प्रो बंदूकवाला इंसाफ को नहीं भूले हैं

“मैं माफ़ करता हूँ, मैं उम्मीद करता हूँ”, इस शीर्षकवाले  प्रोफेसर  जे.एन. बंदूकवाला के एक लेख पर जो कुछ  रोज़ पहले इंडियन एक्सप्रेस में छपा, बहस चल रही है. यह लख असम और अन्य  राज्यों के चुनाव नतीजो के बाद लिखा गया है. असम  में भारतीय जनता पार्टी की बड़ी जीत और अन्य स्थानों पर उसके प्रभाव विस्तार को ध्यान में रखते हुए बदूकवाला साहब ने लिखा है कि अब जब यह तय  हो गया है कि भारतीय जनता पार्टी और उसके पितृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय राजनीतिक और सामाजिक स्वीकृति है तो भारत के मुसलमान और संघ, दोनों एक दूसरे से दूर रहकर या एक दूसरे से नफरत करते हुए नहीं रह सकते.यह मशविरा उन्होंने दोनों को ही दिया है.

बंदूकवाला के इस सुझाव पर बहस चल पड़ी है. कुछ लोग उने नाराज़ हैं कि वे संघ को स्वीकार्य बनाने की जुगत लगा रहे हैं.कुछ लोग उन्हें भले दिल का एक भोला इंसान कह रहे हैं जो राजनीतिके कठोर यथार्थ को न जानता हा, और जानने पर भी कबूल नहीं करना चाहता.

बंदूकवाला कोई अपरिचित नाम नहीं हैं.वे महाराज सयाजी राव यूनिवर्सिटी, बड़ोदा में  भौतिक शास्त्र पढ़ाते है. अमरीका से डॉक्टरेट की उपाधि लेने के बाद वे अपने मुल्क भारत लौटे क्योंकि वे उन पढ़े लिखे लोगों की जामत में शामिल नहीं होना चाहते थे जो बेहतर सुविधाओं के लिए अपने वतन को छोड़ दें और जिनकी मेधा का लाभ उनके देश वासियों को न मिल पाए.

बंदूकवाला लेकिन वजह से नहीं जाने जाते.बड़ोदा में बनाया उनका घर  तीन-तीन बार बर्बाद हुआ. वे हर बार मुस्लिम विरोधी हिंसा के शिकार हुए. बंदूकवाला मुसलमान हैं. चूँकि भारत में हर मुसलमान एक ही माना जाता है, कहना ज़रूरी है कि वे दाऊदी बोहरा समुदाय के है, जिसने उन्हें सलमान रश्दी पर हमले का विरोध करने के चलते बहिष्कृत कर दिया था. उनकी बेटी ने एक हिन्दू से शादी की है.

बंदूकवाला इस तरह एक ऐसे मुसलमान हैं, जैसा बनने की सलाह भारत के मुसलमानों को हर कोई  देता ही रहता है. वे आधुनिक हैं, दाढी नहीं रखते , उन्हें देखकर आप उन्हें मुसलमान नहीं कह सकते. फिर भी जब मुस्लिम विरोधी हिंसा हुई तो उसें उन्हें भी   निशाना बनाया.उनका पढ़ा-लिखा होना, आधुनिक उदार विचारों का होना उनका सुरक्षा कवच न बन सका. गुजरात में ज़्यादातर शिक्षित मुसलमानों का अनुभव  उन्हीं की तरह का रहा है. वे न्यायाधीश ही क्यों न हों, जब ऊपर हमला हुआ तो उनकी उदारहृदय हिन्दू बिरादरी उनके लिए खड़ी नहीं हुई.

मुस्लिम विरोधी हिंसा, जिसे गुजरात में तूफ़ान कहा जाता है जिससे वह प्रायः कुदरती मालूम पड़ता है, इंसानी फैसले से ऊपर, कट्टर मुसलमान और उदार मुसलमान में भेद नहीं करती. इस के अलावा बदूकवाला उस घृणा को भी पहचानते हैं जो मुसलमानों के लिए भारत में पलती है. उन्हें अपने विश्वविद्यलाय में प्रोफ़ेसर नहीं होने दिया गया था.

इस तरह यह नहीं कहा जा सकता कि बंदूकवाला साहब को असलियत का पता नहीं. वे उस असलियत के निशाने पर हैं और उसे झेल रहे हैं. वे कोई डरपोक भी नहीं हैं.इसके लिए आप उनका 2004 के सितंबर में टाइम्स ऑफ़ इंडिया में उनके इंटरव्यू को पढ़ लें. वे बताते हैं कि उस साल सताईस मार्च को स्टार न्यूज़ पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री से बात की जा रही थी, चैनेल वाले आदत के मुताबिक एक मुसलमान खोज रहे थे जो मुख्यमंत्री एक सवाल कर सके. दहशत का आलम यह था कि अहमदाबाद में एक भी मुसलमान न मिला. तब बड़ोदा में इन्हें खोजा गया, उस दिन किसी काम से वे मुंबई गए हुए थे. चैनेल वाले इतने बेचैन थे कि इन्हें वहां जा पकड़ा. बदूकवाला ने मुख्यमंत्री से एक ही सवाल किया ,’आपने कुछ बाकी रखा है?” मुख्यमंत्री इस सवाल पर बिफर पड़े और बदूकवाला पर हमला करते हुए कहा कि वे मुंबई क्यों भाग गए हैं और वहां बैठकर गुजरात के खिलाफ साजिश कर आरहे हैं और उसे बदनाम कर रहे हैं.

