भीष्म साहनी को पढ़ने से लोग डरते क्यों हैं?

यह विडंबना ही है कि सरकारी तौर पर भीष्म साहनी की जन्म शती की शुरुआत ऐसे राजनीतिक दल के नेता ने की जिसने कभी भीष्मजी के उपन्यास ‘तमस’ पर बने टेलीविज़न सीरियल पर पाबंदी लगाने को लेकर पूरे देश में हिंसक आन्दोलन किया था.नहीं मालूम कि जो मंत्री महोदय भीष्म साहनी पर बोलने आए थे,उन्होंने उनकी एक पंक्ति पढ़ने का कष्ट भी उठाया हो. क्योंकि भीष्मजी को पढ़ने के बाद आप पहले के मुकाबले अधिक मानवीय न हो जाएँ,यह असंभव है.यह संभव नहीं कि आप एक ही साथ भीष्म साहनी को महान मानें और मुस्लिम-घृणा की राजनीति भी करें.

कुछ लोग इसी डर से नहीं पढ़ते:कि कहीं उनके भीतर की इंसानियत उनकी सोई पड़ी आत्मा को कुरेदने न लगे. खबर पढी कि पिछले दिनों शासक दल के प्रमुख को किसी ने एक पुस्तक के लोकार्पण पर बुला लिया.उन्होंने सार्वजनिक तौर पर इन न्योते पर हैरानी जताई: पुस्तक से जुड़े कार्यक्रम में एक ऐसे सीधे-सादे आदमी को क्यों बुला लिया जिस बेचारे का पुस्तकों से दूर-दूर से कोई लेना-देना नहीं है! इतनी ईमानदारी और गर्व से बहुत कम लोग किताबों से अपने परहेज का इकबाल करते हैं. और सीधे-सादेपन की परिभाषा भी रुचिकर है: किताबों से दूर रहिए.

होते तो भीष्मजी आज सौ पार कर गए होते. हालाँकि अपने जन्म दिन को लेकर वे इतने निश्चित नहीं थे. अपनी आत्मकथा के आखिरी अध्याय में अपने माँ के समय बोध के बारे में बात करते हुए वे लिखते हैं:

जब मैं कहता:

“माँ, मैं अगस्त के महीने में तो पैदा नहीं हुआ था.पिताजी ने मेरी जन्म तिथि अगस्त में कैसे लिखवा दी?’ तो माँ सर झटककर कहती:

“यह वह जाने या तुम जानो .मैं तो इतना जानती हूँ कि तुम बलराज से एक महीना कम दो साल छोटे हो .अब हिसाब लगा लो.”

भीष्म साहनी लिखते हैं कि उनकी माँ की समय की गति उनके प्रिय जनों के कार्यकलाप के साथ जुड़कर चलती थी.वे मार्क्सवादी थे लेकिन माँ के इस गैर-मार्क्सवादी समय-बोध से उन्हें कोई उलझन न थी, न शर्मिंदगी.

कहा जाता है कि किसी आदमी को जानना हो तो उसकी आत्मकथा पढ़ लो या यह देखो कि वह अपनी ज़िंदगी के बारे में बात कैसे करता है.कलाकार अमृता शेरगिल ने जवाहरलाल नेहरू से कहा था कि दो तरह के लोग होते हैं, एक जो समंदर के अपने तजुर्बे के बारे में कहते हैं कि जब समंदर ने मुझे देखा और दूसरे वे,जो कहते हैं कि जब मैंने समन्दर को देखा. अमृता कहती हैं कि पहली किस्म के लोगों से उन्हें चिढ़ है, नेहरू को उन्होंने दूसरी किस्म का इंसान माना और इसलिए उनकी आत्म कथा पढ़ने की ख्वाहिश जाहिर की.

भीष्म साहनी की आत्म कथा में वे तो हैं ही, लेकिन इतने संकोच के साथ मानो कह रहे हों कि इस मनमोहक संसार में आकर मैं धन्य हूँ. उनेक एक-एक शब्द से ज़िंदगी और ज़िंदगी में आए लोगों के प्रति उनकी अहसानमंदी टपकती रहती है.

