसेमुझे थोडी इर्ष्या भी होती है.

ऐसे नाटक कई हैं, जिनकी याद रह-रह कर आती है. मसलन हबीब तनवीर के आखिरी दिनों में तैयार किया गया उनका नाटक राज रक्त जिसे देखते हुए मुझे उनके रंगकर्म के सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धांत का तीव्रता से बोध हुआ. शारीरिक मुद्राओं को  निरलंकार करते हुए भी उन्हें नाटकीय बनाए रखना हबीब साहब के रंगमंच की विशेषता है. राज रक्त देखते हुए उनके दूसरे नाटकों की याद भी आई और यह समझ में आया कि वह क्या चीज़ है जो शेष शहरी रंगमंच से उन्हें अलग करती है फिर भी  उन्हें आधुनिक बनाए रखती है.इस साल की शुरुआत में 30 जनवरी को सेवाग्राम के निकट वर्धा में चरनदास चोरदेखते हुए उसका अभिप्राय एकदम से झलक उठा और ताज्जुब हुआ कि इतने सालों तक क्यों यह खुल नहीं पाया था. नाटक खत्म होने के बाद कृशकाय हबीब साहब ने मंच से टिक कर बडे सादे अन्दाज में कहा कि आखिर तीस साल बाद यह नाटक वहां पहुंच पाया जहां इसे कब का आ जाना था. हिंदी रंगमंच में लोकतंत्र की कल्पना अगर किसी एक नाट्यकर्मी ने साकारकी तो वह हबीब तनवीर थे. इस लोकतंत्र की भाषा ठेठ भारतीय है और वह भारतीय भी कैसा है?

हबीब तनवीर के रंगमंच का केन्द्रीय विचार राजनीतिक है . उनका हर नाटक भाषिक स्तर पर और अपनी संरचना में न सिर्फ भारतीय लोकतंत्र को उसके अधूरेपन का अहसास कराता है बल्कि इस ओर भी उसका ध्यान खींचता है कि आधुनिकताकी उसकी परियोजना त्रुटिपूर्ण है. जनता के निर्माण के जगह क्या लोक के भीतर से  उसके अपने आवयविक लोकतांत्रिक विचार का विकास किया जाना सम्भव नहीं? हबीब साहब के नाटकों में छत्तीसगढी का प्रयोग शायद भारतीय नागरिक बौद्धिकता के मूल दोष की ओर संकेत है: उसकी आधुनिकता की भाषा का लोक पराया है. क्या नए विचार उन भाषाओं में व्यक्त नहीं किए जा सकते जिनकी देह सैकडों वर्षों की स्मृतियों से बिंधी हुई है? क्याएक स्मृतिविहीन आधुनिकता लोकतंत्र के अनुकूल है जो अपने शरीर से वे सारे निशान मिटाकर चमकना चाहती है जो उसे इसकी याद दिलाते हैं कि उसका जन्म दुविधाओं से मुक्त नहीं है और उनसे एक रिश्ता बनाकर ही वह सार्थक हो सकती है, उनसे उदासीन रहकर नहीं.

राज रक्त  देखते हुए ही यह लगा कि सौन्दर्य के सृजन के लिए तीखे नाक नक्श और विशेष शारीरिक भंगिमाओं कीज़रूरत नहीं. उसी तरह क्लासिक की परिभाषा पर भी फिर से सोचने की ज़रूरत मह्सूस हुई. रबींद्रनाथ ठाकुर और हबीब तनवीर की  बिल्कुल भिन्न काल सम्वेदनाओं के मेल से राज रक्त का सृजन होता है.   हबीब तनवीर के रंगमंच का लोक वह नहीं जो पिछली सदी के अस्सी के दशक में संगीत नाटक अकादेमी को याद आया और जिसे भारतीय रंगमंच पर फिर सेलाने के लिए उसने अनुदानों की व्यवस्था की. यह समझना आवश्यक है कि हबीब साहब लोक को आधुनिक रंगमंच पर प्रतिष्ठित करने  के किसी गैर रंगमंचीय अभियान में नहीं लगे थे. हबीब तनवीर का रंगमंच वापस कहीं लौटता नहीं, वह कुछ- कुछ  चित्रकार  हुसेन की तरह ही सरल लगती रंग-रेखाओं में एक जटिल आधुनिक रंगमंचीय विचार का आविष्कार करने की कोशिश करता है.

