मुस्लिम विरोधी घृणा का भावोन्माद

भारतीय जनता पार्टी वरुण गाँधी के बहाने यह पता करने की कोशिश कर रही है कि हिन्दुओं को गोलबंद करने के लिए मुस्लिम विरोधी घृणा अभी भी कितनी कारगर रह गई है.इसीलिए उसने वरुण गाँधी की गिरफ्तारी के समय तय करके एक हिंसक भीड को इकट्ठा किया.बाद में मेनका गाँधी ने जिस तरह एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी का नाम लेते हुए उसे पच्चीस लोगों को घायल करने का दोषी  बताया, उससे साफ है कि वरुण गाँधी ने जो कुछ भी कहा बताते हैं, वह कोई भावनाओं का वक्ती  उबाल न था. मेनका गाँधी, जो मनुष्येतर प्राणियों के लिए करुणा की खान हैं, टेलिविज़न पर चोट खाई मुद्रा में यह कह रही थीं कि वे किसी कोण से साम्प्रदायिक नहीं हो सकतीं. फिर भोलेपन से उन्होंने पत्रकार से पूछा कि, बताइए, वरुण ने तो वही कहा न जो हम सब अपने दिलों में जानते हैं कि सच है! फिर इतना हंगामा क्यों!

मेनका ठीक कह रही थीं, वरुण ने जो कहा उसे न जाने कितनी बार हम, जोकि मुसलमान नहीं हैं, सड़क पर, अपने घरों में, सुन चुके हैं और वे भी जो मुसलमान हैं जानते हैं कि उनका अपमान करने के लिए इन विशेषणों का बिना किसी दोष भावना के इस्तेमाल किया जाता रहा है. यह नफरत की सबसे सीधी अभिव्यक्ति थी. भारतीय जनता पार्टी ने इस नफरत को अत्यंत परिष्कृत ढंग से व्यक्त करने के तरीके इजाद कर लिए हैं, उन्हें संसदीय लोकतंत्र में रहने की मजबूरी जो है!

जिस नेता ने इसका सबसे अधिक सूक्ष्मता से प्रयोग किया, वह भारतीय मध्य वर्ग का प्यारा अटल बिहारी था.जब वरुण गाँधी के भाषण का विश्लेषण करने की कवायद चल रही थी, उस समय एक बार फिर मैं यू ट्यूब पर अभी भी सुरक्षित पांच दिसंबर, 1992 को लखनऊ में दिए गए अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण को देख रहा था.उस भाषण के आधार पर आप अटलजी पर बाबरी मसजिद के ध्वंस की साजिश का पता होने का मुकदमा नहीं चला सकते, लेकिन उसे देखते हुए आपके सामने यह एकदम साफ हो जाएगा कि इस व्यक्ति को मालूम है कि कल क्या होने जा रहा है. अटलजी बडी ही हास्यपूर्ण मुद्रा में बाबरी मस्जिद को गिराने को रवाना होने वालों को कह रहे हैं कि कल कारसेवा करके उच्च न्यायालय की भावना का पालन किया जाएगा और यह कारसेवा खाली हाथ नहीं की जा सकती, वहां नुकीले पत्थर हैं, जमीन को समतल करना होगा, वह क्या खाली हाथ किया जा सकता है! इस पर श्रोताओं में हंसी की लहर दौड जाती है.भीड को पता है कि उनका नेता उनसे क्या कह रहा है. आखिर एक ‘कवि’ से आप व्यंजनात्मक अभिव्यक्ति की ही तो उम्मीद करते हैं! फिर वे कहते हैं कि मैं अयोध्या जाना चाहता था, लेकिन मुझे दिल्ली जाने को कहा गया है. मैं अनुशासित कार्यकर्ता हूं, क्या करूं , लेकिन मुझे पता है कि कल क्या होने वाला है !

