स्कूल और राज्य का रिश्ता

लालगढ़ में अपने स्कूल को खाली करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे बच्चों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया. प्रदर्शन सिर्फ बच्चे नहीं कर रहे थे. उनके साथ इलाके के लगभग दस हज़ार लोग भी थे. पुलिस और अर्ध सैन्य बल  एक जुलाई से स्कूल में डेरा डाले हुए हैं क्योंकि उन्हें माओवादियों के खिलाफ अपना अभियान अभी चलाते रहना रहना है. बंगाल के गृह सचिव ने इस काण्ड पर अफ़सोस जताते हुए यह कहा है कि स्कूल जुलाई के अंत तक  खाली कर दिए जाएंगे. कहना मुश्किल है कि अर्धेन्दु सेन का यह आश्वासन पूरा हो पाएगा, अगर आप पूरे भारत में पुलिस के किसी इलाके में प्रवेश का इतिहास उठा कर देखें. पुलिस और सैन्य बलों  को सबसे आसान स्कूलों की इमारतें लगती हैं जहां से वे राज्य की  हिफाजत के लिए अपना  हिंसक अभियान चला सकते हैं. बिहार के उन इलाकों की बात करना यहाँ अप्रासंगिक न होगा जहां नक्सलवादियों का मुकाबला करने पहुंचे राज्य के सशस्त्र   बल  सबसे पहले स्कूलों पर कब्जा करते हैं. फिर स्कूल महीनो , सालों तक बंद हो जाएँ, राज्य-प्रशासन के लिए खास फिक्र की बात नहीं . राज्य की आतंरिक सुरक्षा के पवित्र अभियान के आगे हर दूसरी चीज़ हेच है.


स्कूल की इमारतें पढाई के अलावा कई कामों के लिए इस्तेमाल होती हैं. बच्चों ने यहाँ मतदान केंद्र बनते हुए देखे हैं . राज्य समर्थित अनेक “जनोपयोगी” कार्यक्रम यहीं से संचालित किए जाते आरहे हैं. यह सब कुछ इसलिए कि स्कूल की  इमारत ही शायद एकमात्र  पक्की राजकीय पनाहगाह है. इससे कोई  रूपक  बनाने की कोशिश न भी करें तो इसे देखे बिना नहीं रह सकते कि स्कूल और राज्य का रिश्ता कितना सघन है और स्कूल राज्य के लिए कितना महत्वपूर्ण  है. तो क्या स्कूल  का मतलब है  राज्य की सुरक्षा चौकी ?

लालगढ़ में तकरीबन आठ महीने तक राज्य के हर निकाय को सीमा से बाहर कर दी जाने की जन -कार्रवाई को जब माओवादियों ने हिंसक रूप देना शुरू किया और केंद्र और राज्य सरकारों को यह मौका दिया कि वे लालगढ़ पर राज्य का प्रभुत्व स्थापित करने के लिए सशस्त्र अभियान चलाएं, तो उसी समय बंगाल के वाम-मोर्चा सरकार को ध्यान आया कि जनता उससे इसलिए रूठ गई   है कि उसने उसके लिए कार्यक्रम ठीक से चलाए नहीं   हैं. इस वजह से लालगढ़ में सैन्य -कार्रवाई   के साथ ही ‘विकासमूलक’ योजनाओं को लागू करने पर भी जोर दिया गया, ऐसा अखबार बताते हैं. जाहिर है कि इस पूरी योजना में सरकार ने स्कूल में अबाधित पढाई को दोयम दर्जे पर रखा. 


स्कूल और कॉलेज वैसे भी पार्टी के लिए समाज पर अपना प्रभुत्व और तगडा करने के साधन से अधिक और कुछ नही  रहे. यह ताज्जुब की बात नहीं कि बंगाल की स्कूली किताबें उन सारे दोषों से ग्रस्त हैं जिनके आधार पर दूसरे राज्यों की स्कूली किताबों की शिक्षाशास्त्री आलोचना करते रहे हैं और  उन्हें बदलने की मांग करते रहे हैं.बंगाल  में बुद्धिजीवी  इसे ध्यान देने योग्य मसला मान ही नहीं पाए.


वह आधार क्या है जिस पर शिक्षा को टिका होना चाहिए? सबसे  पहले एक प्रश्नात्मक दृष्टि की ज़रुरत है जो किसी भी निष्कर्ष को जांचने के लिए औचित्य प्रदान कर सके. दूसरे, विचारधारा  की जगह जीवन और मनुष्य को अधिक महत्वपूर्ण  मानना . मार्क्सवादी दलों के लिए ये दोनों चीज़ें ही असंभव हैं. यह उम्मीद करना की मार्क्सवादी दल इस मामले में कुछ तब्दीली अपने भीतर ला पाएंगे, निरर्थक आशावाद है .यह कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे आप भारतीय जनता पार्टी से धर्मनिरपेक्षता पर यकीन लाने की उम्मीद करें.


जीवन के किसी भी क्षेत्र की दल की अपेक्षा स्वायत्तता से इनकार करना वह वैचारिक धुरी है जिस पर वाम शासित बंगाल अब तक नाचता रहा है. अब वह विरोध कर रहा है और इसे समझाने में वामपंथी असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं कि जनपक्षी विचारधारावाली पार्टी को छोड़ कर वह  प्रतिक्रियावादी दलों की और जाने की मूर्खता क्यों कर रहा है. या वे समझते हैं और जनता को नियंत्रित करने के दूसरे रास्ते खोजने तक  वक्त चाह रहे हैं?


सी.पी.एम्. जिस बुनियादी विचार पर टिकी है , माओवादी उसी के एक दूसरे संस्करण  को मानने वाले हैं. इसलिए सी.पी.एम्. के नियंत्रण से  मुक्ति उनके रास्ते खोजना मूर्खता ही है. लालगढ़ में जिन स्कूली बच्चों पर राज्य की पुलिस ने लाठी चलाई , क्या उन्हें प्रदर्शन में ढाल के तौर पर इस्तेमाल करने की योजना माओवादियों ने बनाई थी?
जब हम एक निरंकशुता  का विरोध कर रहे हों तो इसकी सावधानी हमें ही बरतनी पड़ेगी कि उसके विरोध की आड़ में  कहीं हम दूसरी निरंकुशता  को न्योता तो नहीं   दे रहे. बंगाल में लालगढ़ की घटनाएं इस जटिल प्रश्न को और उभार कर रख रही हैं.

 –  विलंबित, जनसत्ता, जुलाई, 2009
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