राष्ट्रीय शोक की घड़ी गुजर चुकी

ताज सज गया है.ओबेराय भी. पार्टियों का दौर फिर से शुरू हो गया है. ज़िंदगी अपने होने का उत्सव मना रही है और यह ठीक ही है. कुछ टेलिविज़न चैनेल ताज के फिर से खुलने को एक बड़ी राष्ट्रीय घटना के रूप में दिखा रहे थे. लगातार सीधे प्रसारण में आप  भारत के धनी-संपन्न और प्रभुत्वशाली वर्ग को जमा होते देख पा रहे थे.ताज को सिर्फ़ तीन हफ्ते लगे और वह उठ खड़ा हुआ. उत्सव में विघ्न डालने वाली आवाज़ ने हमेशा की तरह पूछा कि एक जगह है, शिवाजी टर्मिनस जहाँ साँस ने विराम ही नहीं लिया. उसने मौत के सदमे को रोज़मर्रा के अनुभव की तरह बर्दाश्त किया और जीवन वहां अबाधित चलता रहा. उस जीवन में क्या पर्याप्त दृश्यात्मकता नहीं थी ?

ताज के फिर से खुलने के क्रम में जो कई चित्र दिखे, उनमें एक था, ताज की लॉबी में एक बड़े से क्रिसमस ट्री को ज़माने की कोशिश. बड़ा दिन नजदीक आ रहा है, इस चित्र में यह ख़बर थी.फिर एक विघ्न पड़ा . क्या इस बड़े दिन को हम दूर ओडीसा के कंधमाल के उन आदिवासी ईसाइयों को भी बधाई भेजेंगे जो पिछले साल के बड़े दिन से देशभक्त, हिंदूवादी संगठनों द्वारा लूटे, जलाये, मारे और खदेड़े जा कर कैम्पों में पनाह लिए हैं, लेकिन जो राष्ट्रीय चिंता के दायरे में नहीं? वे भी भारतीय है और उन्हें भी उत्सव मनाने का हक है.वह उनसे किसने छीना ?

उपनिवेशवाद  के चलते कह लें, या उत्सव मात्र का आकर्षण, बड़ा दिन ईसाइओं के अलावा और धर्मावलम्बियों को भी लुभाता है. मुझे हर लाल बत्ती पर सान्ता  क्लॉज़ का मुखौटा लगाये बच्चे दिखने लगे जो लाल फुदने वाली टोपियाँ बेच रहे हैं. हम सब, जो इसाई नहीं हैं, रुक कर अपने बच्चों के लिए इसे लेते है. सांता क्लॉज़  के चहेते सिर्फ़ ईसाई बच्चे नहीं हैं. इस सहज आकर्षण की क्या अलग से व्याख्या करने की ज़रूरत है?

यह सब कुछ सिर्फ़ पुकार पुकार कर जीवन की अपराजेयता का उद्घोष कर रहा है. ज़िन्दगी अपने पुराने ढर्रे पर लौट आई है. मौत को वह इसी तरह जवाब देती रही है. चीखो-पुकार के आदी हो चुके भारतीय चैनेल इसे आतंकवाद को भारत का जवाब भी बता रहे थे. सामान्य  जीवन शुरू हो चुका है. राष्ट्रीय शोक की घड़ी गुजर चुकी.

यह राष्ट्रीय शोक भी बड़े धूम धाम से मनाया गया. आतंकवाद विरोधी  सच्चे भारतीयों  ने जगह जगह आयोजन किए, हमले में मारे गए पुलिस अधिकारियों के परिवार को सार्वजनिक रूप से बुला कर लाखों रुपये दिए गए. इस पूरे प्रदर्शन में एक अश्लील क्रूरता थी जो शायद सिर्फ़ देशभक्ति के नाम पर क्षम्य समझी गयी जिसने हेमन्त  करकरे के परिवार की उस दृढ़ शालीनता को धूमिल कर दिया जो उनके उस  इनकार में प्रकट हुई थी जो गुजरात  में मुसलमानों का  हत्याकांड संचालित करने वाले मुख्यमंत्री के एक करोड़ रुपयों के लिए था. हेमंत जो कुछ कर रहे थे, वह सब उनके परिवार के लिए भी मानी रखता था, यह उस इनकार से जाहिर हुआ. आखिर यही मुख्यमंत्री थे, और उनके सहयोगी जो हेमंत और उनके साथियों को राष्ट्रद्रोही तक कह रहे थे क्योकि उन्होंने मालेगाँव में हुए और कुछ दूसरे दहशतगर्द हमलों की जांच करते हुए कुछ हिंदूवादी संगठनों के लोगों को पकड़ा था. भारतीय जनता पार्टी, शिव सेना और आर. एस. एस. हेमंत और उनके दल के खून के प्यासे थे. उनकी नार्को जांच से लेकर उनकी बर्खास्तगी तक की मांग इन देशभक्त, आतंकवाद का विरोध करने का पहला अधिकार रखने वाले संगठनों ने किया था. क्या आप भूल गए कि भावी प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे अडवानी ने हेमंत के दल पर यह आरोप लगाया था कि वे साध्वी प्रज्ञा सिंह  को यंत्रणा दे रहे हैं. विपक्ष के इस नेता को प्रधानमंत्री ने इसकी  जांच का आश्वासन तक दिया था, यह याद रखना भी ज़रूरी है. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तक अडवानी  से इस मसले पर मिलने गए.

हेमंत और उनके दल के प्रति हिंदूवादी कहलानेवाले संगठनों की यह घृणा वह पृष्ठभूमि थी, इसमें मुम्बई के हमले के पहले घंटे में ही इस पूरे दल के मारे जाने की घटना को देखा गया. जिसने भी यह ख़बर सुनी, वह अविश्वास से जड़ हो गया. और कुछ सवाल तब से उठने लगे . मुसलमानों को खासकर हेमंत के मारे जाने का झटका लगा. उनके लिए ये मौतें असाधारण थीं.

अंतुले ने सिर्फ़ लोगों के मन में घुमड़ रहे सवाल को व्यक्त कर दिया. ताज में फिर से जश्न के माहौल  में अगर हम सामान्य जीवन की बहाली देखते हैं, तो अंतुले के सवाल में भी हमें सामान्य ढंग से सोचने के तरीके की अभिव्यक्ति देखनी चाहिए थी. लेकिन उनके बयान से जो तिलमिलाहट देखी जा रही है, वह क्या इसलिए है कि हम मुम्बई को ले कर एक राष्ट्रीय सत्य गढ़ने  की कोशिश कर रहे हैं और उसमें  कोई दरार नहीं देखना चाहते?

मुझे अंतुले से कोई सहानुभूति नहीं है. पिछले चार वर्षों में ऐसा कुछ भी खास उन्होंने किया  हो, याद नहीं. पर मैं अंतुले पर हो रहे चौतरफा आक्रमण को देख कर चिंतित ज़रूर हूँ. क्या हम हमेशा  के लिए एक अघोषित आपातकाल जारी रखना चाहते हैं जिसमें राज्य के सत्य पर प्रश्न उठाने पर पाबदी होगी? क्या यह सामान्य लोकतान्त्रिक जीवन है जहाँ सिर्फ़ एक प्रवक्ता होगा और कोई दूसरा स्वर न होगा?

 

  • विलंबित, जनसत्ता, दिसंबर, 2008
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