सीपीएम की बंगाल इकाई

सी पी एम या भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) पिछले दिनों अपनी एक सदस्य की वजह से खबर में रही. अनुशासनहीनता के कारण जगमती सांगवान को पार्टी से निकालने का निर्णय किया गया,ऐसी सूचना उसके वक्तव्य में दी गई है. जगमती पार्टी की केन्द्रीय समिति की सदस्य थीं.

जगमती सांगवान को पार्टी से निकाला बाद में गया, केन्द्रीय समिति की बैठक के दौरान ही पहले वे बाहर निकल आई थीं और प्रेसवालों के सामने पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया था.लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी में ही नहीं,किसी भी पार्टी में शायद ही किसी सदस्य को खुद पार्टी से अलग होने का गौरव लेने दिया जाता रहा हो! यह फैसला पार्टी ही कर सकती है कि सदस्य का रिश्ता पार्टी से कैसा और कितना लंबा होगा.इसलिए कम से कम इस आधार पर सी पी एम की आलोचना करने के पहले पार्टियों के तंत्र की आलोचना करने की आवश्यकता होगी.

जगमती सी पी एम के अन्य केन्द्रीय समिति सदस्यों से अलग हैं.वे एक जुझारू नेता के तौर पर पार्टी से बाहर की दुनिया में भी जानी जाती हैं.हरियाणा के पुरुषसत्तात्मक समाज में सामाजिक मुद्दों पर निडरता से बोलने और लड़नेवाली नेता के रूप में उनकी पहचान है.पार्टी से इतर संगठनों के साथ मिलकर काम करने की उनकी क्षमता भी लोगों को प्रभावित करती रही है.वे पार्टी से जुड़े उसके स्त्री संगठन की राष्ट्रीय महासचिव भी हैं.

जगमती के पार्टी से निकाले जाने की खबर पर इसीलिए बाहरी दुनिया में काफी प्रतिक्रिया हुई. कई लोगों का कहना था कि उन्होंने पार्टी से अपना मतभेद अगर जगजाहिर किया तो मात्र इसी आधार पर उन्हें पार्टी से निकाल नहीं दिया जाना चाहिए.लेकिन कहा जा सकता है कि पार्टी के पास कोई विकल्प न था. क्या पार्टी से यह उम्मीद की जाती है कि वह उन्हें मनाती कि वे अपना निर्णय बदल दें? एक ख़याल यह है कि उन्होंने आवेश में आकर पार्टी छोड़ने की बात कही थी, थोड़ा वक्त गुजर जाने दिया जाता तो शायद वे अपना यह बयान वापस ले लेतीं. कुछ लोगों का कहना है कि जगमती ने किया तो गलत लेकिन वे इतनी कीमती हैं कि पार्टी को उन्हें गँवाना नहीं चाहिए था और हरचंद कोशिश उन्हें भीतर बनाए रखने की करनी चाहिए थी.लेकिन यह विचार किसी सिद्धांत की जगह जगमती के अपने महत्त्व पर जोर देता है और इसलिए बहुत उपयोगी नहीं है.पार्टी ने इसके पहले सोमनाथ चटर्जी जैसे नेता को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया था.पार्टी और व्यक्ति के रिश्ते पर जबतक गहराई से ठहर कर बात नहीं होगी तो हम जिसे महत्त्वपूर्ण मानेगे, उसके लिए तो बहस करेंगे लेकिन जो हमारी निगाह में उतना महत्त्वपूर्ण न होगा,उसकी ओर से शायद ही कुछ बोलेंगे.

जगमती को निकाले जाने को लेकर पार्टी के भीतर भी कुछ ईमानदार बेचैनी देखी गई.उसकी एक वजह यह है कि सिंगूर और नंदीग्राम काण्ड के बाद सी पी एम ने सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच अपनी साख खो दी थी और उस समय और उसके बाद जगमती जैसी कार्यकर्ताओं के कारण उसे वापस सार्वजनिक दुनिया में जगह बनाने में मदद मिली. जगमती या उन जैसी और नेताओं के रहने से पार्टी के प्रति व्यापक जगत में सहानुभूति रहती है,इसे नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता.लेकिन पुनः,ये सारी बातें उपयोगितावादी और वक्ती हैं,सदस्य और पार्टी के बीच के रिश्ते को लेकर किसी पुख्ता समझ पर आधारित नहीं.