मुझे इसका अफसोस अंतिम समय तक रहेगा कि ब.व. कारंथ के नाटक मैं देख नहीं पाया.उनके जीवन के अंतिम समय में जो प्रस्तुतियां मैंने देखीं, वे कारंथ की कल्पना की भव्यता से खाली थीं. उस समय अपने आप को वापस पाने के उनके रचनात्मक संघर्ष की व्याकुलता तो मैंने देखी है. उसी से मैंने यह महसूस किया कि उनके नाटक न देखकर मैंने क्या खोया है.

यह अफसोस भी नाटक के एक दर्शक का भाग्य ही है. नाटक इतनी क्षणबद्ध और स्थानबद्ध क्रिया है कि आप कितना भी पैसा खर्च कर दें और कितनी भी ताकत का इस्तेमाल कर लें किसी एक नाट्य क्षण को दुबारा उसी रूप में प्राप्त कर ही नहीं सकते. इसलिए नाटक के किसी भी दर्शक को कुछ अफसोस लेकर ही मरना पड्ता है. पाठक या सिनेमा दर्शक किताब या फिल्म को कहीं से हासिल भी कर लें, नाटक के दर्शक का यह भाग्य नहीं.

नाटक देखते हुए मुझे कोई तीस साल होने को आए और इस दौर में मैंने तरह-तरह के नाटक देखे. इनमें हबीब तनवीर सेलेकर प्रसन्ना ,बंसी कौल से लेकर एम.के. रैना,  रतन  थियम से लेकर अयप्पा पणिक्कर, अरुण मुखर्जी से लेकर श्यामानन्द जालान, रामगोपाल बजाज से लेकर राजेन्द्रन , त्रिपुरारी शर्मा से लेकर अनामिका हक्सर जैसे निर्देशकों और अनेक सुविधाओं और साधनों से सम्पन्न मंडलियों के नाटक शामिल हैं. प्रसन्ना के नाटकों की विचार-सघनता से अप्रभावित रह पाना कठिन है. रामगोपाल बजाज के नाटकों की गहरी  राजनीतिक संवेदना और एक नया शहरी स्वर खोजने की उनकीकोशिश मुझे आकर्षित करती है. पिछले साल देखे उनके नाटक लैला मजनूं को भूलना मुश्किल है अगर उसे आप हमारी दुनिया में हर तरफ चल रही जंग की पृष्ठभूमि में रखकर देखें.एक बड़ी प्रस्तुति की खासियत यही है कि वह अपने समय कीहोना चाहती है , उससे पार नहीं जाना चाहती.लैला मजनूं  देखते हुए प्रेम खोजती हुई दुनिया की उस त्रासदी से असम्पृक्त रहना कठिन हो जाता है जो उस प्रेम की खोज के नाकामयाब होने का पता होने के बावजूद उस तलाश से न बच पाने और फिर उसी तलाश  में ज़िन्दगी के गर्क हो जाने से पैदा होती है.

इन सभी माहिर निर्देशकों और नवीनतम साधनों से युक्त उनकी मंडलियों के नाटकों की याद के बावजूद अगर मैं अपने मन की रंग संवेदना की बुनावट पर उंगली फिराता हूं तो मुझे एकदम शुरू के कुछ नाटक ही बार- बार याद आते हैं.

