‘रोहित वेमुला को क्रूर कायरता ने मारा’

रोहित वेमुला ने आत्महत्या के पहले लिखे अपने पत्र में अपने निर्णय के लिए किसी को दोषी नहीं ठहराया है.एक खालीपन उन्हें महसूस हुआ,एक व्यर्थता,यह कि जैसे उनका दुनिया से रिश्ता टूट गया है,कि दुनिया उनकी उस बेचैनी को समझ नहीं पा रही जो उनमें खुद को एक बड़ी पहचान में तब्दील करने की है.वे इल्हते हैं कि इस फैसले के लिए सिर्फ वही जिम्मेदार हैं.

हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति ने इसपर गहरी हैरानी जताई है. उन्हें समझ नहीं आ रहा कि रोहित ने इतना अतिवादी कदम क्यों उठाया. उनके इस निर्दोष आश्चर्य में कोइ अपराध बोध नहीं! उन्हें यह अब तक नहीं लग सका है कि इस मौत में हो सकता है उनकी जिम्मेदारी हो.

अठाईस साल के शोधार्थी रोहित पिछले कई दिनों से खुले आसमान के नीचे सो रहे थे क्योंकि हैदराबाद विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने उन्हें उनके चार और साथियों के साथ हॉस्टल से निकाल दिया था,उनका प्रवेश विश्वविद्यालय के हर सार्वजनिक स्थल में प्रतिबंधित कर दिया था. यह सब उन पाँचों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक सदस्य द्वारा लगाए गए आरोप के चलते किया गया था कि इन्होने उसपर शारीरिक हमला करके उसे ज़ख़्मी किया. विश्वविद्यालय की पहली जांच में यह आरोप बेबुनियाद पाया गया. यह नोट किया गया कि जिसने आरोप लगाया है,उसपर हमले का कोई सबूत नहीं, ज़ख्म का निशान नहीं, इसलिए आरोप साबित नहीं होता. लेकिन जिस कुलपति के कार्यकाल में रोहित और उनेक साथियों को आरोपमुक्त किया गया, उनके जाने और नए कुलपति के आने के बाद बिना कोई नई वजह बताए, बिना किसी नई जांच के इस फैसले को उलट दिया गया और रोहित और उनके मित्रों के लिए हॉस्टल और अन्य सार्वजनिक जगहें प्रतिबंधित कर दी गईं.

आखिर रोहित का अपराध क्या था? वे अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के सदस्य थे. इसने पिछले दिनों विश्वविद्यालय में मोंतेज फिल्म सोसाइटी द्वारा मुज़फ्फरनगर बाकी है नामक फिल्म के प्रदर्शन के दौरान उस पर एक राष्ट्रवादी छात्र संगठन के हमले के विरोध में एक जुलूस निकाला था. उसके पहले इस संगठन ने याकूब मेमन की फाँसी का भी विरोध सार्वजनिक रूप से किया था. इस कारण इस संगठन को राष्ट्रविरोधी ठहराया जा रहा था.

फिर उनपर यह आरोप लगाया गया कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के एक सदस्य सुशील कुमार को उन्होंने तीस और साथियों के साथ मिलकर पीटा जिससे वे घायल हुए. इसकी जांच में इस आरोप को पुष्ट नहीं किया जा सका. लेकिन अंतिम रिपोर्ट में रोहित और चार मित्रों को हमले के लिए जवाबदेह ठहराते हुए दण्डित करने का निर्णय किया गया. जब कुलपति के सामने जाँच और निर्णय के इस अंतर्विरोध को उजागर किया गया तो उन्होंने इनके सजा को निरस्त कर दिया.

फिर कुलपति का कार्यकाल समाप्त हुआ और नए कुलपति आ गए. इस बीच भारतीय जनता पार्टी के नेता और केंद्रीय सरकार में श्रम और रोज़गार मंत्रालय में राज्य मंत्री ने श्रीमती स्मृति ईरानी को एक खत लिखा जिसमें एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में राष्ट्रविरोधी गतिविशियों पर चिंता जाहिर करते हुए उनसे हस्तक्षेप की माँग की गई. एक स्थानीय नेता ने भी अपनी शिकायत दर्ज कराई. और नए कुलपति के नेतृत्व में विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने रोहित और पांच छात्रों को दण्डित करने का निर्णय लिया.