टोयोटा गाड़ी को राम रथ का भेस देकर पूरे देश में बाबरी मस्जिद को गिराने का जो अभियान चला, उसमें भी लालकृष्ण आडवानी के भाषणों में सीधे-सीधे मस्जिद गिराने को कहा गया हो, याद नहीं आता.लेकिन, क्या यह नारा आप भूल सकते हैं, मंदिर वहीं बनायेंगे! और इस नारे के साथ क्या आपको युद्ध के लिए सन्नद्ध  लालकृष्ण आडवानी का कठोर संकल्पयुक्त  गम्भीर मुखमंडल याद नहीं! सन्देश बिल्कुल साफ था: बिना मस्जिद गिराए मंदिर वहीं नहीं बन सकता था! लेकिन पहले अटल बिहारी वाजपेयी, और बाद में लालकृष्ण आडवानी भी यह कहने को आज़ाद हैं कि उन्हें तो सपने में भी गुमान न था कि एक लंबे अभियान से, सुनिश्चित सन्देश के साथ जो भीड़ फैजाबाद लाई गई थी, वह  इतनी भावोन्मत्त हो उठेगी कि हमारे लाख मना करने पर भी हाथों से उस “ ढांचे” को गिरा डालेगी. फिर आंसू भरे नेत्रों से कहा जाता है कि यह था दुखद , लेकिन क्या आप इस भावना की कद्र नहीं करेंगे!

फैजाबाद में छह दिसंबर , 1992 की उस भावोन्माद के सम्मान में रातो रात बनाए गए “रामलला’के मंदिर को प्रायः स्थायी  कर दिया गया है, बाबरी मस्जिद का मलबा भी बिखरा पड़ा है, जिससे आप भारतीय धर्मनिरपेक्षता की असली हालत का अनुमान कर सकें!

अटल बिहारी और लाल कृष्ण की चतुराई पीलीभीत में फिर अपनाई गई, जब राहुल गाँधी की गिरफ्तारी के समय कमल छाप वाले झंडे नहीं दिखाई दिए, भगवा झंडों के साथ एक और भावोन्मत्त भीड आई. आखिर उसका प्रिय हृदय सम्राट वह सब खुले आम कह देने के लिए सजा पाने जा रहा था जो उन सबके  दिल की बात है, जैसा बाद में वरुण की मां ने कहा. क्या आप इस भीड की उत्तेजना के लिए भी भरतीय जनता पार्टी को दोष देंगे!

वरुण ने अपने भाषण के पक्ष में कहा कि आखिर मैं ऐसे महौल में बोल रहा था, जहां हिन्दू दबा हुआ महसूस कर रहे थे और मुझे उनमें ‘हिम्मत’भरनी थी. कई हिन्दू लड़कियों का बलात्कार किया गया था. वहां क्या मैं एक नरम भाषण देता! उनका इशारा बहुत साफ था, हिन्दू लडकियों का बलात्कार भला हिन्दू करेंगे! उनके इस बयान के अगले ही दिन इंडियन एक्सप्रेस ने बहुत साफ साफ नाम के साथ यह रिपोर्ट छापी कि कई नहीं, तीन बलात्कारों की सूचना थी और सबमें जो अपराधी नामजद थे, वे हिन्दू ही थे. वरुण एक बहुत ही आजमाई हुई तकनीक का इस्तेमाल कर रहे थे. 2002 के गुजरात के मुसलमानों के कत्लेआम के पहले गुजराती अखबारों में खबर छपी कि हिन्दू औरतों के क्षत-विक्षत शरीर पाए गए हैं. ऐसी सारी खबरें गलत पाई गईं, लेकिन किसी ने इसके लिए माफी नहीं मांगी.

शोमा चौधरी ने वरुण से बात करके लिखा कि वे कहते हैं कि उनका बस चले तो वे जो कुछ भी हुआ, उसे अनकिया कर दें. लेकिन पिछ्ले दो दिन की घटनाओं से यह एकदम साफ हो गया है कि वे अब उसका श्रेय लेना चाहते हैं, जो उन्हीं के मुताबिक उन्होंने नहीं किया. इसमें करुणामयी माता भी शामिल हो गई हैं. और जो घृणा का कभी न सूखने वाला स्रोत है, यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, तो  उसके उत्साह का तो कहना ही क्या!

विलंबित, जनसत्ता, मार्च, 2009

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s