पारस्परिकता और सहिष्णुता की शिक्षा

दिल्ली में खिड़की इलाके में हाल में अफ़्रीकी निवासियों के रहन सहन पर स्थानीय रोषपूर्ण प्रतिक्रिया का उत्साहपूर्ण प्रतिनिधित्व करने के कारण दिल्ली सरकार के एक मंत्री संकट में पड़ गए हैं.उन पर कानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघन के साथ ही नस्लवादी रवैये का आरोप भी लगा है.उनके दल के लोग कानूनी प्रक्रियाओं के संबंध में बहस करने को तैयार हैं पर नस्लवादी भेदभाव के आरोप को मानने से इनकार करते हैं.

इस बीच खिड़की इलाके पर मीडिया का ध्यान गया है. जो खुद को स्थानीय कहते हैं, उनका रुख उन लोगों के बारे में कैसा है जो बाहरी देशों से आकर किराएदारों के तौर पर रहते हैं,इस पर चर्चा हुई है.इससे एक अच्छी बात यह हुई है कि हमें पता चला कि अफ्रीकी सब एक नहीं हैं. उगांडा,नाईजीरीइया,कांगो,केनिया,तंजानिया, मुल्कों के  भेद  का अर्थ संस्कृतियों और भाषाओं की भिन्नता भी है.  खिड़की की बात छोड़ भी दें तो दिल्ली विश्वविद्यलाय के छात्रों ने एक छोटे से शोध और अध्ययन से पाया था कि इस परिसर में और इसके इर्द गिर्द अफ्रीकी छात्रों को खसे भेद भाव का सामना करना पड़ता है.नेपालियों और उत्तरपूर्व के निवासियों का अनुभव अफ्रीकियों से बहुत अलग नहीं है.

क्या मान लिया जाए कि दिल्ली प्रायः नस्लवादी है? दिल्ली में मुसलमानों का अनुभव बहुत अलग नहीं है.इसलिए एक त्रासद मजाक उनके बीच प्रचलित है कि बाहर के राज्यों  से मुसलमान दिल्ली नहीं ओखला जाते हैं.इसका विरोध करनेवाले कहते हैं कि मसला नस्लवादी पूर्वग्रह का जितना नहीं है, उससे कहीं ज़्यादा नैतिक मान्यताओं के भेद और रहन सहन में फर्क का है. मसलन मुसलमानों को मकान न दिए जाने के पक्ष में कहा जाता है कि  वे मांसाहारी होते हैं.पहरावे में खुलापन वितृष्णा पैदा करता है.यूरोपीय अनुभव के साथ उपनिवेश के तौर पर लंबा वक्त गुजारने के बावजूद( या क्या उसी वजह से?) लड़कियों के स्कर्ट  और पतलून पहनने को लेकर हमारे भीतर एक अजीब द्वैध है. इस बात से हमें  अचरज होता है कि बाहर के लोग साड़ी को विचित्र पोशाक मानते हैं.

शुद्दता और प्रदूषण संबंधी  मान्यताएं अलग-अलग संस्कृतियों में भिन्न-भिन्न होती हैं और वे अलगाव के साथ एक-दूसरे के प्रति नफरत पैदा करती हैं.खान-पान में यह सबसे अधिक बरता जाता है.अक्सर पुराने दिनों को याद करते हुए हुए कहा जाता है कि भले ही हिंदुओं के घर मुसलमानों के लिए बर्तन अलग थे, दिलों में मुहब्बत थी.क्या वाकई ऐसा था?

यह भेदभाव सिर्फ हिन्दुतानी नहीं करते. फ्रांस में खुली सड़क पर बुर्का या अबाया देख कर जो डर पैदा होता है या लन्दन में घृणासूचक संबोधन के रूप में पाकी का प्रचलन  या अमरीका में दाढ़ी देखते ही हमले की खबरें,शिया-सुन्नियों के बीच की नफरत:इन सबसे यही पता चलता है कि हमसे जो भी अलग है वह एक स्तर पर डर पैदा करता है  और वह  डर  नफरत बन कर भीतर दबा रहता है और बीच-बीच में कई बहानों से  हिंसक  रूप में फूट पड़  सकता है. हिटलर पैदा कैसे  हुआ था? यहूदियों के खिलाफ व्याप्त नफरत की अभिव्यक्ति तो महान मानवतावादी शेक्सपीयर में ही मिल जाती है. हिटलर उसका सबसे हिंसक प्रवक्ता मात्र था.

भारतवासियों ने एक भ्रम अपने भीतर पाल लिया है कि वे दुनिया के सबसे सहिष्णु प्राणी हैं. कुछ सिद्धांतकार ऐसे हैं जो मानते हैं कि  यूरोपीय आधुनिकता ने भारत के पारम्परिक समाजों की चेतना मैं  एक दरार दाल दी है.साम्प्रदायिकता जैसी विकृति को वे इसी की देन  मानते हैं. तो क्या हम मान  लें कि सहिष्णुता कुछ खास समाजों का गुण है और अन्य  का नहीं? क्या सहिष्णुता और पारस्परिकता स्वाभाविक, प्राकृतिक हैं और कुछ समाजों को विरासत में मिलती हैं?