मैंने कायदे से नाटक देखना शुरू किया पटना पहुंचने पर  और वह भी इप्टा की पटना इकाई से जुडने के बाद. यह 1981 का साल था. इप्टा नाम सुनते ही जिस राजनीतिक विचार का ख्याल आता है, उससे पटना इप्टा की तब की नाट्य गतिविधियों को ठीक-ठीक समझना संभव नहीं.पटना इप्टा तरुण नाट्यकर्मियों का दल था.वे सब कालेज में आए ही आए थे.उनमें सिर्फ दो थे जिनका रंगकर्म का  कुछ पीछे का अनुभव था. एक थे परवेज़ अख्तर और दूसरे उनके छोटे भाई जावेद अख्तर खान.तीसरे भाई , जो दरअसल इन दोनों के बीच के हैं, तनवीर अख्तर, संगठनकर्ता माने जाते थे लेकिन उन्होंने कुछ बहुत प्रभावशाली प्रस्तुतियां कीं.  मैं अभी भी यह मानता हूं कि पचास की वयस के आस-पास जो कुछ निर्देशक हमारे देश में हैं, जिनके पास मौलिक रंग- दृष्टि है उनमें एक हैं परवेज़ अख्तर. उनकी सक्रियता कुछ मंद पड गई है और वे किंचित संकोची भी हैं, यह  एक कारण है कि हम जितना उनसे पा सकते थे वह न ले सके. एक दूसरी वजह है बिहार में 1990 के बाद से आया बौद्धिक दुष्काल जो अब तक चल रहा है. लेकिन मैं 1980 से 1990 के दशक की बात करना चाहता हूं.पटना में रंगकर्म के लिहाज से यह अत्यंत ही उत्साह भरी सक्रियता का दौर था.यह भी कोई गलत बयानी नहीं कि इस दशक में पटना इप्टा की हर नाट्य-प्रस्तुति का दर्शक बेसब्री से  इंतजार करते थे. नाटक कोई कभी-कभी होने वाली गतिविधि न थी. साल भर किसी न किसी नाटक की तैयारी चलती रहती थी. यह न भूलें कि यह कोई पेशेवर नाट्य दल न था. इस पर भी एक समय बडी बहस चली थी कि क्या पटना इप्टा शौकिया रंगकर्म भर कर रहा है. ‘पेशेवर’  रंगमंच क्या है और शौकिया क्या, इस पर पटने में कई गोष्ठियां हुईं. मसला सुलझ गया हो, ऐसा नहीं पर इससे रंगकर्म के प्रति पटना इप्टा कीगम्भीरता का तो पता चलता ही है.

पटना इप्टा, जैसा मैंने  पहले कहा, तरुणों का दल था और इसके सदस्यों की पारिवारिक-सामाजिक पृष्ठभूमि में दिलचस्प वैविध्य था. पर उन सबमें  नाटक करने की इच्छा दुर्दम्य थी.रोज़ाना छह-सात घंटे साथ बिताने वाले इन नौजवान लड्के-लड्कियों की तादाद भी कम न थी.सबसे मजेदार बात यह है कि इनमें से कोई भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य न था. नाटक के चुनाव में पार्टी का कोई हस्तक्षेप नहीं था. यह कहना ठीक नहीं कि दोनों के बीच कोई सम्बन्ध ही न था लेकिन वह था बहुत विचित्र. पटना इप्टा के सचिव ललित किशोर सिन्हा एक वकील थे जो पार्टी के सदस्य थे. लेकिन वे तो शायद इसी से कृतार्थ थे कि ये नौजवान पटना इप्टा की जोत जलाए हुए हैं.न तो वे और न बिहार इप्टा के नेता कन्हैयाजी इसके लिए तैय्यार थे कि इनके काम काज में कोई दखलंदाजी की जाए. मुझे भारतेंदु हरिश्चन्द्र के नाटक सत्य हरिश्चन्द्र को लेकर हुई बहस की अब तक याद है. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को एकाधिक बार पटना इप्टा के नाटकों के चयन के कारण असुविधा का सामना करना पडा लेकिन उसने इसके चलते कभी कोई बाधा डाली हो, यह याद नहीं.

