नागार्जुन

असल में-

हुआ है क्या, बतलाऊँ ?

आहिस्ते-आहिस्ते

तुमने इन्हें अपंग हो जाने दिया है-

शब्द,स्पर्श,गंध,रस,रूप

सारे के सारे छीज गए हैं लगभग

लानत है,तुम तो खुलकर हँस भी नहीं पाते !

प्रभावित नहीं होती

लाजवंती तुम्हारे छूने से

गंध-चेतना ठस है तुम्हारी

रसबोध पंगु है

श्रुति-कुहर हो गए रबर की तरह

अपने ‘स्व’ को सुला दिया है तुमने

ऐसे में क्या हो आप ?

झाग ही झाग तो हो !

 

शब्द,स्पर्श,गंध,रस,रूप की संवेदनाओं के मुरझाने का मतलब है ‘स्व’ की मृत्यु.मनुष्य का ‘स्व’ अगर कहीं निवास करता है तो उसकी इस चेतना में कि जो कुछ उसका प्रजातिगत है वह दरअसल उसका निजी दायित्व भी है.शब्द,स्पर्श,गंध,रस,रूप की संवेदना एक ओर प्राकृतिक है,यानी मनुष्य होने के साथ और उसके कारण यह हमें प्राप्त है लेकिन दूसरी ओर यह सांस्कृतिक भी है,अर्थात हर किसी में इन संवेदनाओं की संभावना तो होती है लेकिन यह आवश्यक नहीं कि वह इसके प्रति सचेत भी हो और उन्हें न सिर्फ जिलाए रखे बल्कि तीक्ष्णतर भी करे.व्यक्ति संवेदनशील है,यह कहने का क्या अर्थ है?किसके प्रति?

नागार्जुन की इस छोटी सी कविता में मनुष्य की प्राथमिक ऐंद्रिक संवेदनाओं के प्रति उसकी उपेक्षा के लिए उसकी भर्त्सना की जा रही है.इन प्राथमिक प्राकृतिक संवेदनाओं को लेकर वे सिर्फ एक ही जगह सचेत और चिंतित नज़र आ रहे हों,ऐसा नहीं.‘प्रतिबद्ध हूँ’ शीर्षक कविता में वे अपनी प्रतिबद्धता जिन वस्तुओं से व्यक्त और घोषित करते हैं,वे सामाजिक और राजनीतिक हैं लेकिन साथ ही कुछ और भी, या नागार्जुन की सामाजिकता अथवा उनकी राजनीति इनके बिना संभव नहीं है:

सम्बद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा सम्बद्ध हूँ.

रूप-रस-गंध और स्पर्श से, शब्द से…

फिर इनके माध्यम से बनी परिष्कृत संवेदनाओं की सूची:

नाद से, ध्वनि से, स्वर से, इंगिति-आकृति से…

उसके पहले की पंक्तियाँ हैं:

सम्बद्ध हूँ, जी हाँ, सम्बद्ध हूँ_

सचर-अचर सृष्टि से…

शीत से,ताप से,धूप से,ओस से,हिमपात से… 

नागार्जुन की एक बहुत सुन्दर या उससे भी उपयुक्त विशेषण उसके लिए ‘प्यारी’ है, कविता है‘बंधु डॉ. जगन्नाथन’.जयप्रकाश नारायण के नेतृत्ववाले इंदिरा विरोधी आन्दोलन में नागार्जुन को जेल हुई थी.उस दौरान उनकी मुलाकत  तमिलनाडु के आंदोलनकारी डॉक्टर जगन्नाथन से हुई जिन्हें गया और बकसर की केंद्रीय कारा से तमिलनाडु भेजने का निर्णय किया गया. डॉक्टर जगन्नाथन गया में अपनी पत्नी के साथ भूमिहीनों के संघर्ष में शामिल थे. नागार्जुन की यह कविता इसके आत्मीय स्वर के कारण तो पढ़ी ही जानी चाहिए जो कहीं से गलदश्रुपूर्ण नहीं है, इसमें ध्यान देने लायक अंश है वह जिसमें वे स्वयं तमिलनाडु आने की संभावना की बात करते हैं:

