अगर पड़ोसियत नहीं है तो …

इस बार आज़ादी की साल गिरह के मौके पर राजधानी दिल्ली से दूर कुछ हो रहा था जिनका भारतीय जनतंत्र के लिए  दूरगामी महत्त्व हो सकता है. दिल्ली के ठीक बगल में, मुज़फ्फरनगर के शामली (कांधला) और कैराना में कुछेक सौ मकान बनाए गए और उनमें रहनेवालों ने उन्हें आबाद करना शुरू किया, यानी इनमें अब जान आ गई और ये घर बन गए. मकान बनते रहते हैं और घरों की शख्सियत हासिल करते रहते हैं. लेकिन इनमें कुछ ख़ास था. ये मकान उनके थे जो आज से तीन साल पहले की मुज़फ्फर नगर  की मुस्लिम विरोधी हिंसा के कारण अपने गाँव छोड़ने को मजबूर हुए थे और फिर उनका वहाँ लौट पाना नामुमकिन हो गया था.

अपने आबाई इलाके से निकलने को मजबूर मुसलमानों ने ये मकान खुद बनाए. उनकी मदद की सद्भावना ट्रस्ट, वनांगना और हुनरशाला  नामक संस्थाओं ने. ज़मीन सरकारी मुआवजे के सहारे खरीदी गई और फिर मकान जिसकी जैसी हैसियत है, उस हिसाब से बने. मकान बनाने के लिए इन संस्थाओं ने आर्थिक सहायता की. मतलब, सारे मकान एक जैसे नहीं हैं जैसा अक्सर इस तरह की कॉलोनियों में होना स्वाभाविक माना जाता है. हर घर को दूसरे से अलग होना चाहिए, तभी तो वह जिसका है उसकी छाप उस पर होगी.

इस कॉलोनी का नाम अपना घर है. ऐसा नहीं कि इन तीन सालों में अलग-अलग जगह राहत शिविरों और अपने उन शिविरों को सरकार के द्वारा तोड़ दिए जाने के बाद भटकने को मजबूर मुसलमानों की यह कोई पहली बस्ती है. आज से दो साल पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) ने तकरीबन सत्तर लाख रुपयों की सहायता के जरिए चौवन परिवारों को जौला में अपने घर बनाने का हौसला दिया. इस कॉलोनी का नाम एकता नगर रखा गया.

एकता नगर के साल भर बाद पारसोली में अठासी परिवारों को मकान बना कर दिए गए. यह काम जमाते इस्लामी हिंद ने किया. इस कॉलोनी का नाम फलाहे आम दिया गया.

मजलिस मुशावरात भी इसी तरह कुछ परिवारों के लिए कॉलोनी बनाने को साधन इकट्ठा कर रही थी, यह खबर फलाहे आम के उद्घाटन के समय दी गई थी.

इन तीनों बस्तियों के नाम धर्म निरपेक्ष हैं. फलाहे आम उर्दू शब्दों से मिलकर बना है, लेकिन हमारी कहने की आदत है, उर्दू होने के बावजूद यह धर्मनिरपेक्ष शब्द ही है. इन बस्तियों के बनने और उनके नामकरण में भारतीय धर्म निरपेक्षता की विडंबना छिपी हुई है, अगर कोई उसे समझना चाहे. ये नाम क्या इन नई बस्तियों के बाशिंदों ने दिए हैं या उनके हितचिन्तकों ने, जिनकी मदद से ये बनी हैं? इन नामों में एक इच्छा छिपी है, हालाँकि वह एकतरफा है. अपनापन, एकता, सबका कल्याण: यह कामना है जो इन नामों से प्रकट होती है. लेकिन यह कामना कर कौन रहा है? वह जो हिंसा का शिकार रहा है और जिसका हमलावर अपनी हिंसा के नतीजे को लेकर कोई पश्चाताप नहीं करना चाहता.

अपनापन और एकता ऐसे शब्द या अवधारणा हैं जो दो से अधिक पक्षों की शर्त पर टिके हैं. एकता अपने आप से नहीं की जा सकती जबतक कि आप विभाजित व्यक्तित्व की बात न कर रहे हों. उसी प्रकार अपनापन अपने आप से नहीं होता. अपना घर नाम में जितनी अपनी मिल्कियत का संतोष है, उससे कहीं ज्यादा अपनेपन की खोज है. लेकिन इसके लिए दूसरे के अस्तित्व का होना ज़रूरी है. फलाहे आम में भी सबके कल्याण की मंगलकामना है, सिर्फ मुसलमानों के भले की नहीं.

वह दूसरा कौन है? इन सभी मामलों में वह हिंदू ही है. भारत में आज़ादी के बाद की सच्चाई यही है. फिर मुज़फ्फरनगर के ये विस्थापित मुसलमान किससे एकता, अपनेपन की माँग कर रहे हैं? क्या वह इसके लिए इच्छुक भी है?

स्थानीय हिंसा के चलते विस्थापन भारत के अलग-अलग राज्यों के मुसलमानों के लिए अब आदत में शुमार हो गया है. घर लौटना उनके लिए फिर विकल्प नहीं रह जाता. इसके लिए भी उन्हें ही दोषी ठहराया जाता है. कहा जाता है कि वक्ती गुस्से में अगर पड़ोसियों ने कुछ कर दिया तो क्या इसके लिए उनसे जीवन भर को अदावत या दूरी बना लेना ठीक है? मुसलमान अपनी पुराने पड़ोस में लौटने से हिचकते हैं, यह इसका सबूत भी माना जाता है कि उन्हें असल में मुआवजे का लालच है और वे सरकारी दामाद हैं. यह फब्ती अनुसूचित जाति के लिए भी दूसरे मौकों पर इस्तेमाल होती है.

