लालू यादव की हड़बड़ी

 

लालू यादव बिहार में अपनी छिन गई ज़मीन को वापस लेने की हड़बड़ी में हैं.वे जनता के बीच जा रहे हैं और उसकी मुश्किलों को समझने की कोशिश में लगे हैं. इन पर बात करने का लाभ यह है कि वे इस बहाने नीतीश कुमार पर हमला कर सकते हैं. प्राकृतिक आपदा हमेशा ही विरोधी दलों के लिए सरकार की आलोचना करने का अच्छा मौका देती है. इस बार मानसून में व्यतिक्रम होने से देश के दूसरे प्रदेशों की तरह ही बिहार के कई इलाके सूखे से पीडित हैं.इसके लिए जिम्मेदार कौन है? वैज्ञानिक प्रकृति में हो रही तब्दीलियों का पृथ्वी के भविष्य के लिए अर्थ समझने का प्रयास कर रहे हैं. राजनेता इस समझदारी का इस्तेमाल ऐसी नीतियों के निर्माण के लिए कर सकते हैं जो पर्यावरण पर कम से कम बोझ डालें.यह  शासन कर रहे दल और विपक्षी दलों का समान दायित्व है.

लालू यादव अपनी ज़िम्मेवारी कैसे निभा रहे हैं? पिछले दिनों पटना के करीब फुलवारी शरीफ की एक सभा में उन्होंने बिहार में पड़े सूखे के लिए नीतीश कुमार को जिम्मेदार ठहराया. नीतीश कुमार ने पिछले महीने सूर्यग्रहण के दिन तरेगना में रहने का फैसला किया था. मध्य बिहार के इस गांव में सूर्य ग्रहण का सबसे खूबसूरत नज़ारा होने की बात कही गई थी. दुनिया भर से खगोलविद वहां इकट्ठा हुए थे. वे स्वयं सूर्यग्रहण के वक्त आसमान के नीचे वैज्ञानिकों के साथ इस दुर्लभ दृश्य का आनंद लेना चाह्ते थे.प्रकृति लेकिन इतनी आसानी से अपना खजाना सबके सामने  नहीं खोलती. सूर्यग्रहण शुरू होने के पहले बादलों ने आसमान को ढंक लिया. मुख्यमंत्री समेत अन्य  सभी पर निराशा छाने लगी. बादलों के पीछे कुदरती करिश्मा शुरू हो चुका था.इसके मायने इंसानों के लिए क्या हो सकते थे? शताब्दियों से धर्मों ने इसकी व्याख्या करते हुए इसे मनुष्य के लिए अशुभ बताया है. हमारे ब्राह्मणीय शास्त्रों ने इससे जोडकर आचार व्यवहार  का एक ऐसा तंत्र विकसित किया जो फिर अपनी हिफाजत के लिए कमतर मनुष्यों को उनकी शरण में ढकेले.कर्मकांड का एक हिस्सा तो स्नान का है. ग्रहण के समय कुछ भी न खाना, नया कपडा न पहनना इसमें शामिल है. शौच और अशौच के नियमों का व्यापक प्रावधान करके और इन सबकों मनुष्यों के सांसारिक जीवन से अभिन्न करके दिमाग में ऐसा भय बिठा दिया गया है कि सामान्य जन सूर्य ग्रहण जैसी घटनाओं को  दैवी प्रकोप मान कर घर में छिपे रहें और दान-दक्षिणा आदि करके अपनी रक्षा के उपाय करें.

सूर्य ग्रहण की प्रतीक्षा कर रहे एक वैज्ञानिक अमिताभ पांडेय ने पास पड़े केक का एक टुकड़ा मुख्यमंत्री को खिलाया.नीतीश ने और सभी को केक पेश किया. यह ऐसी घटना थी जिसे सारे टेलिविज़न चैनलों पर दिखाया जाना चाहिए था और उसी तरह अखबारों में इसकी तस्वीर छपनी चाहिए थी जैसी बैडमिंटन का खेल खुले स्टेडियम में देखते चिदंबरम की छापी गई जो ऐसा करके दुनिया के मन  से असुरक्षा मिटाना चाहते थे. नीतीश ग्रहण के समय खाकर उससे भी बडा दैवी भय हटाने का संदेश दे रहे थे.जिस समय हरियाणा के मुख्यमंत्री ग्रहण का स्नान कर रहे थे, वे बिना शोर किए रोज़ाना ज़िंदगी में वैज्ञानिक रवैय्ये की एक मिसाल रख रहे थे.

लालू ने कहा कि ऐसा नीतीश  ने किया, इसी वजह से सूखे का दैवी प्रकोप बिहार पर टूट पडा. यह बयान एक हताश राजनेता का मान कर नज़रन्दाज किया जा सकता है. लेकिन जो लोकतांत्रिक  भारत के सांवैधानिक मूल्यों की बात करते हैं, उन्हें इसे एक राजनेता की गैर-जिम्मेदार हरकत मान कर इसकी भर्त्सना करनी चाहिए. धर्म-निरपेक्षता का सीधा संबंध दुनियावी मसलों में दैवी दखल से इनकार करने से है. नीतीश ने  बड़े मामूली तरीके से नेता के गुण का परिचय दिया. लालूजी ने ब्राहमणीय कर्मकांडी मूर्खता का प्रचार किया .ऐसा करके उन्होने सिर्फ यही जाहिर किया कि सामाजिक न्याय और धर्म-निरपेक्षता जैसे मूल्यों से उनका रिश्ता सुविधा का है. न तो ये उनके मनोजगत के घटक तत्त्व हैं, न ही वे जनता को पुरानी जकड़बंदी से निकलने का सम्बल देना चाहते हैं. वे तो  स्वयं एक नए ब्राहण का पद पाना चाहते हैं.

 

  • विलंबित, जनसत्ता, अगस्त, 2009
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