और अब मैं निकट भविष्य में ही

तमिलनाडु पहुँचूँगा

आपके साथ घूम-घूमकर देखूँगा उधर के ग्रामांचल

आपके साथ ही बैठकर

किसान परिवारों के बीच

ओत्तपम का नाश्ता करूँगा

काली कॉफ़ी के घूँट भरूँगा

चुस्कियां लूँगा नींबूवाली चाय की

बिना कत्थे के पान का बीड़ा मुँह के अंदर घुलता रहेगा

पान के उस पत्ते में गुलाबी चूना लगा होगा

कच्चे नारियल की बुकनी और

कच्ची सुपारी की छालिया

पान के उस बीड़े के अंदर ज़रूर होंगी

और तमिल के सौ शब्द तब

मेरी वाणी के अलंकार बन चुके होंगे

भाई जगन्नाथन, क्या वे सौ शब्द पर्याप्त न होंगे?

इस कविता के बारे में यह कहना कठिन है कि यह राजनीतिक नहीं है लेकिन यह है मुख्यतः मानवीयता को अर्जित करने के बारे में.इस कविता में वे भूमिसंघर्ष की बात नहीं कर रहे,न उस राजनीति की जो डॉक्टर जगन्नाथन को जेल ले आई है.वे सिर्फ एक दक्षिण भारतीय के बिलकुल भिन्न जलवायु में आने से हुई परेशानी पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं.उसमें भी एक विनोद का भाव है जो कविता को व्यर्थ की भावुकता से बचा लेता है. दक्षिण भारत जाकर , जोकि डॉक्टर जगन्नाथन की भूमि है, वे किसी राजनीतिक संघर्ष में शामिल हो जाएँ, इसकी जगह वे उस प्रदेश का पूरा स्वाद लेना चाहते हैं.यह कहिएं कि उस अपनी ऐंद्रिक चेतना का अंग बना लेना चाहते हैं. हालाँकि इस कविता की राजनीतिकता बहुत प्रच्छन्न भी नहीं.वे अपने प्रिय डॉक्टर से उनके प्रदेश में भूमिहीन किसानों के बीच मिलने का सकल्प व्यक्त करते हैं:लेकिन इतना ही.

ऐंद्रिकता की सजगता मनुष्यता की पहचान है.उसे निरंतर समृद्ध और परिष्कृत करते रहना मनुष्यता का कर्तव्य है.इसलिए तन को या उसकी कामनाओं को संयमित करके सिर्फ मन या मस्तिष्क की साधना कवि का काम्य नहीं.इंद्रियों के निषेध या उनके नियंत्रण को मनुष्यता की श्रेष्ठता की शर्त बना देने के कारण दैहिक आनंद को अपराध बना दिया गया था. देह को कुंठित किए बगैर क्या सामाजिक दायित्व नहीं निभाया जा सकता? और दैहिक संवेदनाओं का शमन करने की जगह उन्हें जाग्रत रखना क्या और क्यों आवश्यक है?