बदूकवाला ने 2012 में मेघनाद देसाई को एक पत्र लिखकर दुःख जाहिर किया कि वे गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री को भारत के भावी प्रधान मंत्री के रूप में देख आरहे हैं, इसलिए अब  वे उन्हें गुजरात में मुसलमानों के साथ जो कुछ भी हुआ, उसकी जिम्मेदारी से आज़ाद कर देना चाहते हैं.इस पत्र के अंत में लार्ड देसाई को कहा कि अब तक मैं आपको अपना हमदर्द मानता था, अब नहीं.

इसका अर्थ सिर्फ यह है कि बंदूकवाला किसी मुगालते में नहीं है.मुसलमानों के साथ भारत में जो कुछ हो रहा है, उसके लिए जिम्मेवार शक्तियों की पहचान उन्हें है. वे इन्साफ के ताकाजे को भी कम करके नहीं आँकते. वे किसी मिथ्या आत्मभर्त्सना के पक्ष में नहीं और न पीड़कों से दया के भिक्षुक हैं.

बंदूकवाला का हाल का लेख जितना मुसलमानों के बारे में है, उससे कहीं ज्यादा हिन्दुओं के बारे में है. वे देख रहे हैं कि हिन्दुओं में संघ के विचार की स्वीकार्यता बढ़ी है और इसे लेकर बहुत परेशानी नहीं है.फिर मुसलमान, जिन्हें इस अवस्था में जीवित रहना है, क्या करें!

बंदूकवाला इसके पहले के एक लेख में कह चुके हैं की मुसलामानों को सत्ता के खेल से दूर रहना चाहिए और अपनी माली हालत बेहतर करने के उपाय करने चाहिए. इस ताजा लेख में भी वे मुसलमानों को आत्म निर्भर होने के लिए कह रहे हैं. इस्लाम में खैरात  और जकात जैसे जो प्रावधान हैं, उनके जरिए साधनहीन मुसलमानों की मदद के लिए भी वे अपील कर रहे हैं.इस लेख में भारतीय राज्य से किसी भी प्रकार की सहानुभूति की कोई अपेक्षा नहीं.संघ से अपनी वितृष्णा पर विजय पाने के लिए जब वे मुसलमानों को कह रहे हैं,तो एक तरह से एक यथार्थवादी तरीका जीने का खोज रहे हैं एक ऐसी जगह जहाँ मुसलमानों केलिए किसी तरह की हमदर्दी नहीं.

कुछ लोगों ने इस लेख को ऐसे पढ़ा है, मानो बंदूकवाला इन्साफ की कीमत पर अमन की बात कर रहे हों. गहराई में देखें तो लगेगा, वे भारत में न्याय की असंभाव्यता की ओर इशारा कर रहे हैं. ऐसी जगह जहाँ न्याय संभव नहीं, आप कैसे जिएँ? जहाँ आपके लिए अपमान को छोड़ और कोई भाव आपके पड़ोसी के मन में न हो, आप अपनी मनुष्यता  कैसे बचा कर रखें!

जब एक पीड़ित न्याय की आशा छोड़ बैठे,तो वह उस टिप्पणी है या जो ताकतवर हैं,उनके प्रति निराशा है? बंदूकवाला ने अपने पहले  के एक लेख में कहा था कि 2002 में उनके घर पर हमला करने वालों का अगुआ उनके विश्वविद्यालय का एक अधिकारी था. उसपर कार्रवाई तो दूर, उससे कोई पूछताछ न हुई!

बंदूकवाला के इस लेख पर टिप्पणियों की बौछार है. उन्हें पढ़ने से मालूम होता है कि लेखक गलत नहीं. प्रायः उनका मजाक उड़ाया गया है, उनकी लानत मलामत की गई है, कहा गया है कि मुसलमानों को गिरेबान में झाँककर देखना चाहिए, कि आर एस एस तो सिर्फ राष्ट्रवादी संगठन है, मुस्लिमविरोधी घृणा का प्रचारक नहीं. इन टिप्पणियों की भीड़ में एकाध स्वर सहानुभूति के हैं: लेकिन उन्हें बाकी लोग नकली हिंदू, छिपे मुसलमान या गर्हित धर्मनिरपेक्षतावादी कहकर लांछित करने से नहीं चूके हैं!

सिर्फ इसी एक प्रसंग  से मालूम हो जाता है कि मुस्लिम विरोधी घृणा और हिंसा का स्रोत मुसलमान नहीं हैं, भारत में वह वही है जिसे हिंदू परिसर कहेंगे. हिंदुत्व का समर्थन हिंदू परिसर में है.इसीलिए, वह प्रोफ़ेसर बंदूकवाला के इस प्रस्ताव की उदासी से भी संवेदित नहीं हो सका. मुक्तिबोध ने आदमी की पहचान बाटते हुए लिखा था कि जो आदमी की पुकार सुनकर दौड़ पड़े, वह आदमी है. लेकिन जिसे यह पुकार सुनाई ही न दे?

 

  • सत्याग्रह, जून, 2016

http://satyagrah.scroll.in/article/100947/prof-js-bandukwala-justice-gujarat-opinion

 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s