कविता खत्म, यहां से इरोम शर्मिला का गद्यात्मक जीवन शुरू होता है

इरोम शर्मिला वह शहीद नहीं रहीं जिसकी मणिपुर को तलाश थी. और उनको इसकी सजा उनके अपने लोग ही दे रहे हैं. सोलह साल के प्रतिरोधी उपवास को खत्म करने के बाद जब इरोम पहली रात आज़ादी की बिताने निकलीं तो उन्हीं लोगों ने, जिनके सम्मानपूर्ण जीवन के लिए वे संघर्ष कर रही थीं, उन्हें शरण देने से इनकार कर दिया. पहले वे अपने एक डॉक्टर मित्र के घर पहुँचीं. उनके मोहल्ले वालों ने शांति भंग होने के नाम पर उनके वहाँ रहने का विरोध किया. फिर वे इस्कॉन के एक मंदिर गईं, वहां से भी उन्हें इसी बहाने से बाहर किया गया. आखिरकार उनकी हिफाजत कर रही पुलिस उन्हें हस्पताल के उसी वार्ड में  ले आई जहाँ उन्होंने  पिछले कई साल हिरासत में बिताए थे.

यह विडंबना है कि वही  भारतीय राज्य इरोम का शरणदाता बना जिसके विरुद्ध वे लड़ रही थीं. बताया गया है कि शायद एक महीने तक तो उन्हें वहाँ रहने की इजाजत होगी लकिन फिर उन्हें अपना ठिकाना देखना होगा. उन्हें जबरन नाकके रास्ते भोजन देने में भी इन वर्षों में राज्य ही पैसा लगा रहा था, अब यह चिंता भी जाहिर की जा रही है कि आगे इरोम के खाने पीने का इंतजाम कौन करेगा.

मणिपुर अपनी ताकतवर औरतों के संघर्ष के लिए जाना जाता है. उनके संगठनों ने अपने प्स्तारों से इरोम शर्मिला का नाम और चित्र हटाने का फैसला किया है. इरोम बचाओ मंच ने भी खुद को उनसे दूर करने का निर्णय किया है.

एल दिन पहले जो नायिका थी, अब अपने लोगों के लिए अस्पृश्य है! यह इसलिए कि वे सब इरोम के उपवास समाप्त करने और एक सामान्य राजनीतिक जीवन जीने के निर्णय से ठगा हुआ और आहत महसूस कर रहे हैं. इरोम ने जब इसका ऐलान किया  तो मणिपुर में आश्चर्य, क्रोध की अभिव्यक्ति देखी गई. कहा गया कि यह निर्णय इरोम ने अकेले ले लिया, किसी से मशविरा नहीं किया. यह भी कहा जा रहा है कि इरोम को मोबाईल और लैपटॉप देकर उनका  दिमाग फेर दिया गया है.

‘यह इरोम वह नहीं जो हमारी थी.’ कल तक इरोम शर्मिला से आत्मीयता का दावा करने वाले अब यह  कह रहे हैं.बबलू लोइतोंग्बाम जैसे लोग भी हैं, भले ही संख्या में कम जो इरोम के इस कदम को समझते हुए उनके साथ हैं.वे कहते हैं कि उपवास समाप्त करने के निर्णय को वे समझ सकते हैं क्योंकि यह स्पष्ट  होता जा रहा था कि यह उपवास अप्रासंगिक हो गया है. पिछली सरकार इरोम से कुछ संवाद तो कर रही थी,लेकिन एक राष्ट्रवादी सरकार के सत्ता में आने के बॉस यह साफ़ हो गया  कि उसका कोइ इरादा आफ्सपा को खत्म करने का नहीं  है. पिछली सरकार द्वारा नियुक्त जीवन रेड्डी रिपोर्ट को उसने रद्द कर दिया है. ऐसी स्थति में, बबलू के मुताबिक़, उपवास कुछ असर करता नहीं दीख रहा था. विरोध के दूसरे रास्ते देखने की ज़रूरत थी. इसलिए शुरू में इरोम के फैसले से चकित बबलू ने आखिरकार उनके साथ खड़े रहने का निर्णय किया.

स्वजनों के द्वारा निराश्रित कर दी गई इरोम शर्मिला को रेड क्रॉस ने पनाह की पेशकश की है. रेड क्रॉस सबका है लेकिन वह किसी का भी नहीं है, क्या इसीलिए वह यह साहस कर पाया है? शर्मिला ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है.उन्होंने यह भी कहा है कि आगे वे किसी आश्रम में रहना चाहेंगी.

सोलह साल तक मुंह से कुछ भी अन्न जल ग्रहण न करके इरोम ने प्रभुत्वशाली भारतीय राज्य का विरोध जारी रखा यह मांग करते हुए कि वह आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट ( 1957 ) को रद्द करे. जितना मणिपुर के सशस्त्र दलों ने नहीं, उससे कही ज़्यादा इस एक अकेली स्त्री के संकल्पपूर्ण  उपवास ने इस अमानवीय और जनविरोधी क़ानून के खिलाफ जनमत ही नहीं तैयार किया बल्कि खुद भारतीय राज्य के अलग-अलग निकायों को मानने पर मजबूर किया कि इस क़ानून को बदला जाना चाहिए.इरोम शर्मिला का यह निर्णय खुद उनका लिया हुआ था. आज चवालीस साल की शर्मिला तब सिर्फ अठाईस सालकी थीं जब उन्होंने यह कठिन निर्णय किया. इस क़ानून को खत्म किए बिना अन्न जल न ग्रहण करने और अपनी माँ से  न मिलने के निर्णय में शहादत के सारे नाटकीय तत्व थे. उस समय शर्मिला को शायद  यह भान न रहा होगा कि जिस राज्य के खिलाफ उनका संघर्ष है, वह अपनी मानवीयता के प्रमाण के तौर पर उन्हें जीवित रखने के सारे उपाय करेगा लेकिन उस कानून पर पुनर्विचार नहीं करेगा जिसने एक पूरी आबादी को शेष भारत के नागरिकों के मुकाबले दोयम दर्जे पर रखा है.

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