1983 में पटना इप्टा ने स्पार्टाकस का मंचन किया. हावर्ड फास्ट के उपन्यास के बादल सरकार द्वारा किए गए नाट्य रूपांतर की यह प्रस्तुति थी.इसे तनवीर अख्तर ने निर्देशित किया था.  मुझे यह नाटक अपनी सादी वेश-योजना के कारण याद रह गया है. अभी भी मेरी स्मृति में स्पार्टाकस के पात्रॉ की पोशाक में इस्तेमाल हुए कपडे में बोरे की बुनावट  के खुरदुरेपन का अह्सास है. स्पार्टाकस और उसके साथी गुलामों , यहां तक कि उसकी प्रेमिका वारीनिया के देह की बनावट कीअरक्षित सख्ती को दिखाने का इससे बेहतर दूसरा तरीका न था. अभिनेता श्रीकांत किशोर का हडीला बदन स्पार्टाकस के लिए सर्वथा उपयुक्त था और उसकी सधी हुई संवाद-अदायगी गुलामों के नेता के रूप में उसे प्रामाणिक बनाती थी. नाटक कीयोजना सरल नहीं थी. रोमन साम्राज्य और गुलामों के बीच का संघर्ष तो इसमें था, लेकिन यह सिर्फ वर्गीय संघर्ष नहीं था. गुलाम स्पार्टाकस के भीतर से एक सोचने और मह्सूस करने वाले व्यक्ति स्पार्टाकस का जन्म इसके निर्देशक के लिए उतना ही मह्त्वपूर्ण था. नाटक के बादल सरकार के आलेख में ऐसा पाया गया कि कुछ प्रसंग खुल नहीं रहे थे, इसलिए मूल उपन्यास को पढा गया और उसमें से कई प्रसंग आलेख में जोडे गए. पटना इप्टा की प्रस्तुतियों की खासियत थी, उनमें सेहरेक का प्रस्तुति आलेख जो छपे नाटक से भिन्न होता था. इस नाट्यालेख को तैयार करना मुख्य रूप से निर्देशक का काम था लेकिन उसमें पूरा नाट्य दल भी उसमें सक्रियता से हिस्सा लेता था. स्पार्टाकस में वर्गीय चेतना के जन्म से अधिक ध्यान निर्देशक ने मित्रता की संवेदना के जन्म पर दिया. स्पार्टाकस एक ग्लैडियेटर है जिसे सिर्फ लडना सिखाया गया है , लडना और मारना. मारने से इनकार का मतलब है खुद उस ग्लैडियेटर की मौत. महान रोमन साम्राज्य और उसकी सभ्यता का मनोरंजन मौत के इस खेल से होता है. क्या वह सभ्य होने का दावा कर सकती है? रोम के सिनेटर ग्राकुस के चरित्र कीबेचैनी जो उसे सेनापति क्रासुस से भिन्न बनाती है इस संवाद में पूरी शिद्दत से उभर आती है: जो कुछ बेहतर है, जो कुछ नायाब है, जो कुछ खूबसूरत है-वह सब हमसे छूट गया है. तहजीब छोडकर हमने नज़ाकत अपना ली. खुशी छोड्कर हम ऐशपरस्त हो गए.मोहब्बत छोड कर हमने ऐय्याशी ले ली. हममें भूख नहीं है-खाना है. हममें प्यास नहीं है-पानी है. यह सब मैं जानता हूं. लेकिन पता नहीं; हमारी छोडी हुई खूबियां, नायाब चीज़ें और खूबसूरती-स्पार्टाकस ने कैसे उठाकर दुनिया के सबसे निचले तबके में बांट दी. मैं जानना चाहता हूं, वारीनिया क्यों स्पार्टाकस की बीवी है और मेरी मां रोम- एक तवायफ?  