भीष्म साहनी हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े अभिनेताओं में से एक, बलराज साहनी के छोटे भाई थे. लेखक के तौर पर मशहूर हो जाने के बाद भी वे बलराज की चर्चा करते समय मानो उनके छोटे भाई ही बने रहते हैं. एक दिलचस्प प्रसंग उनके नाटक ‘हानूश’ के लिखे जाने का है, जो हिंदी के सबसे कामयाब नाटकों में एक है. भीष्म साहनी इस नाटक के लिखने के पहले तक हिंदी के बड़े कथाकारों में शुमार किए जाने लगे थे. फिर भी नाटक लिखकर वे भागे-भागे गए बड़े भाई बलराज के पास उनकी मंजूरी के लिए. और बलराज ने नाटक को पास नहीं किया.बेचारे भीष्म ने कोई बहस न की, उदास लौट आए. कुछ वक्त बाद नाटक पर मेहनत करके फिर से बड़े भाई की स्वीकृति  के लिए उनके पास जा पहुँचे . और इस बार भी बलराज ने सर हिला दिया,मानो कह रहे हों, यह काम तुम्हारे बस का नहीं. फिर छोटे भाई ने कोई तर्क न किया, बस अपना सा मुँह लेकर लौट आए. लेकिन वे थे तो आखिर लेखक.नाटक उनके ह्रदय की गहराई से निकला था. तिबारा उसपर काम करके करके वे गए बड़े निर्देशक इब्राहीम अल्काजी के पास जिन्होंने कई दिनों तक नाटक अपने पास रखा और बिना देखे वापस कर दिया. बाद में जब राजिंदर नाथ ने उसे खेला तो वह इतना कामयाब हुआ कि नाटक करने वालों ने उसे हाथों हाथ लिया.लेकिन भीष्मजी ने अपने पहले नाटक के प्रति बलराज या अल्काजी के व्यवहार का जिक्र बिना कड़वाहट के किया है,बिना किसी शिकायत के, बल्कि पूरा मज़ा लेते हुए ही वे इस प्रसंग को याद करते हैं.

सादगी,सचाई,दर्दमंदी और इंसानदोस्ती और खुशमिजाजी :भीष्म साहनी की शख्सियत को ये शब्द सबसे अच्छे  ढंग से परिभाषित करते हैं.एक और शब्द है,लगभगपन.भीष्मजी किसी पर अंतिम तौर पर टिप्पणी करने से बचना चाहते हैं.उनकी रचनाओं में एक तरह की हिचक देखी जाती है,किसी व्यक्ति-पात्र पर फैसला देने को लेकर.और कला का काम भी तो यही है,साहित्य जिसका अंग है:फैसला देने से पहले समझो. इंसानों को,उनकी ज़िंदगी को. उनके सोचने व काम करने के तरीके को समझने की जद्दोजहद में कलाकार की जीत ही हो, ज़रूरी नहीं.लेकिन अगर उसने सहानुभूति के साथ किसी एक मन की गहराई में भी डुबकी लगा ली तो अपना धर्म निभा लिया.कलाकार का सबसे पवित्र घाट आखिर इंसान का मन ही तो  है.

यह विनम्रता भीष्मजी में कहाँ से आई होगी? उन्होंने ऐसे दौर में होश सम्भाला था जब गाँधी का तूफ़ान पुरानी सामाजिक और राजनीतिक मान्यताओं की जड़ें हिला चुका है.साधारण औरतें और मर्द सड़कों पर निकल आए थे और दुनिया की सबसे ताकतवर हुकूमत को उन्होंने चुनौती दी थी. लेकिन साथ ही,भीष्मजी ने आज़ादी के साथ बँटवारे के वक्त की भयानक क्रूरता भी देखी थी. इस क्रूरता के बीच से इंसानियत के वापस अपने पाँवों पर खड़े हो पाने की कल्पना दिवास्वप्न जैसी ही थी. लेकिन ज़िंदगी लौट आई, भारत नाम का राष्ट्र-राज्य वजूद में आया और उसने नागरिकता का आधार बनाया बराबरी को. तादाद में ज़्यादा होने की वजह से हिंदू इस मुल्क के मालिक नहीं. इस बात को मानना और फिर इस पर अमल करना कोई मामूली बात न थी.और यह सिर्फ देश के नेताओं की वजह से नहीं हुआ, साधारण हिंदू जनता ने इस सिद्धांत को माना और हृदयंगम भी किया.

भयंकर से भयंकर परिस्थिति के बीच से ज़िंदगी की वापसी के चमत्कार को भीष्म साहनी अपनी रचनाओं में अलग-अलग तरीके से लिखते रहे. सब कुछ के बावजूद ज़िंदगी जिए जाने लायक है,आखिरी दम तक और दिलचस्पी के साथ: यही सन्देश उनके एक-एक हरफ से निकलता है.अपनी आत्म कथा का अंत वे यों करते हैं:

क्या खोया, क्या पाया , इसका भी लेखा-जोखा करता रहूँगा, अपने भाग्य को सराहता-कोसता भी रहूँगा, साथियों-सहकर्मियों के साथ उलझता भी रहूँगा, ताकि किसी तरह ज़िंदगी के अखाड़े में बना रहूँ. ऐसा ही मन करता है.

भौतिक शरीर उनका नहीं है,उनकी प्यारी, निहत्था कर देने वाली मुस्कराहट भी तस्वीरों में ही है लेकिन रचनाकार की असली देह तो उसकी रचना है. भीष्म साहनी की रचनाएँ ज़िंदगी के अखाड़े के बीचो-बीच बनी हुई हैं,उनका दम भी उखड़ा नहीं,बना हुआ है.

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s