मुंबई पर दहशतगर्द हमले के बाद

कुछ क्षण ऐसे होते हैं जिनमें संतुलन और विवेक बनाये रखना आपके चरित्र की परीक्षा बन जाता है. ऐसा ही एक क्षण मुंबई पर दहशतगर्द हमले के बाद का था. हम यह कह सकते हैं इस मौके पर भारत के संपन्न वर्ग की बुद्धि और विवेक की पोल खुल गई. श्वेतवसना, मृदुभाषिणी सिमी ग्रेवाल ने लोगों को चुनौती दी कि वे फोर सीजंस पर चढ़ कर नीचे की झुग्गियों पर निगाह डालें:आपको कहीं भारत का ध्वज नहीं दिखलाई पड़ेगा, चारों तरफ़ पाकिस्तान झंडे लहराते हुए मिलेंगे. उन्होंने पाकिस्तान पर “कारपेट बोम्बिंग” कर डालने की सलाह दी.एक दूसरे गायक ने मारे गए दहशतगर्दों के शरीरों को टुकड़े-टुकड़े करके तरह-तरह से उन्हें बे-इज्ज़त करने का ख़याल जाहिर किया.अचानक यह समुदाय जो अपने-आप को सभ्य-परिष्कृत  दिखलाना चाहता रहा है, हिंस्र समूह में बदल गया. हर प्रकार के   समूह के स्पर्श से अपने को दूर रखने वाला यह समुदाय अचानक राष्ट्र में तब्दील हो गया. गंदे- भ्रष्ट राजनेताओं से इसने कहा कि अब बहुत  हो गया, वह भारत को उनके हाथों से वापस ले रहा है. टाटा  जैसे लोगों के हाथ देश की बागडोर सौंपने का विचार व्यक्त किया गया.पिछली सदी के महानायक ने अपने भय को एक राष्ट्रीय प्रतीक में बदलने  की कोशिश की जब उन्होंने कहा कि उस रात वे भी सिरहाने पिस्तौल रख कर सोये.उस समय किसी को उनके चिर-कायरता की याद दिलाने कि इच्छा न थी जिसके उदहारण अनेक हैं. .
धीरे-धीरे विवेक का स्वर सुनाई देने लगा. लोगों ने सिमी ग्रेवाल जैसे भद्र जन को अपना  सामाजिक और दृश्यात्मक प्रशिक्षण करने  की सलाह दी और तब  उन्हें यह समझ आया कि प्रत्येक  हरा झंडा पाकिस्तान का राष्ट्र ध्वज नहीं होता .यह अलग बात  है कि इसके बाद भी उन्हें अपने वक्तव्य के भयानक   आशय को लेकर शर्मिन्दगी न थी. . इस क्षण में भी एक लेखक ने ताज होटल को अपना टाउन हाल कहने वाले वर्ग से पूछा कि जिस नशीले पदार्थ का वे सेवन करते हैं,जो गैरकानूनी और जुर्म है उसे भारत में लाने    का एक रास्ता समुद्री भी है और उसके लिए  पुलिस  और चौकसी के तंत्र को भ्रष्ट  और पिलपिला करने का काम यही वर्ग करता है. क्या इस वर्ग को यह नहीं मालूम कि नशीले पदार्थ की तस्करी दहशतगर्दों की एक मुख्य आर्थिक गतिविधि है? इस तरह २६ नॉवेम्बर को मुंबई में जो भी हुआ, क्या उसके लिए परोक्ष रूप से वे भी जवाबदेह नहीं हैं? जिस रास्ते गैरकानूनी नशीले पदार्थ आते  हैं, उसी रास्ते हथियार भी आते हैं. हर रोज़ तीन के औसत पर अपने सदस्यों की जान गवाने वाली भारतीय पुलिस को की नाकामी के पीछे की वजहों  पर चर्चा  शुरू हुई. यह संपन्न वर्ग इस पुलिस का कैसा इस्तेमाल चाहता है?