ग्राकुस रोम साम्राज्य का सिनेटर है और बुद्धिजीवी भी. वह वारीनिया को हासिल करना चाहता है  जो स्पार्टाकस की प्रेमिका है और उसके बच्चे की मां बननेवाली है. उसके लिए यह पहेली है कि गुलामों में भी वही मानवीय भावनाएं हैं जिनका अधिकारी वह अब तक सिर्फ अपने आप को और  अपने वर्ग को मानता आया है. स्पार्टाकस भी उसके लिए रहस्य है जिसेवह समझना चाहता है. इस मामले में वह सेनापति क्रासुस से अलग है जो मानता है कि “ स्पार्टाकस बस गंदे नाले का एककीडा था, और उसी नाले में बह गया.”ग्राकुस और क्रासुस का द्वन्द्व इस नाटक की दूसरी खासियत थी. अब सोचने पर यह लगता है कि यह नाटक हमारी उस समय की उम्र के लिहाज से अधिक परिपक्व था.वह चरित्रों को मात्र वर्गीय इकाइयों में शेष नहीं कर रहा था, उनकी अपनी व्यक्तिगत विशिष्टताओं की ओर भी उसका पूरा ध्यान था.स्पार्टाकस ग्लैडिएटर है लेकिन वह गुलामों का बुद्धिजीवी भी है. उसके और उसके दूसरे उग्र साथी ड्राबा के संवाद निर्देशक के लिए  बडे महत्वपूर्ण थे और इन्हें और खोलने के लिए उन्होंने फिर मूल उपन्यास का सहारा लिया था.ग्राकुस वारीनीया को स्पार्ताकस के मारेजाने के बादकिसी तरह हासिल करता है लेकिन वह उससे पूरी रात बात करते हुए गुजार देता है. यह बातचीत उसके लिए आत्म साक्षात्कार की घडी भी है. वह वारीनीया को रोमन साम्राज्य से बाहर सुरक्षित पहुंचाने का इंतजाम करता है और स्वयं आत्महत्या कर लेता है. अपने वर्ग के पापों में अपनी भागीदारी के प्रायश्चित का उसके पास शायद और कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था. ग्राकुस की भूमिका कर रहे जशवीर अरोडा इप्टा के सद्स्य न थे और न नियमित अभिनेता फिर भी इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिए तनवीर अख्तर ने उन्हें चुना.एक प्रस्तुति में मंच पर हो रही बहस के आवेश में जशवीर अरोडा के शाल फेंकने के साथ अपनी अंगूठियां तक निकाल-निकाल कर फेंक देने का खासा मजाक बना था. शायद उनमें से एक अंगूठी असली सोने की थी और वह फिर मिली भी नहीं. जशवीर काफी समय तक इस दृश्य को लेकर संकुचित भी रहे.

स्पार्टाकस सशस्त्र संघर्ष की कहानी है लेकिन स्पार्टाकस के पास अपने विद्रोह और क्रांति का एक मुकम्मल दर्शन है और वह हिंसा को जीवन का आधार नहीं बनाना चाहता. वह अपने विद्रोह  को  भी आवेश में संगठित नहीं करता. लेकिन उसके दूसरे साथी की हडबडी के चलते योजना बिखर जाती है और रोमन सेना विद्रोह को कुचल देती है.

विद्रोह संभव है या नहीं ? वह कब क्रांति में बदल जाता है? क्रांति के लिए वस्तुगत परिस्थितियों  के साथ आत्मगत परिस्थितियों की तैयारी का क्या अर्थ है?जो जीवन भर दबा रहा है , वह कब तन कर खडा हो जाता है? रोमन साम्राज्य इस बार जीत गया तो क्या वह अविजेय रहेगा ही? क्या एक विद्रोह को कुचल देने से हमेशा के लिए विद्रोह की संभावनाएं खत्म हो जाती हैं? मुझे नाटक का वह दृश्य याद आया जिसमें यह बहस साम्राज्य के अंदर चलती है:

क़्रासुस: स्पार्टाकस बस गंदे नाले का एक कीडा था और उसी नाले में बह गया.

किकैरो: ठीक है. पर रोम की बुनियाद भी इसी गंदे नाले पर टिकी है. अगर कभी इस गंदे नाले में बाढ आ गई तो सारा का सारा रोम ढह जाएगा.

एंटिनियुस: पर अब इस नाले में कभी बाढ नहीं आ सकती,

…….