कार्ल मार्क्स मनुष्य को सिर्फ उपयोगिता के दायरे में सीमित कर देने को उसके प्रति अपराध मानते हैं. पूँजीवाद को अगर वे घातक मानते हैं तो इसलिए कि यह मनुष्यता के बहुलांश की ऐन्द्रिक क्षमताओं को इस तरह सीमित करता है कि वे मनुष्य मात्र बाहरी ढाँचे या रूप में ही रह जाते हैं और मनुष्यता का सत्व खो बैठते हैं.हमने नागार्जुन की जो कविता सबसे पहले उद्धृत की है उसमें कवि का क्षोभ अपने ‘स्व’ को सुला देने के कारण है और वह होता है अपनी रंग,गंध,स्वाद,स्पर्श,श्रवण से मिलकर बने समस्त संवेदन तंत्र के प्रति असावधान रहने के कारण या उनके साथ निरंतर काम न करने के कारण.तो स्वत्व सिर्फ विचार का मसला नहीं. यह नहीं कि आपके पास गाँधीवाद या मार्क्सवाद हो तो आप खुद को समृद्ध मानें.इसका अर्थ यह भी है कि व्यक्ति को सिर्फ अपने-आप में रहने की आदत भी डालने की ज़रूरत है.यह भी कि व्यक्ति का व्यक्ति से रिश्ता या प्रकृति से रिश्ता हमेशा सप्रयोजन या उपयोगितामूलक ही होना नहीं चाहिए.

प्रचलित धारणा के ठीक विपरीत नागार्जुन पर इसीलिए समाज या सामाजिक दायित्व हमेशा सवार नहीं रहता.अगर उनकी कविताओं का इस दृष्टि से वर्गीकरण किया जाए,तो अकेले नागार्जुन की वैसी कविताओं की संख्या,जिसमें सिर्फ वे और प्रकृति हैं,अच्छी-खासी संख्या में मिलेंगी.आप इस कविता को ही देखिए:

कैसा लगा

कैसा लगा

कैसा लगा कोहरा ?

बना गया है हमें

बना गया है तुम्हें

अपनी वहम का मोहरा!

     कैसा लगा

भाफ में नहाया भी

यों ही शरमाया भी

हुआ जाने दोहरा !

    कैसा लगा

पूस की ठिठुरन में

पूनम की छुवन में

अच्छा लगा कोहरा !

अच्छा लगा !!

इस कविता में ‘कैसा लगा’ की पुनरावृत्ति और अंत में इसका उत्तर सिर्फ ‘अच्छा लगा’ पर ध्यान जाना चाहिए.’अच्छा लगा’ एक निपट मानवीय प्रतिक्रिया है. यह भी कहा जा सकता है कि यह न्यूनतम भाषिक प्रतिक्रिया है और इसमें कोई  काव्यात्मकता नहीं है.नागार्जुन को इसकी चिंता नहीं. वे सिर्फ इस कोहरे देखने, महसूस करने का आनंद लेने का न्योता अपने पाठक को दे रहे हैं जो पूस की पूनम का है.और वे जो अपेक्षा कर रहे हैं, वह एक ‘मुद्राहीन’, ईमानदार प्रतिक्रिया की है.

हमेशा प्रतिक्रया की आवश्यकता भी नहीं. कई बार यह प्रतिक्रिया मानवीय भाषा या वाणी के बिना भी होती है .बेतवा-किनारे-1 और 2 में भी वे गुलाबी ठण्ड में बेतवा नदी के सौंदर्य का वर्णन भी कुछ इसी भाव का है:

सलोनी सर्दी का निखरा रूप

     बेतवा किनारे

रग-रग में धड़कन,वाणी है चूप

    बेतवा किनारे

यहाँ राग-राग तो धड़क रही है लेकिन वाणी चुप है.और इसकी अगली कड़ी में:

लहरों की थाप है

मन के मृदंग पर बेतवा-किनारे

मीतों में फुसफुस है

गीत के संग पर बेतवा-किनारे

क्या कहूं-क्या कहूं

पिकनिक के रंग पर बेतवा-किनारे

मालिश फिजूल है

पुलकित अंग-अंग पर बेतवा-किनारे

इस कड़ी में अवश्य आपको प्रकृति और संस्कृति आस-पास दीखती है,लहरों की थाप है,मन का मृदंग है, मीत और गीत है,लेकिन कवि जो कह रहा है,वह यह:क्या कहूँ-क्या कहूँ पिकनिक के रंग पर बेतवा-किनारे: इसमें आवश्यक नहीं कि भर्त्सना हो मानवीय हस्तक्षेप की लेकिन उसकी ज़रूरत नहीं है,यह इन पंक्तियों में कहा जा रहा है:पुलकित अंग-अंग पर मालिश फिजूल है. प्रकृति मनुष्यता के लिए सिर्फ पृष्ठभूमि नहीं है.