यह पुलिस इन्ही टाटा और उनके बंधुओं के लिए ज़मीन हथियाने के लिए ग्रामीणों को बन्दूक की नोक पर ग्राम सभा करके अपनी मंजूरी दिलवाती है. कलिंगनगर हो या नंदीग्राम, निहत्थी निरक्षर जनता के साथ इसका बर्ताव क्या रहा है, इस पर अभी चर्चा करना असंगत लग सकता है.लेकिन पूंजी की और राज्य की रक्षा में साधारण जन को मार डालने तक में इस वर्ग की राज्य के साथ सहमति है. जो पुलिस निरंतर ऐसे अमानुषिक दायित्व निर्वाह को बाध्य हो उससे कोई उम्मीद करना मजाक से बढ़ कर कुछ नहीं.
दहशतगर्दी का मकसद विवेक को पूरी तरह स्तंभित कर देने का होता है. अगर संपन्न, शिक्षित तबका लड़खडाता हुआ दिखा, तो दूसरी और साधारण जनता ने धीरज और साधारण बुद्धि से इसका सामना किया. पाँच राज्यों में चुनाव हुए. लोग हताश और  नाराज़ हो कर घरों में बैठे न रहे.वे निकले और अपने भविष्य के लिए अपने मत उन्होंने व्यक्त किए.परिणाम तसल्लीबक्श   हैं. क्या यह मत विकास के लिए है? क्या इसका संदेश सिर्फ यह है कि जनता रोटी, पानी और सड़क-बिजली चाहती है? जो इस मत की ऐसी व्याख्या कर रहे हैं, वे क्या यह कहना चाहते है कि उच्च वैचारिक मुद्दे जनता के नहीं और उन पर चुनाव लड़े और जीते-हारे नहीं जाते?
मुंबई का हमला चमत्कृत करने वाला असाधारण कृत्य था. चुनाव में मत देना रोज़मर्रा की मामूली कार्रवाई थी. इसमें चाक्षुष माध्यमों के लिए कुछ खास न था. लेकिन यह जीवन की साधारणता की अपराजेयता की घोषणा भी थी. समूहों में सड़क पर उतर कर उग्र राष्ट्रवादी और सैन्यवादी मुद्राएं अपनाने की जगह राष्ट्र  के उस हिस्से ने, जो मेहनत   करता है और  जो फसल उगाता है और जिसकी ज़मीनों पर ताज जैसी जगहों  के मालिकों की निगाह है, अपने ढंग से अपने बात कही है. राजनीतिक दलों को अभी इसकी व्याख्या करनी है. कांग्रेस को सबसे ज़्यादा जो भाजपा के उग्र राष्ट्रवाद से आतंकित  हो  कर पिछले  कई दशकों से  वही ज़ुबान बोलने की कोशिश कर रही है . क्या अभी भी वह राज्य तंत्र को अधिक मानवीय और अधिक लोकतान्त्रिक बनाने में यकीन रखती है? पूंजी की उग्रता और क्रूरता का समर्थन यदि वह जनता के विरुद्ध करती रहेगी तो समाज में हिंसा की भाषा की स्वीकार्यता बढेगी. समाज में तर्क , विवेक और विचार का अवकाश बढ़ाने के अलावा दहशतगर्दी  का  और कोई कारगर जवाब नहीं है.  इसका मतलब है  मानवीय  और हर प्रकार से अहिंसक राजनीति. इस बात पर उन्हें भी सोचना होगा जिन्होंने  मुबई के  हत्याकांड के बाद भी जनता के नाम पर छतीसगढ़, झारखण्ड, उडीसा में पुलिसवालों  की ही सही हत्या की. यह सम्भव नहीं की ह्त्या एक जगह जायज़ हो और दूसरी जगह नाजायज़.सवाल पूरी तरह से ह्त्या और हिंसा के तर्क पर पुनर्विचार का है.

 

  • विलंबित, जनसत्ता, दिसंबर, 2008
Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s