किकैरो: स्पार्टाकस ऐसा ही एक गुलाम था, ऐसा ही एक कुत्ता . और ऐसे ही उसने सारी ज़िंदगी लातें सहीं.

प्रेम , मित्रता और वर्ग घृणा किस प्रकार की संवेदनाऎं हैं? मौत की जगह क्यों गुलाम जीना चाहता है? स्पार्टाकस ड्राबा को समझाते हुए कहता है: हम गुलाम हैं! ज़िंदगी के अलावा हमारे पास और है ही क्या?    

विद्रोह और क्रांति दरअसल जमाने से खामोश रखे गए वर्ग की आत्माभिव्यक्ति की आकांक्षा का परिणाम भी है

स्पार्टाकस: मैं खुलकर बोलना चाहता हूं. हम सबको खडे होकर,खुलकर बोलना है.

……………. लेकिन एक बार बोलने का मतलब है- बोलना, नकि वापस लौटना.

क्रांति मानवीय गुणों को नए सिरे से परिभाषित करने की प्रक्रिया भी है. स्पार्टाकस क्या था , वारीनीया यह बताते हुए कहती है:स्पार्टाकस नेकदिल था क्योंकि वह बुराई और नाइंसाफी  के खिलाफ लडा.

ग्राकुस की भूमिका विनीत कर रहे थे जो पटना इप्टा के ही नहीं , बिहार के सबसे कुशल अभिनेताओं में से एक थे, बाद में वे एन. एस. डी . में आए और फिर मुम्बई  चले गए जो रंगमंच के अभिनेताओं की कब्र्गाह ही है. विनीत की ठहरी हुई, क्रूरतापूर्ण निश्चय भरी संवाद अदायगी उनकी खासियत थी. इप्टा की कई चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं उनके हिस्से गईं. आगे महाभोज में दा’ साहब का चरित्र भी  उन्होंने ही निभाया.

विनीत की तरह ही बिहार के दूसरे, तब के और अबतक के सबसे अधिक चिंतनशील अभिनेता जावेद अख्तर खान इस नाटक में अपेक्षाकृत छोटी भूमिका कर रहे थे, लेंटिलुस बाटियाटुस की जो गुलामों का व्यापार करता है. उसकी लिच्चडपने से भरी व्यावहारिकता रोम की सभ्यता की धज्जी बिखेर देती है.वह रोम के साम्राज्य के लिए अपनी अनिवार्यता को अच्छी तरह जानता है, इसलिए उसे यह मालूम है कि वह रोमन सभ्यता के दावे के लिए असुविधाजनक है पर उसके असभ्य बर्ताव और फूहडपन को बर्दाश्त करने के अलावा उसके पास और कोई चारा नहीं.  मुझे अभी भी जावेद अख्तर का दांत निपोडकर खिखियाना और चूतडों पर अपना हाथ फिराते रहना याद है.

वारीनीया की भूमिका की थी सरिता ने जो फिर इप्टा की सदस्य नहीं थीं.उन्हें हम सब एक अलग वर्ग का सदस्य भी मानते थे. वे अंग्रेजी माध्यम से पढी थीं और हमारे अंदर इसे लेकर उनके प्रति अनावश्यक ही एक दुराव था. पर अपने  ठहरे हुए स्वभाव के चलते उन्होंने हमारॆ एकाध मित्र के उद्धतपन को अनदेखा भी किया. उनके स्नेहिल स्वभाव ने  जल्दी ही सबका दिल जीत लिया और   दुबली-पतली सरिता जब मंच पर आती थीं तो ऐसा लगता था कि यह भूमिका बस उनके लिए बनी है. यह भी याद है कि वर्ग, क्रांति, आदि को समझने के लिए उन्होंने काफी मेहनत की थी.