अंग लेकिन हर किसी का पुलकित हो सके,यह ज़रूरी नहीं. यह यत्न और निरंतर अभ्यास के रास्ते उसे जिलाए रखने का मामला है.सुबह-सुबह नामक कविता में इस अभ्यास का एक चित्र है:

सुबह-सुबह

तालाब के दो फेरे लगाए

सुबह-सुबह

रात्रि-शेष की भीगी दूबों पर

नंगे पाँव चहलकदमी कीसुबह-सुबह हाथ-पैर ठिठुरे, सुन्न हुए

माघ की कड़ी सर्दी के मारे

सुबह-सुबह

अधसूखी पतियों का कौड़ा तापा

आम के कच्चे पत्तों का

जलता,कडुआ-कसैला सौरभ लिया

सुबह-सुबह

गँवई अलाव के निकट

घेरे में बैठने-बतियाने का सुख लूटा

सुबह-सुबह

आंचलिक बोलियों का मिक्सचर

कानों की इन कटोरियों में भरकर लौटा

सुबह-सुबह.

इस छोटी-सी कविता में भी देह को सक्रिय करने का ही वर्णन है जो समाप्त होता है आंचलिक बोलियों का मिक्सचर कानों की कटोरियों में भरकर लौटने पर. एक और तरीके से पढ़ने पर यह एक कवि के दिनारंभ का भी वर्णन माना जा सकता है.

प्रकृति को प्राकृतिक रूप में उपलब्ध करना,उसे अपनी शक्ल में ढालने के लोभ का संवरण करना,अपने उपयोग या उपभोग की वस्तु न मनाकर उसकी स्वायत्त, स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार करना,यह आधुनिक युग की चुनौती है जो प्रकृति से ‘दर्शनीयता’ या ‘घटनात्मकता’ के बिना रिश्ता बनाने में अक्षम होता जा रहा है.प्रकृति की निरुद्धेश्यता या उसका होना भर काफी हो,यह समझने में आधुनिक मनुष्य को काफी समय लगा. मार्क्सवाद में भी वर्ग-संघर्ष के बाद मनुष्य और प्रकृति के बीच के संघर्ष की अवस्था की कल्पना में भी यही उपयोगितावादी नज़रिया काम करता रहा था.नागार्जुन की कविताओं में प्रकृति से रिश्ता मित्रता का है, या यारी का.

यह तुलना पूरी तरह ठीक नहीं लेकिन जवाहरलाल नेहरू के कारागार के दिनों में लिखे गए पत्रों में  प्रकृति,वनस्पति और जीव-जंतुओं का वर्णन काफी जगह घेरता है.नागार्जुन की जेल की अवधि की कविताओं में भी विषय हैं: मुर्गा, नेवला, गाय, इत्यादि. जेल की ही एक कविता में भी सिर्फ दिमागी खुराक से बेजारी जताई गई है:

जी हाँ,किलास भी चलते हैं

चैत की तिपहरिया में ये हमें बेहद खलते हैं

क्या करें मगर, सयाने तो अमूमन

हमेशा ही दिमागी खुराक पर पलते हैं

जभी तो हफ्ते में दो बार

सयानों के लेक्चर, यानी हमारे किलास चलते हैं

बाद में कथन-मथन में ताजगी के बहाने इस दिमागी कसरत का स्वागत किया गया है लेकिन उसके पहले जिस कुश्ती की मश्क का वर्णन है, उसके मज़े के आगे इसकी क्या बिसात!