पार्टी खुद यह आकलन तो करती ही रहती है कि किसे बनाए रखने से उसे लाभ होगा और इस कारण उसकी बहुत सी उन बातों को वह बर्दाश्त करती है.केरल के बुजुर्ग नेता अच्युतानंदन को जो छूट हासिल है, वह बाकी पार्टी सदस्यों को कभी नहीं मिलेगी. इसका कारण बहुत साफ़ है. पार्टी जानती है कि उन्हें छूने के मायने हैं बड़े जनसमुदाय का समर्थन खो देना. इसलिए कड़वा घूँट पीकर भी उन्हें इज्जत देने की मजबूरी है.

जगमती के पार्टी से अलग होने की वजह पर अब तक हमने बात नहीं की है.वे नाराज इस वजह से थीं कि पार्टी की केन्द्रीय समिति ने बंगाल इकाई पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं की.समिति बंगाल के विधान सभा चुनाव के बाद पहली बार मिल रही थी. इस बार उसने वहाँ कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था.कहा गया कि यह पार्टी के राजनीतिक-रणनीतिक लाइन से विचलन था क्योंकि पार्टी कांग्रेस ने, जो पार्टी का सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय है,यह निर्णय किया था कि कांग्रेस पार्टी के साथ कोई गठजोड़ नहीं किया जाएगा.बंगाल पार्टी ने इससे अलग जाकर कांग्रेस से चुनावी समझौता किया, यह अनुशासनहीनता थी और इसकी कड़ी सजा बंगाल पार्टी को मिलनी चाहिए थी,यह जगमती का विचार है.

केंद्रीय समिति ने इस मामले पर जो राय जाहिर की, वह यह थी कि बंगाल इकाई का कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ना पार्टी-कांग्रेस की राजनीतिक लाइन के मेल में न था और इस विचलन को दुरुस्त किया जाना चाहिए. जगमती और कुछ और सदस्य, जो उनकी तरह मुखर नहीं हुए,जोर दे रहे थे कि प्रस्ताव में लिखा जाए कि बंगाल इकाई ने पार्टी-कांग्रेस के निर्णय का उल्लंघन किया. कुछ लोगों को यह जुबानी खेल या कलाबाजी मालूम हो,लेकिन मामला इतना आसान नहीं.अगर समिति इस नतीजे पर पहुँचती कि बंगाल इकाई ने पार्टी-कांग्रेस के मत का उल्लंघन किया है तो राज्य इकाई पर उसे कोई न कोई कार्रवाई करनी ही पड़ती.बंगाल इकाई की सार्वजनिक भर्त्सना सबसे कम कड़ी कार्रवाई होती.लेकिन ऐसा करने पर बंगाल में पार्टी नेतृत्व की साख जाती रहती. दूसरी ओर सिर्फ इतना कहने से कि उसने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का जो निर्णय किया, वह पार्टी की राजनीतिक लाइन से असंगत था, पार्टी इसे नर्म कर रही थी. एक स्तर पर वह अपनी एक राज्य इकाई के निर्णय पर टिप्पणी करके उसके केन्द्रीय नेतृत्व से अपेक्षाकृत स्वतंत्र अस्तित्व को भी स्वीकार कर रही थी.