सहिष्णुता और पारस्परिकता के प्रश्न पर हमने गंभीरता से कभी विचार नहीं किया है.ऐसा करते ही हमें समझ में आ सकता है कि मुज़फ्फरनगर, खिड़की और गुजरात की समस्या को अलग-अलग हल नहीं  किया जा सकता. इसका रिश्ता इस बात से है कि  हम नई प्रकार की सामुदायिकता को आधार देने के लिए नई भाषा का आविष्कार कर सकते है या नहीं. औपनिवेशिकता से संघर्ष करते हुए इस प्रश्न पर सबसे अधिक विचार गांधी और उनके बाद आंबेडकर और नेहरू ने किया. गांधी का फ्रेम प्रायः हिंदू था फिर भी वे तरह-तरह के प्रयोग करके एक सहिष्णु समाज के रीति-रिवाज,उसके अनुष्ठान , आदि की खोज कर रहे थे. जब वे   कहते हैं कि मुसलमानों से प्रेम के लिए  और उनके मत में निहित मानवीय सन्देश के महत्व के स्वीकार के लिए मुसलमान होना ज़रूरी नहीं, या जब वे एक हिंदू से, जिसका बेटा हिंदू-मुस्लिम हिंसा में मारा गया है, यह शर्त रखते हैं कि  तुम  अपने बेटे की उम्र का ही एक मुसलमान लड़का खोजो और उसकी परवरिश मुसलमान की तरह करो तो वे सहिष्णुता के लिए आवश्यक भावनात्मक शिक्षा और आयास के तत्व पर बल दे रहे हैं.

पारस्परिकता हो, इसके लिए ज़रूरी होगा कि हम भिन्न तत्वों के एक-दूसरे में विलय पर जोर न दें. विलय के प्रलोभन का सामना करना ही सबसे बड़ी चुनौती है. लेकिन इसका अर्थ यह होगा किहम निरंतर खुद पर  आलोचनात्मक निगाह रखें.धर्म परिवर्तन करके विवाह करने या साथ रहने से अधिक चुनौतीपूर्ण है उसके बिना ऐसा सम्बन्ध बनाना.और ऐसा मात्र काज़ी नजरुल  इस्लाम और उनकी संगिनी ने ही नहीं अनेक लोगों ने किया है.

गांधी के धार्मिक फ्रेम से अलग साझा सामुदायिकता के लिए नागरिकता का एक फ्रेम भारतीय संविधानसम्मत धर्मनिरपेक्षता के रूप में प्रस्तावित किया गया. यह एक नई अवधारणा थी. इसके लिए नए सांस्कृतिक मुहावरे की आवश्यकता थी. मात्र पहले से मौजूद धार्मिक बिम्बों के सहारे इसे गढ़ना मुमकिन न था.यह एक अभ्याससाध्य अनुभव था. राजनीतिक और सामाजिक  स्तर पर गांधी और अन्य व्यक्तियों के द्वारा किए जा रहे पारस्परिकता के प्रयोगआज़ादी के बाद धीरे-धीरे बंद हो गए. अन्य या भिन्न  के साथ रिश्ता सुविधा के आधार पर था. रामलीला में रावण बनाने के लिए तो मुसलमान स्वीकार था, लेकिन रिश्ते के  लिए नहीं, दफ्तर में दलित को सहा जा सकता था लेकिन बगल में बिठाने में उलझन बनी रही, नेपाली हों या अफ्रीकी या मणिपुरी, किराएदार के तौर पर तो फायदेमंद हैं लेकिन उनके प्रति आदर का प्रश्न ही पैदा नहीं होता.खिड़की में अफ्रीकी,अफ़गानी या ‘ट्रांसजेंडर’ से ‘सामान्य’ हिन्दुस्तानियों से अधिक किराया मिलने के कारण ही उन्हें बर्दाश्त किया जा सकता है  लेकिन जब हमारे बच्चे उनकी खिल्ली उड़ा रहे हों या पत्थर फ़ेंक रहे हों तो इसे  नज़रअंदाज करने को भी कहा जा सकता है.

पारम्परिक समाजों का गुणगान करने की जगह हमें अपना  बौद्धिक श्रम उस भाषा की तलाश में लगाना चाहिए जो नितान्त भिन्न को एक-दूसरे को समझने की क्षमता दे सके. धर्मनिरपेक्षता और संविधान की भाषा को पराया कहकर उसका मज़ाक उड़ाने की जगह एक सार्वदेशिक संवेदना की शिक्षा के उपाय खोजने चाहिए. मुज़फ्फरनगर या खिड़की के सोमनाथ को यह करना चाहिए था. दुर्भाग्य यह है कि उन्होंने आसान रास्ता चुना.उन्हें छोड़ दें, इस चुनौती को हममें से कितने स्वीकार करने को तैयार  हैं?

  • नवनीत, जनवरी, 2014

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