जेल की ही एक और कविता में अखिलेश के भुट्टा उगाने और दूसरे तरुणों के नारा लगाने की तुलना है.

:सीके हुए दो भुट्टे सामने आ गए

तबीयत खिल गई

ताज़ा स्वाद मिला दूधिया दानों का

तबीयत खिल गई

……..

……..

अखिलेश ने अपनी मेहनत से

इन पौधों को उगाया था

वार्ड नंबर 10 के पीछे की क्यारियों में

वार्ड नंबर 10 के आगे की क्यारियों में

हममें से जो बातूनी और कल्पना-प्रवण हैं

वे भी अखिलेश की फलित मेधा का लोहा मानते हैं

पसीना-पसीना हो जाते हैं तरुण                           

लगाते-लगाते सम्पूर्ण क्रान्ति के नारे

फूल-फूल जाती है गरदन की नसें..

काश, वे भी जेल के पिछवाड़े क्यारियों में

कुछ न कुछ उपजा कर चले जाएँ

भले, दूसरे ही उनकी उपज के फल खाएँ

कविता में सूखे बौद्धिक या राजनीतिक ‘श्रम’ की निस्सारता पर फूल-फूल जाती हैं गर्दन की नसें में व्यंग्य और उससे भी पहले बड़े सादे तरीके से बातूनी और कल्पना प्रवण लोगों की व्यर्थ मेधा के सामने  अखिलेश की फलित मेधा को रखकर कवि ने अपना पक्ष स्पष्ट भी कर दिया है. खेती या बागवानी या हाथ से काम की एक मेधा है, यह गाँधी का तर्क था. वे साक्षरता आधारित शिक्षा के प्रति कोई बहुत उत्साहित न थे.

ज़मीन से कुछ उपजाना अवश्य प्रकृति का मानवीय उपयोग है लेकिन यह दोतरफा है जिसमें प्रकृति भी मनुष्य के साथ कुछ करती है,सिर्फ वही उसे नहीं बदलता है.आश्चर्य नहीं कि नेहरू को शहरी,शिक्षित अभिजात भद्रजन के मुकाबले किसानों की संगत अधिक भाती थी.उन्होंने लिखा है किसानों के ज़मीन से जुड़ाव के चलते उनमें एक प्रकार की प्रामाणिकता आ जाती है और जीवट और धीरज भी, जो उन्हें शहरी पढ़े-लिखों में नहीं मिलता.इसलिए कई बार शहरियों के संग उन्हें ऊब और झुंझलाहट होने लगती थी.

प्रकृति की अनेक हिंदी में लिखी गई हैं लेकिन कुदरत की संगत में इतना उछाह हिंदी कविता में दुर्लभ है. इन दो चित्रों को देखिए:

रंग-बिरंगी खिली-अधखिली

किसिम-किसिम की गंधों-स्वादोंवाली ये मंजरियाँ

तरुण आम की डाल-डाल टहनी-टहनी पर झूम रही हैं…

चूम रही हैं-

कुसुमाकर को ! ऋतुओं के राजाधिराज को !!

इनकी इठलाहट अर्पित है छुई-मुई की लोच-लाज को!!

इस पंक्तियों में सड़कछाप  किसिम-किसिम के ठीक पास संभ्रांत कुसुमाकर है जो कवि-धर्म के प्रति नागार्जुन की सजगता का प्रमाण है. दूसरा प्रमाण आगे मिलता है;

तरुण आम की ये मंजरियाँ…

उद्धित जग की ये किन्नरियाँ

अपने ही कोमल-कच्चे वृंतों की मनहर संधि-भंगिमा

अनुपल इनमें भरती जातीं

ललित लास्य की लोल लहरियाँ !!