स्पार्टाकस की मंच सज्जा में मंच के ठीक बीचो-बीच खडे सलीब की याद है जिस पर गुलाम खडेहोकर अपने संवाद बोलते थे. बाकी मंच की याद नहीं रह गई है. तनवीर अख्तर ने याद दिलाया कि मंच दो स्तरों में बंटा हुआ था. यह भी कि इस नाटक में केदार नाथ अग्रवाल की कविता यह जन मारे नहीं मरेगा का कोरस में इस्तेमाल किया गया था. तनवीर अख्तर ने सदीप मुखर्जी के संगीत का भी कल्पनापूर्ण इस्तेमाल नाटक में किया था. रोमन साम्राज्य के सदस्यों की भड्कीली पोशाकों और धूसर रंग की गुलामों की पोशाक से मंच पर एक अद्भुत विरोधी भाव-संसार निर्देशक ने सृजित किया था.

स्पार्टाकस पटना इप्टा की  ही नहीं बिहार के रंगमंच की कुछ सबसे यादगार प्रस्तुतियों में एक था. छह दिनों के इसके आयोजन में एक रोज तेज़ अन्धड की वजह से नाटक नहीं हो पाया और उसके एवज में एक दिन और हाल मुफ्त दिया गया.  छह सौ दर्शकों की क्षमतावाले नृत्यकला मन्दिर के हाल के बाहर टिकट खिडकी पर रोज़ लगने वाली लम्बी लाइन अब पटना में नाटक करने वालों के लिए बस याद करने की चीज़ रह गई है, पर यह वह नाटक था जिसका टिकट न मिलने के कारण निराश दर्शकों को वापस जाना पडा था. नाटक के हाल में यह भीड पटना इप्टा के दूसरे नाटकों को भी मिलती रही. खुले रंगमंच पर महाभोज की प्रस्तुति हो या माधवी का प्रदर्शन, पटना इप्टा को हाउसफुल की घोषणा करने का सौभाग्य कई बार मिला.

स्पार्टाकस को ही मैं क्यों याद करना चाहता हूं? शायद इसलिए भी कि नाटक का  न होते हुए भी एक नाट्य दल के भीतरकी सामूहिक रचनात्मक ऊर्जा मुझे अभी भी किसी भी वैयक्तिक , एकांत रचना के मुकाबले अपनी ओर अधिक खींचती है. एक नाटक को खडे होते देखना एक पूरी ज़िंदगी को शकल लेते देखने के बराबर ही है. स्पार्टाकस मेरे लिए कुछ मित्रताओं के प्रगाढ होने की शुरुआत से भी जुडा है. श्रीकांत किशोर जो आगे चल कर जावेद अख्तर के बाद सबसे अधिक बौद्धिक अभिनेता के रूप में उभरे और फिर उन्होंने नाटक भी लिखे. नाटक और रंगमंच के सवालों पर श्रीकांत जैसी गम्भीरता से लिखनेवाले हिन्दी में कम हैं.

स्पार्टाकस के गुलामों के भीतर दोस्ती के जिस जज़्बे का जन्म दिखाया गया है, वह हम सबकी कहानी भी थी.जो दोस्तियां तब बनीं वे जारी हैं. हां, उनमें से कुछ को हम याद भर कर सकते हैं जैसे इस नाटक को, उनसे अब मिल नहीं सकते. उनमेंसे एक था चन्द्रशेखर, खूबसूरत नौजवान, जो राष्ट्रीय सैन्य अकादेमी छोड कर लौट आया था और जल्दी ही लडकियों का ही नही6 सबका  चहेता बन गया था. हम सब उसे दुलार से फौजी कहते थे. उसे एक मामूली भूमिका मिली थी, चुपचाप खडे रहने वाले रोमन फौज के सिपाही की. वह भी आगे चल कर  कुछ मेरी ही तरह इप्टा का एक वफादार कारकुन बननेवाला था.

स्पार्टाकस के सारे अभिनेता और मेरी तरह के दर्शक अब मध्यवय के हैं. क्या उनमें स्पार्टाकस का वह स्वप्न बचा हुआ है? क्या वे फ्रैक्टस के इस संवाद को भूल पाएंगे जो इस नाटक में बार बार गूंजता है: मैं फिर लौटूंगा. लाखों की तादाद में. करोडों की तादाद में. ?

 

  • नटरंग के लिए, नवंबर, 2009
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