जो भी कम्युनिस्ट पार्टियों के कामकाज को जानता है, उसके गले से यह बात शायद ही उतरे कि एक राज्य इकाई इतना बड़ा निर्णय बिना केंद्रीय समिति की सहमति के ले,भले ही वह लिखित न हो. अगर केंद्रीय नेतृत्व ने उस वक्त चुप रहना तय किया तो यह एक वक्ती हिकमत थी.पार्टी अनौपचारिक तरीके से बंगाल पार्टी को एक प्रयोग करने की छूट दे रही थी.यह एकदम अलग बात है कि इसके नतीजे में पार्टी को उम्मीद से उलटे बहुत कम सीटें मिलीं और कांग्रेस को फायदा हुआ. लेकिन दूसरे ढंग से यह भी कहा जा सकता है कि गठबंधन को लाभ हुआ.इसका श्रेय सी पी एम को भी मिलेगा.

यह भी न भूलना चाहिए कि बंगाल में पार्टी एक असाधारण स्थिति का सामना कर रही थी.तृणमूल कांग्रेस की हिंसा के आगे उसके अस्तित्व पर ही संकट आ खडा हुआ था. ऐसे में क्या संसदीय राजनीति में बिलकुल अकेले रहना लाभप्रद होता या कम से कम एक गैर वाम दल का समर्थन उसकी जन-स्वीकृति को बढ़ावा देता?

वाम दलों की, और खासकर सी पी एम का जनाधार क्यों कमजोर हुआ, इसपर अब तक पार्टी ने गंभीरता से विचार नहीं किया है. जब यह तर्क दिया जाता है कि कांग्रेस के साथ उसका दशकों का हिंसात्मक रिश्ता रहा है, तो क्या वह खुद को शिकार बता रही है या राजनीति में हिंसा मात्र के प्रयोग पर उसकी आपत्ति है? अब तक इस पार्टी ने अपनी हिंसा के लिए माफी नहीं माँगी है. अभी यह प्रश्न यहाँ विचारणीय नहीं है, इसलिए इसका उल्लेख बहर करके हम आगे बढ़ते हैं .

बंगाल पार्टी ने एक निर्णय लिया.उस समय केन्द्रीय समिति ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया. किसी ने पार्टी-कांग्रेस की राजनीतिक लाइन की बाकायदा याद न दिलाई. चुनाव में नाकामयाबी के बाद सिर्फ राज्य इकाई को इस निर्णय के लिए  ताड़ित करना कितना न्यायपूर्ण और नैतिक होता?

दूसरे, क्या जगमती पार्टी की राज्य इकाई को किसी तरह की आज़ादी नहीं देना चाहतीं? जिस जनतांत्रिक अधिकार का हवाला उनकी तरफ से, उनके विरोध के अधिकार का साथ देने के लिए दिया जा रहा है,खुद जगमती बंगाल पार्टी के साथ सख्ती की मांग करके उस अधिकार के खिलाफ जा खड़ी हुईं.

पूरे प्रसंग से साफ़ है कि जगमती सांगवान एक राज्य इकाई के जनतांत्रिक अधिकार का विरोध करने के अपने जनतांत्रिक अधिकार का प्रयोग कर रही थीं.इस समय उनका साथ देने का मतलब क्या बंगाल पार्टी के अधिकार के खिलाफ जाना नहीं?

कम्युनिस्ट पार्टियाँ इस समय गहरे संकट से गुजर रही हैं और उन्हें अपना अस्तित्व-तर्क खोजना है और जनता को उससे सहमत भी करना है.कांग्रेस पार्टी से समझौता करना न करना क्या अंतिम अस्तित्व-तर्क होगा या कोई और स्थायी आधार खोजा जाएगा? क्या कम्युनिस्ट पार्टी की सारी ऊर्जा सिर्फ चुनावी राजनीति में खर्च हो जाएगी?

यह अच्छा होगा कि पार्टी जगमती सांगवान को अपने स्त्री-मोर्चे की महासचिव बनी रहने दे.यह जनतांत्रिकता की ओर एक छोटा कदम होगा.लेकिन खुद जगमती सांगवान और उनके हमदर्दों को भी जनतांत्रिक राजनीति के बारे में और व्यापक ढंग से विचार करना होगा.

  • सत्याग्रह, जुलाई, 2016

http://satyagrah.scroll.in/article/101211/cpm-bengal-congress-tie-up-controversy-left-leadership

https://kafila.online/2016/07/02/

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