यह क्या इत्तफाक भर है कि ये पाँचों दलित हैं? क्या यह भी इत्तफाक है कि इनके जिस काम के लिए इन्हें राष्ट्रविरोधी ठहराया गया,वह दलितों के मुद्दे को लेकर न था बल्कि मुसलमानों के अधिकार से जुड़ा था?

क्या इसमें कोई शक है कि रोहित की मौत के लिए वह नहीं,बल्कि हमारी, यानी अकादमिक समुदाय की क्रूर कायरता जिम्मेदार है? क्या यह कायरता नहीं थी जिसने हैदराबाद विश्वविद्यालय के नए कुलपति और उनकी कार्यपरिषद को ‘राष्ट्रवादी’ दबाव के आगे घुटने टेकने को मजबूर किया? क्या यह कायरता न थी कि अपनी शांति के लिए उन्होंने पाँच सबसे कमजोर तबके के नौजवानों के सामाजिक बहिष्कार जैसा निर्णय किया?

रोहित वेमुला खुद को मात्र दलित मानने से इनकार करते हैं. वे विज्ञान-लेखक बनना चाहते थे.उन्हें पहले से दी हुई पहचानों के कैद में घुटन होती थी. वे सितारों के बीच गर्दिश करना चाहते थे. सितारों की सैर पर जाना चाहते थे.

रोहित गलत जगह पर थे. विश्वविद्यालय अब उनके तरह के ख्यालों की उड़ान भरने वालों के लिए मुनासिब जगह नहीं. अब यह अपने करियर के हिफाजत करते हुए,अपनी सहूलियतों को वेतन आयोगों के जरिए बढ़वाते हुए सुरक्षित जीवन जीने वालों की पनाहगाह है. यह अपनी भाषा, जाति, धर्म के पिंजरे में सुरक्षित रहने वालों की शरणस्थली है.

रोहित इंसानों को बतौर ज़िंदा और आज़ाद दिमाग देखे और कबूल किए जाने के हक में थे. लेकिन वे भूल गए कि विश्वविद्यालय अब खुद को दिमागों के उपवन के तौर पर नहीं देखते.वे राष्ट्रवाद और बाज़ार के हुक्मी बन्दों की परवरिश की जगहें हैं.

यह कतई मुमकिन है कि रोहित के इस अंतिम पत्र को वकीलों के द्वारा इस्तेमाल किया जाए:उन सबको बचाने के लिए जो उन हालात के लिए जवाबदेह हैं जिन्होंने रोहित को अकेलेपन और खालीपन के अहसास से भर दिया. यह भी मुमकिन है कि उनके इस पत्र को कोई राष्ट्रवादी नेता या मंत्री पेश करे यह बताने को कि ‘हमारे दलितों’ का दिल कितना बड़ा और उदार है कि बावजूद जिल्लत के वे किसी के प्रति कटुता नहीं रखते, और उन्हें शर्मिन्दा करने के लिए जो ऐसी हर घटना के लिए किसी असहिष्णुता को जिम्मेदार ठहराते हैं. यह बताने को कि कैसे अपनी मौत के लम्हे में भी रोहित ने देश की लाज रख ली, किसी पर आरोप नहीं लगाया.

रोहित ने अपील की है कि उसकी मौत का सामना शान्ति और धीरज से किया जाए. आंसू नहीं बहने चाहिए. वे बहें,न बहें,हम अपनी निगाहों को धुंधला नहीं होने दे सकते: वे वजहें साफ़ हैं जो रोहित को खुदकुशी की और ले गईं. वह राष्ट्रवादी दहशत के आगे शिक्षित समुदाय का आत्मसमर्पण है.

 

  • बी.बी.सी., जनवरी, 2016

http://www.bbc.com/hindi/india/2016/01/160118_rohit_vemula_apoorvanand_rd

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