सितम्बर हिंदी का सार्वजनिक रोदन मास है

सितम्बर हिंदी का सार्वजनिक रोदन मास है. एक ही साथ हिंदी का गुणगान किया जाता है, उसकी वैज्ञानिकता की दुहाई दी जाती है और उसके साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय का दुखड़ा रोते हुए सरकारों से उसे उसका प्राप्य देने की मांग वीरतापूर्ण नारों में दुहराई जाती है.पहले उसे एकमात्र राष्ट्रीय भाषा कह कर अन्य भारतीय भाषाओं में उसके प्रति जो द्वेष भर दिया जाता था  उसे सुधार कर विनम्रतापूर्वक अब उसे एक भारतीय या हिन्दुस्तानी भाषा कह कर उसका हक माँगा जाता है. लेकिन हिंदी की इस मांग के चरित्र को हिंदी दिवस, पखवाड़ा या मास के अवसर पर होने वाले कार्यक्रमों का अध्ययन करके समझा जा सकता है. प्रायः ऐसे अवसरों पर स्वरचित कविता पाठ प्रतियोगिता या भाषण प्रतियोगिता आदि का आयोजन होता है. हिंदी की आत्मछवि यह है कि वह भावना की भाषा है.

हिंदी और भावना के सम्बन्ध के पीछे गलतफहमी यह रही है कि इस देश की बहुलांश आबादी की मातृभाषा हिंदी है. खड़ी बोली हिंदी उन लोगों के लिए अभी भी सीखी जाने वाली और कामकाजी भाषा है जो घरों और गाँव या मोहल्लों में ब्रज, अवधी, भोजपुरी,मैथिली, बुन्देली,राजस्थानी,हो,मुंडारी,संथाली,आदि बोलते हैं. हिंदीवादी मन ही मन इन सारी भाषाओं की मृत्यु की कामना करते आए हैं जिससे हिंदी का मार्ग निष्कंटक हो जाए लेकिन वह अब तक नहीं हो पाया है. इस परिस्थिति ने हिंदी के लिए राजकीय संसाधनों पर एकाधिकार के प्रश्न को, कम से कम उन प्रदेशों में जिन्हें हिंदी प्रदेश कहते हैं, जटिल बना दिया है. एक लम्बे समय तक शिक्षा और ज्ञान की निगाहों से ओझल आदिवासी भाषाएँ अब अपना दावा भी पेश करने लगी हैं.

पिछले कुछ बरसों से यह अहसास गहरा हुआ है कि हिंदी की दावेदारी तब तक मजबूत नहीं होगी जब तक उसमें ज्ञान-विज्ञान का सृजन नहीं होगा. हिंदी का यह दावा कि  वह करोडो लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है,व्यर्थ है क्योंकि उसमें ज्ञान का कोइ महत्वपूर्ण काम नहीं होता .अगर गूगल के सहारे खोज करें तो विज्ञान की पत्रिका के नाम पर  ‘विज्ञान प्रगति’ के अलावा कुछ भी नहीं हाथ आता. विज्ञान प्रगति विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के मकसद से निकाली जाती है. उसी तरह कृषिविज्ञान  जैसे विषय में भी एकाध पत्रिका को छोड़कर हिंदी में कुछ भी नहीं.  समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र, नृतत्वशास्त्र, मनोविज्ञान हो या दर्शन,हिंदी में स्तरीय शोध पत्रिकाएँ या जर्नल नगण्य हैं. इस स्थिति को क्या हम इन  क्षेत्रों में सक्रिय  विद्वानों के इरादों और फैसलों का नतीजा मानें या किसी और तरीके से इसे समझने का प्रयास करें?