कवि-धर्म है भाषा के प्रति संवेदना को सजग और उसे तीव्र करना.इस कविता को आप तेजी से पढ़कर निकल जा सकते हैं लेकिन आपकी गति को न सिर्फ उद्धित शब्द बाधित करता है( यह उद्धत नहीं है,अलग शब्द है और इसका अर्थ समझने के लिए आपको कोश की सहायता लेनी होगी) बल्कि आगे का लंबा वाक्य(उद्धित जग…. लहरियाँ)की  जो कविता के लघु आकार के लिहाज से गैरअनुपातिक लगता है, लेकिन नकारात्मक अर्थ में नहीं. कविता समाप्त इस दीर्घ वाक्य पर होती है जबकि पूरी कविता बहुत छोटे छोटे वाक्यों के सहारे चपल गति से चलती है जिसे यह वाक्य धीमा करता है. अंतिम पंक्ति पर भी गौर करें जिसमें ल की आवृत्ति है.आनुप्रासिकता के आनंद को नागार्जुन क्यों छोडें भला! कवि ठहरे आखिर!

इस लेख में उद्दृत नागार्जुन पहली कविता में जिस शब्द की संवेदना की संवेदना से वंचित मनुष्य को झाग ही झाग कहा गया है,वह चलताऊ या कामचलाऊ शब्द नहीं है. वह भी श्रम और अर्जन से ही उपलब्ध किया जा सकता है. दूसरे, उसके साथ जुड़ी है भाषा की भंगिमा, उसकी इंगिति.नागार्जुन का जो विस्मयपूर्ण सम्बन्ध प्रकृति के साथ है, वही भाषा के साथ भी. प्रकृति उन्हें आश्चर्यचकित करती है, वे उसके ‘दर्शक’मात्र नहीं हैं हैं और न ही ठंडे वर्णनकर्ता.वे जिसे उसके हर प्रसंग में भागीदार होते हैं और आनंद उठाते हैं,उसी तरह तरह भाषा का वे पूरा मज़ा लेते हैं.इस कविता को देखिए:

थम थम थम थम थाम!

छम छम छाम छाम छाम!

ये क्या हुआ है असमान को

ये क्या हुआ है चाँद के

    माखनी कमान को ?

फिफ फिप फिफ फीीीी

पु प् पु प् पु प् पू ू ू ू

ल  ल ल ल ल ला ा ा ा

 ये कौन लगा गया घुन

मे े े े  रे े े े मा न को?

यह शब्द-क्रीड़ा है या अक्षर-क्रीड़ा कह सकते हैं इसे.ऐसा नहीं कि इसमें अर्थ नहीं है लेकिन नागार्जुन इसमें ध्वनियों का पूरा आनंद ले रहे हैं.

शब्द-क्रीड़ा से गंभीर अर्थान्वेषियों को परहेज है लेकिन हर बड़ा कवि पहले शब्दों की दुनिया का बाशिंदा होता है. इसलिए उनसे उसका रिश्ता सिर्फ कामकाजी नहीं हो सकता. जैसे प्रकृति के साथ,वैसे ही शब्दों के साथ यों ही वक्त गुजारने की फुरसत जिस कवि के पास नहीं है वह और कुछ हो,पूरा कवि नहीं.यह ठीक वैसे ही है जैसे आपका सच्चा दोस्त वही है जो सिर्फ काम या किसी मतलब से,वह कितना ही बड़ा क्यों न हो,आपसे नहीं मिलता,यों ही,बिना काम भी आपके साथ वक्त जाया करता है.फिर से मार्क्स को याद करें जिन्होंने अपनी 1844 की पांडुलिपियों में एक ऐसे समय की कल्पना की है जब श्रमिक या मजदूर एक दूसरे से जब मिलेंगे तो सिर्फ यूनियन के काम से नहीं,सिर्फ अपनी मांगों को लेकर पर्चा लिखने और जुलूस निकालने या आंदोलन की योजना बनाने को नहीं,बल्कि यह मेलजोल बिना ऐसे किसी सांसारिक मकसद के भी हो सकेगा.उसी को वे सच्चा इंसानी मेल-जोल और सच्चा मानवीय समाज मानते हैं.