मुआवजा एक ऐसा शब्द है जो लालच, ईर्ष्या और हीनता के भावों से जुड़ा है. 2002 में गुजरात के हजारों मुसलमान अलग-अलग जगह राहत शिविरों में रह रहे थे. उस वक्त बड़ोदा में एक भले डॉक्टर ने मुझे विश्वास दिलाया कि ये सभी मुसलमान अपनी मर्जी से इन शिविरों में हैं, क्योंकि इनमें उन्हें मुफ्त पांच किलो चीनी मिलती है और सउदी अरब का पैसा भी! गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा और उत्तर प्रदेश, हर जगह सुनने को मिला कि मुआवजे के लोभ में मुसलमानों ने अपने घर खुद  जला दिए हैं. इसे लेकर हिन्दुओं में काफी नाराजगी थी कि सरकार मुसलमानों को पैसे दे रही थी.

उत्तर प्रदेश में सरकार ने एक नई चीज़ की. विस्थापित परिवारों को इस शर्त पर मुआवजा दिया गया कि वे अपने मूल निवास स्थल में लौटने का इरादा न रखें. इसकी उस वक्त बहुत आलोचना हुई. लेकिन शायद यह इसलिए किया गया हो कि हिंदुओं को इसकी तसल्ली हो जाए कि मुसलमान दोहरे फायदे में नहीं, यानी उनका पुरानी जगह तो है ही, नई संपत्ति के लिए सरकारी इमदाद भी मिल गई!

घर वापसी शब्द पिछले सालों में बहुत लोकप्रिय हो गया है. लेकिन जो उसका अभियान चलाते हैं, वे इन मुसलमानों की घर-वापसी के लिए कुछ करते हों, इसका कोई सबूत नहीं.

घर वापसी के पहले घर के बने रहने या पड़ोस बनाए रखने के उपाय किए जा सकते हैं. क्या यह हिंसा के बीच करना मुमकिन है? एक उदाहरण अकसर गाँधी के प्रयासों का दिया जाता है. कलकत्ता, नोआखाली या दिल्ली, साम्प्रदायिक हिंसा की आग के बीच गाँधी हिन्दुओं और मुसलमानों को अपना पड़ोस बनाए रखने के लिए समझाने-बुझाने में लगे हुए थे. वे भी उस वक्त पूरी तरह कामयाब नहीं हुए थे. बाद में तो उनकी जिद भी छोड़ दी गई. जब भारत का उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन भारत नामक राज्य में बदल गया तो हिन्दुओं या मुसलमानों के बीच तनाव या हिंसा के अवसरों पर उसने मध्यस्थ की भूमिका निभाना छोड़ दिया. वह प्रशासन या पुलिस की शक्ल में ही ऐसे मौकों पर प्रकट या अदृश्य बना रहा.

हिंसा के बीच राजनेता शायद ही लोगों के बीच जाने की हिम्मत रखते हों. जो सक्रिय रहते हैं, वे प्रायः हिंसा भड़काने के लिए. यह भी कहा जाता है कि मुसलमान वापस लौटना ही नहीं चाहते. जो नहीं बताया जाता, वह यह है कि लौटने की शर्तें इतनी अपमानजनक होती हैं कि उन्हें मानने के बाद अपनी निगाह में इंसान की गैरत के साथ खड़े रहना संभव नहीं होता.

लौटने के लिए लौटा लाने की इच्छा का दीखना ज़रूरी है. इसका नकलीपन और उसके पीछे का धोखा पिछले दिनों हरियाणा के अटाली में हिंसा के शिकार मुसलमानों की ‘सफल वापसी’ में देखा गया. आगजनी और हिंसा के बाद बगल के थाने में पनाह लिए मुसलमान हिंदू गाँव वालों और पुलिस के कहने या दबाव डालने पर लौटे तो पाया कि वे एक तरह से अपने ही गाँव में कैदी हो कर रह गए हैं. उनसे मिलने जुलने वालों पर गाँव की और पुलिस की निगाह भी थी और वे शक के दायरे में घेर दिए गए थे. साफ़ था कि उन्हें उनके घर वापस लाने में नेकनीयती न थी.

कहा जा सकता है कि आज़ादी के बाद  सैंकड़ों ऐसे मौके आए जब पड़ोस बचाए जा सकते थे. लेकिन उसके लिए भारी परिश्रम करने की ज़रूरत थी. और इस यकीन की भी कि एकरूप पड़ोस भारत के सपने के साकार होने के रास्ते में बाधा हैं.

जबरन हिजरत के बाद अजनबी जगह पर आबाद होना, वह हममजहब समुदाय के बीच ही क्यों न हो हमेशा के लिए त्रासदायक अनुभब है. इस बात को कश्मीर के पंडित भी अच्छी तरह पहचानते हैं.उन्हें वापस उनके इलाकों में आबाद करना अब धीरे-धीरे नामुमकिन हो गया है. इसमें भारतीय राज्य की भी दिलचस्पी नहीं. फिर जो कश्मीरियत की बात करते हैं उन्हें भी अपने नारे के खोखलेपन का अंदाज है.

तो वह भारतीयता हो या कश्मीरियत, वह अगर पड़ोसियत की नीयत से खाली है तो उसका साकार और सार्थक होना संभव नहीं. आज़ादी के सप्ताह में अपना घर का बसना भारत में अपनाइयत के बढ़ने का सबूत है या घटने की एक और गवाही?

 

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