अक्सर शिकायत की जाती है कि हमारे वैज्ञानिकों, इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों,आदि ने आत्मोत्थान के लिए हिंदी का साथ छोड़ दिया. अध्येता, विद्वान या शोधकर्ता अपनी नई खोज या व्याख्या को उन लोगों के बीच ले जाना चाहते हैं जो उनके ज्ञान-क्षेत्र में काम कर आ रहे हैं. उनके द्वारा अपने काम की स्वीकृति या उनके भीतर उसके चलते नए  विचार-विमर्श की शुरुआत की अपेक्षा करना किसी भी शोधार्थी या विद्वान के लिए स्वाभाविक है. यह भी याद रखा जाना चाहिए कि ज्ञान-व्यापार किसी एक भाषाई या राष्ट्रीय सीमा के दायरे में बंधकर नहीं किया जा सकता. भौतिकशास्त्र की भाषा अलग है और रसायनशास्त्र की अलग,भले ही दोनों अंग्रेज़ी या फ्रेंच में लिखे जा रहे हों. भारत के एक समाजशास्त्री की इच्छा चीन , श्रीलंका , ब्राजील,अमरीका या  फ्रांस के समाजशास्त्र के संसार में पहचाने जाने की हो तो इसमें गलत क्या है? फिर उपाय क्या है? क्या वह ऐसी भाषा में लिखे जो उसके देश या समाज में तो समझी जाती है लेकिन उसकी विद्या अथवा अनुशासन के व्यापक संसार में नहीं समझी जातीं ? ऐसा करके वह गुमनामी का वरण कर रहा होगा जिसमें शहादत की बहादुरी तो है लेकिन उसके जीवन भर के ज्ञानाभ्यास के अनपहचाने रह जाने से पैदा हुआ निरर्थकता बोध  भी है.यह दुविधा सिर्फ भारत जैसे देश में काम करने वाले बौद्धिकों की नहीं है.

हिंदी का मुकाबला इस प्रसंग में भारतीय भाषाओं से नहीं अंग्रेज़ी से है. लेकिन अंग्रेज़ी ने तो ज्ञान और अकादमिक क्षेत्र में जर्मन, फ्रेंच , स्वीडिश , आदि भाषाओं को भी उनकी पूर्व स्थिति से  अपदस्थ कर दिया है. कोइ सवा सौ साल पहले मृत्यु के ठीक पहले प्रुशिया के चांसलर ओटो वोन बिस्मार्क से एक पत्रकार ने इंटरव्यू के दौरान पूछा कि वे किसे अपने समय की सबसे निर्णायक घटना कहेंगे. बिस्मार्क ने जवाब दिया, ‘यह बात कि उत्तरी अमरीका अंग्रेज़ी बोलता है.’ यूनिवर्सिटी ऑव मिशिगन के प्रोफेसर जॉन एम्. स्वेल्स ने  एक निबंध में बिस्मार्क के इस वक्तव्य को  भविष्यकथन बताते हुए लिखा है जिस वक्त वह यह कह रहे थे उस समय जर्मन भाषी विज्ञान और मेधा , जर्मन टेक्नोलॉजी और उद्योग और जर्मन भाषी विश्वविद्यालय बाकी दुनिया के मुकाबले बहुत-बहुत आगे थे. जर्मन के ऊपर  अंग्रेज़ी की जीत के कारण दो विश्व युद्धों में जर्मनी की भूमिका और हिटलर के शासन कालमें श्रेष्ठ जर्मन वैज्ञानिकों और बौद्धिकों के अमरीका जैसे अंग्रेज़ी भाषी देश की ओर पलायन में खोजे जा सकते हैं. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमरीका ही ऐसी महाशक्ति था जिसकी अर्थव्यवस्था और बौद्धिक और भौतिक ढांचा लगभग युद्ध से अप्रभावित रहा था.

अंग्रेज़ी ने लेकिन सिर्फ जर्मन को ही नहीं धीरे-धीरे ज्ञान के इलाके से अन्य भाषाओं को, जिनमें अकादमिक विचार-विमर्श की समृद्ध परंपरा और अभ्यास था, किनारे कर दिया है. स्वेल्स ने मेक्सिको के ‘जर्नल ऑव एनाटोमी एंड एम्ब्रायोलोजी’ की, जो अभी सिर्फ अंग्रेज़ी में प्रकाशित होता है, यात्रा कथा बताई है. 1876 में यह केवल स्पेनिश में छपता था, 1974 से  यह स्पेनिश और अंग्रेज़ी में छपने लगा और 1983 आते आते यह सिर्फ अंग्रेज़ी में प्रकाशित  होने लगा.भौतिक शास्त्र हो या अर्थशास्त्र, मौलिक शोध कार्य को सिर्फ और सिर्फ अंग्रेज़ी में ही स्वीकार करने की नीति अब प्रायः हर जगह आम होती जा रही है अंग्रेज़ी के प्रभुत्व का कारण लेकिन उस भाषा के किसी ऐसे आतंरिक गुण में नहीं है जो उसे सहज ही ज्ञान की भाषा बना देती है.अंग्रेज़ी के प्रसार को समझने  के लिए एक पाकिस्तानी व्याख्याकार का यह कथन पर्याप्त है, ‘पूरी दुनिया में अंग्रेज़ी पढ़ाना अरबों डॉलर का धंधा बन गया है जिसकी तुलना सिर्फ नशीले पदार्थों के व्यापार के प्रसार से की जा सकती है.’

