गाज़ा : बहुत बड़ी कब्रगाह

वे पांच बहनें गहरी नींद में सोई थीं जब बगल की मस्जिद को  इस्राइल के हवाई हमले ने  निशाना बनाया. मस्जिद की एक दीवार  उनके एस्बेसटॅस  की छत वाले घर  पर गिरी और वे पांचों अपने बिस्तर में ही मारी गयीं. तहरीर, 17; इकरम, 15; समर, 12;दीना, 8 और जवाहर, 4 के लिये अलग-अलग कब्रें नहीं थीं और उन्हें तीन कब्रों में ही दफनाना पड़ा. गाज़ा एक बहुत बड़ी कब्रगाह है. कुछ वर्गमील में  फैली हुई यह पट्टी एक बडा सा स्लम है जिसमें लाखों लोग किसी तरह जिन्दा रहने की कोशिश कर रहे हैं.

गाज़ा में ये अपनी मर्जी से नहीं रह रहे हैं. 1948 में , जब युरोप और अमरीका की शह पर यहूदियों ने इन तमाम लोगों के दादा- नानाओं को उस जगह से बेदखल किया , जो अब इस्राइल कही जाती है तो उन्हें गाज़ा में पनाह लेनी पड़ी. वे सब जो अब इस्राइली हमलों के निशाने पर हैं, शरणार्थी हैं. ठीक ही राबर्ट फिस्क ने लिखा है कि यह  इतिहास जानना उन सबके  लिए ज़रूरी है जो ऐसा समझते  हैं कि कुछ पागल कट्टरपंथी मुसलमान बिना वजह बेचारे इस्राइल पर रॉकेट छोड रहे हैं और इस्राइल के पास इस रोज़-रोज़ की किच-किच को बंद करने का कोई उपाय रह नहीं गया था सिवाय इसके कि वह एक फैसलाकुन हमला करे और हमास को पूरी तरह से नाकाम कर दे. इसी तर्क का सहारा लेकर अमरीका ने सुरक्षा परिषद में कुछ वक्त के युद्ध विराम के प्रस्ताव को भी वीटो कर दिया.
गाज़ा का बने रहना हमेशा इसकी याद दिलाता रहेगा कि तकरीबन साठ साल पहले एक बड़ी नस्ली सफाई के लिए किए गए हमले में अपने घरों से खदेड़े गए अरब भाग कर शरणार्थी बनने को मजबूर हुए. गाज़ा का चिर-विद्रोही बने रहना एक तरह की बाध्यता है. लेकिन क्या हमारे नेता और हमारे संचार-माध्यम इस इतिहास के बारे में कुछ कह रहे हैं? साठ साल क्या इतनी बड़ी अवधि है कि हम फिलीस्तीनियों से यह कहें कि वे भूल जाएं कि उनका कभी कोई घर था? और यह इसलिए कि एक बहुत ताकतवर और खूंखार राष्ट्र् ने उस पर कब्जा कर रखा है जिसे अमरीका और युरोप ने हथियारों और बाकी सुविधाओं से लैस किया है और उससे लडने से कोई फायदा नहीं? कम-से कम  भारतवासियों को तो इस तर्क को
नामंजूर करना  ही चाहिए क्योंकि हमारे पूर्वजों ने दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य के आगे हथियार नहीं डाले और उनकी श्रेष्ठता का कोई भी दावा कबूल नहीं किया.
इस्राइल कह रहा है कि वह हमास को नाकाम किए बिना गाज़ा से नहीं लौटेगा. उसकी विदेश मंत्री कह रही हैं कि गाज़ा में कोई मानवीय संकट नहीं है और इसलिए लोगों को फौरी मदद देने के लिए हमला रोकने की कोई ज़रूरत भी नहीं है. हवाई हमले के बाद अब पिछ्ले चार रोज़ से इस्राइल गाज़ा में ज़मीनी हमला कर रहा है. लगभग छह सौ फिलीस्तीनी मारे गए हैं. यह कहना आवश्यक नहीं कि हमेशा के लिये हज़ारों अपाहिज बना दिए गए हैं और सब कुछ बर्बाद कर दिया गया है. हम हमास और उसके राकेट के हमलों की चर्चा कर सकते  हैं और अभी के इस्राइली हमले का औचित्य खोज  सकते हैं, बिना इसका उल्लेख  किए कि इन राकेटों से  पिछ्ले आठ सालों में बीस इस्राइली मौतें हुई हैं और अभी सिर्फ आठ रोज़ में छह सौ फिलीस्तीनी मार डाले गए हैं. कहा जा सकता है कि संख्या की  तुलना का कोई मतलब नहीं. लेकिन किसी ने ठीक ही पूछा है कि क्या तुलना को इसी तरह अप्रासंगिक माना जायेगा अगर ये संख्याएं उलट दी जाएं? तो क्या इसका यह मतलब है कि  फिलीस्तीनी जानों की कोई कीमत नहीं? गाज़ा का दम पिछ्ले एक साल से घोंटा जा रहा है. इस्राइल ने वहां दवा, खाना, कपड़ा पहुंचाना अपनी नाकेबंदी से असंभव बना दिया है.क्या आपने अपने अखबारों में इस नाकेबंदी की खबरें पढी हैं? क्या आप यह जानते हैं कि गाज़ा के लोग अंधेरे में रहने को मजबूर  हैं क्योंकि वहां बिजलीघर के पास तेल नहीं है? हस्पतालों में दवाएं नहीं हैं और अब तो हस्पतालों की इमारतें भी इस्राइली हमलों में गिराई जा रही हैं.

इस्राइल भारत में कुछ समय से एक आदर्श की तरह पेश किया जा रहा है. तस्वीर कुछ ऐसी खींची जाती है कि बेचारा इस्राइल भी आतंकवाद का शिकार है और हम भी. लेकिन हमारे पास इस्राइल की तरह प्रतिरोधक ताकत नहीं. हम इस्राइल की तरह सख्त भी बनना चाह्ते हैं. हम यह भूल जाना चाह्ते हैं कि इस्राइल फिलीस्तीनियों की ज़मीन पर गैरकानूनी कब्जा करने का अपराधी है और उसकी सारी  ताकत इस गैरकानूनी कब्जे को बरकरार रखने  के लिए ही है. यह विडंबना
है कि  एक हमलावर अपने-आप को एक शिकार की तरह पेश कर रहा है और उसकी इस धोखाधड़ी में दुनिया के सारे सभ्य देश शामिल हैं.

हम चाहते हैं कि दुनिया हमारे दर्द में शरीक हो. लेकिन  खुद हम दूसरों के दर्द में शरीक नहीं.फिलीस्तीनीयों के साथ पिछली सदी से चली आ रही नाइंसाफी के खिलाफ हमारी आवाज़ कमजोर पडती गई है. अब हमारी सरकार अमरीका
और इस्राइल के सहारे आतंकवाद से लडना चाह्ती है.अपनी दह्शतगर्द नीतियों की वजह से दुनिया के दो सबसे असुरक्षित और डरे हुए मुल्कों से हम सीखना चाहते हैं, जो अपने इस डर की वजह से क्रूर से और क्रूर होते जा रहे हैं.

 

  • विलंबित, जनसत्ता, जनवरी, 2009
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