शब्दों के मज़े इस कविता में देखिए:

उनकी विष्ठा इनका चंदन

वह थू-थू इनका अभिनंदन

इनकी मालिश, उनकी मारें

वह धिक्कृति, इनकी मनुहारें

वह बंकिम भ्रू, इनका स्पंदन

उनकी विष्ठा इनका चंदन

नागार्जुन इसमें जो विरोधी युग्म बना रहे हैं, उनपर ध्यान दीजिए तो समझ में आता है कि पढ़ने में जो सुगमता है वह इन युग्मों को बनाने की मश्क को छिपा जाती है: मालिश-मारें, धिक्कृति-मनुहारें , बंकिम भ्रू-स्पंदन.

यह लघुकाय कविता (लुभा रही) नागार्जुन की बारीक निगाही का एक नमूना  है:

लुभा रही चेतन आँखों को

खेतों की हल्की हरियाली

मेड़ों की निर्दूब चंदनी उर-लकीर पर

संभल-संभल चलती घरवाली…

किसानों से, या ग्रामीण जीवन से प्रेम या चिंता मात्र वैचारिक स्तर पर और इसलिए सतही है या गहरी और आत्मीय,इसका पता इसी से चल सकता है कि गाँव या किसानी ज़िंदगी में कितनी दिलचस्पी है.क्या सिर्फ महत्त्वपूर्ण ब्योरे दर्ज करने में ही कवि की रुचि या वह उस ज़िंदगी में हिस्सा लेता है? यही बात कुदरत के साथ उसके रिश्ते या भाषा के साथ उसकी परस्परता के सन्दर्भ में कही जा सकती है.

एक और कविता जान भर रहे हैं जंगल में जुगनुओं पर है:

गीली भादों,

रैन अमावस…

कैसे ये नीलम उजास के

अच्छत छींट रहे जंगल में

कितना अद्भुत योगदान है

इनका भी वर्षा-मंगल में

लगता है ये ही जीतेंगे

शक्ति-प्रदर्शन के दंगल में

…….

जुगनू हैं ये स्वय्म्प्रकाशी

पल-पल भास्वर पल-पल नाशी

…..

इनकी विजय सुनिश्चित ही है

तिमिर तीर्थवाले दंगल में

अजी, यही तो ज्योति-कीट हैं

जान भर रहे हैं जंगल में

इन नन्हीं-सी कविता में जुगनू के लिए दो शब्द नागार्जुन ने गढ़े: ज्योति-कीट और स्वयं प्रकाशी. यह भी कवि का काम है:नए शब्द गढ़ना, शब्दों और भाषा की नई भंगिमाएं प्रस्तुत करना. बल्कि हम कह सकते हैं कि यही कवि का काम है. नागार्जुन के काव्य-संसार में इस तरह के नए,नागार्जुनी शब्दों और मुद्राओं की भरमार है.वे पहले के शब्दों से और अंदाज से काम नहीं चला लेते.

कामचलाऊपन से नागार्जुन को चिढ़ है और वे औसत ज़िंदगी से घबराते हैं. इनसे बचने का एक ही तरीका है:किसी प्रकार की सुरक्षा के कवच से आजादी.औघड़ मलंग शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ   जीवन या कविता के बारे में उनका नज़रिया जानने को काफी हैं:

श्लील-अश्लील के खयालों को

परे झटक दे बरखुरदार

जभी तो होगा तू

औघड़

जभी तो होगा मलंग

दर्म्यानी दर्जे का फक्कड़

कभी औघड़ नहीं होगा

भाँड़ भले हो जाए.

नागार्जुन औघड़ थे पूरे के पूरे, आधुनिक हिंदी कविता के अकेले औघड़.

 

  • पुस्तक वार्ता, जनवरी, 2016

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

  

 

 

 

 

 

 

 

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