इस बात पर कोई  विवाद नहीं है कि अंग्रेज़ी का यह मारक प्रसार विश्व के सांस्कृतिक स्वास्थ्य के लिए और खुद अंग्रेज़ी के लिए भी शुभ नहीं है. जैव-विविधता की तरह भाषाई विविधता की अवधारणा अब लोकप्रिय हो चुकी है. लेकिन उसके साथ ही ध्यान दिलाया गया है कि किसी एक भाषा के स्वास्थ्य के लिए स्वयं  उसके भीतर प्रयुक्तिगत वैविध्य अनिवार्य है. यानी  यह संभव होना चाहिए कि हिंदी या उर्दू या बांग्ला में  एक रसायनशास्त्री रसायनशास्त्री की तरह बात करे,भूगर्भशास्त्री अपने अनुशासन की भाषा में बात कर सके. अंग्रेज़ी को  सिर्फ शेक्सपीयर ने नहीं चार्ल्स डार्विन ने भी बनाया है.इस समस्या के अध्येता इसलिए फ्रेंच, स्वीडिश, जर्मन , स्पेनिश जैसी भाषाओं में पहले से मौजूद अकादमिक प्रयुक्तियों के संरक्षण के उपाय खोजने का प्रयत्न कर रहे हैं.

हिंदी की स्थिति इन भाषाओं से  भिन्न है कि यहाँ ऐसी किसी ह्रास की कथा नहीं है. हिंदी की ऐसी कोई सुखद स्मृति ही नहीं रही है. अभी भी यहाँ अभी ज्ञान-सृजन का काम शुरू किया जाना है. अब तक हमारा ध्यान मात्र शब्दों की खोज पर रहा है जबकि ध्यान अलग-अलग अनुशासन में सम्पूर्ण अकादमिक प्रयुक्ति के सम्पूर्ण अभ्यास पर दिया जाना चाहिए. इसमें हमारी सहज द्विभाषिकता एक बड़ा सहारा हो सकती है.  हिंदी में अनुशासन विशेष में संवाद के लिए आवश्यक उत्सुक समूह का होना भी ज़रूरी है.एक दूसरा तरीका विज्ञान जैसे विषयों के अध्ययन के साथ हिंदी को सम्बद्ध करने का  हो सकता है. ये फैसले लेकिन जितने अकादमिक संसार के भीतर के हैं, उससे कहीं ज़्यादा विकास की राजनीति के हैं. ऐसी शिक्षा व्यवस्था जो माध्यमिक स्तर पर ही आबादी के बहुलांश को बाहर कर देती है, श्रेष्ठता की भ्रामक समझ पर आधारित है. यह विपन्न श्रेष्ठता है. खून जला कर अंग्रेज़ी सिखाने और न सीख पाने वालों को हतवाक कर देने की राजनीति विकास की जिस समझ पर आधारित है , उससे लड़े बिना हिंदी में ज्ञान निर्माण के प्रश्न का हल नहीं निकल सकता.  ज्ञान संसार में उत्तरी वर्चस्व के यथार्थ से कैसे निबटें, यह एक अलग प्रश्न है.

जब तक इस पर बहस नहीं होगी कि हिंदी में ज्ञानात्मक भाषा न होने का मामला मात्र हिंदी की न्यूनता से नहीं , ज्ञानानुशासों की विपन्नता से भी जुड़ा हुआ है,बात आगे नहीं बढ़ेगी.जो ज्ञान अपने समाज से बात नहीं कर सकता वह ज्ञान ही क्योंकर है, यह प्रश्न ज्ञानमीमांसा का है. हिंदी का संघर्ष इसलिए वास्तविक ज्ञानमीमांसात्मक संघर्ष के साथ राजनीतिक संघर्ष से भी जुड़ा हुआ है. लेकिन यहाँ तक लिखते हुए मुझे यह लगने लगा है कि कोई नई बात तो कही नहीं मैंने.आखिरकार चाहिए वह साहस  जो अज्ञेय ने बहुत पहले किया था और जिसके बारे में कहा था कि हिंदी में लिखने का फैसला अपने आप में साहस का काम है. यह साहस हमारे विश्वविद्यालय कर पाएंगे , इसमें मुझे संदेह है लेकिन इसे  लेकर कोइ दुविधा नहीं कि अगर ऐसा वे कर पाए तो स्वस्थ और समृद्ध ही होंगे.

 

  • नवनीत, सितंबर,2013
  • गर्भनाल, सितंबर, 2015

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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