बहादुर खान मोरे शुक्र शुक्र…

 

(करीब से, मंच और फिल्मों से जुड़ी यादें, लेखिका:जोहरा सहगल,अनुवाद: दीपा पाठक, राजकमल प्रकाशन,प्रथम संस्करण:2013, मूल्य:495 रुपए)

यह इत्तफाक था कि ज़ोहरा सहगल की अंत्येष्टि से लौटते वक्त साहित्य अकादेमी में रणजीत साहाजी  से मिलने रुक गया. किताबों का लुभावना जमघट साहाजी ने लगा रखा था. फिर उदार साहाजी ने ख़ास किताबों के जखीरे का ताला खोला. वहाँ ज़ोहरा सहगल  एक मुखपृष्ठ पर मुस्करा रही थीं. मैंने हलके हाथों किताब उठाई : ‘करीब से’, ज़ोहरा सहगल की आत्मकथा.

अभी कुछ देर पहले उन्हें आग के सुपुर्द करके ही आए थे. राम नाम के जाप के बीच हाँडी फोड़ी गई थी, मुखाग्नि दी गई थी. राम नाम के नारे का उत्साहपूर्ण उत्तर न मिलने पर ब्राह्मण सबको उसके महत्त्व की याद दिला कर सबको उसका नारा लगाने को प्रेरित कर रहा था : अंत में इन्सान को नहीं उसी को रह जाना है. फिर उसके अलावा और किसका सहारा है? लोदी रोड के श्मशान घाट पर बिजली का शव दाह गृह है, लेकिन उस दिन वह काम नहीं कर रहा था. सो, लकड़ियों का सहारा लिया गया. जब मुखाग्नि दे दी गई, लपटें उठने लगीं और ज़ोहरा सहगल का पार्थिव शरीर उनमें गुम हो गया तो हम लौट आए.

लौट कर जब आत्मकथा पढ़ना शुरू किया तो भूमिका में ही ज़ोहरा सहगल कहती मिलीं, “अपनी वसीयत में मैंने लिखा है कि जब मैं मरूं तो मैं नहीं चाहती कि किसी तरह का धार्मिक या कला से जुड़ा कार्यक्रम हो. अगर शवगृह के लोग मेरी राख रखने से मना करें तो मेरे बच्चे उसे घर लाकर टॉयलेट में बहा दें. …इससे ज़्यादा घिनौना कुछ नहीं हो सकता कि किसी मरे हुए आदमी का कोई हिस्सा किसी जार में रख कर सजाया गया हो. अगर ज़िंदगी के बाद कुछ नहीं है तो फिर किसी चीज़ की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन अगर उसके बाद कुछ है तो…मेरी तथाकथित आत्मा जन्नत में घूमेगी. मैं अपने प्यारे कामेश्वर, अपने बहुत बूढ़े हो चुके अब्बाजान और अपने गुरुओं, जिन्हें मैं बहुत चाहती हूँ, दादा और पापाजी से मिलूँगी.”

अपनी राख को टॉयलेट में बहा देने की क्रूर निर्ममता रखने वाली ज़ोहरा सहगल तो जो कुछ भी हो रहा था श्मशान घाट पर, उसे शायद एक तमाशे की तरह देखतीं, ठहाके लगातीं या फिर ऐसा करने वालों की अक्ल पर तरस खाती हुई उनकी लानत-मलामत करतीं. लेकिन क्या यह प्रसंग इतना महत्वपूर्ण है कि इस पर इतनी लंबी बात की जाए? ज़ोहरा सहगल जैसी औरत के जीवन पर सोचते हुए इसे नज़रअंदाज करना मुमकिन नहीं. यह दरअसल एक औरत के अपने बारे में फैसला करने के अधिकार का मसला है.

एक औरत, जिसकी तारीफ इस वजह से की जाती रही कि भारत की आधुनिकता के शुरुआती लम्हों में उसने औरताना गुणों का लबादा उतार फेंका, कब-कब अपने-आप और अपने शरीर पर हक रखती है और कब वह सामाजिक संपत्ति हो जाती है? क्या वे विद्रोही थीं जिन्हें उनके जीते जी समाज और धर्म काबू नहीं कर सका तो उनके मरने के बाद इन्हें अपने आवरण में ले ही लिया? तो क्या व्यक्ति का अपना निर्णय कभी सम्मानित नहीं किया जाएगा? वह समाज का पुर्जा बने रहने को अभिशप्त है?

यह विडम्बना है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्न का अंतिम समाधान उसकी मृत्यु के बाद होता है. जब वह नज़रों से ओझल हो जाता है और कुछ करने-न-करने की सीमा से परे हो जाता है तो समाज उस  पर आक्रमण करता है. व्यक्ति के जीवन या मृत्यु में समाज का यह अतिक्रमण क्यों बर्दाश्त किया जाए? यह सवाल किसी ने नहीं किया है. व्यक्ति पर अक्सर आरोप लगाया गया है कि वह सामाजिक परम्पराओं का सम्मान नहीं करता. यह आरोप प्रायः नास्तिकों पर या भारत में धर्मनिरपेक्षतावादियों पर लगाया जाता रहा है. उसके साथ ही यह भी दिलचस्प है कि मार्क्सवादियों ने भी व्यक्ति को पाबन्द किया है समाज के नाम पर और इसके लिए उदारपंथियों ने मार्क्सवाद की आलोचना की है. लेकिन वे व्यक्ति को अपने कब्जे में लेने के धर्माधारित या जाति आधारित परंपरावादी दावे की उसी तरह आलोचना नहीं करते, बल्कि दूसरों को इसका सम्मान करने की सलाह देते हैं.

श्मशान घाट पर और ज़ोहरा सहगल की आत्मकथा पढ़ते हुए एक और बात की ओर ध्यान गया. वह है शरीर का महत्त्व. किसी लेखक या गायक के मुकाबले एक नर्तक या रंग-अभिनेता सारा सृजन अपने शरीर के माध्यम से और उसी में करता है. ऐसा नहीं कि लेखक का काम शारीरिक नहीं, लेकिन वह किताब की शक्ल में स्थायी रह पाता है. नृत्य या नाटक एक प्रकार से क्षणजीवी कलाएं हैं. वे दुहराए जाने पर भी दूसरे क्षण वही नहीं रहतीं. इस तरह नाटक के अभिनेता या नर्तक के काम को देखते हुए देह की केन्द्रीयता पर ध्यान जाता है. और इस पर कि हुनर या कला, वह नर्तक की हो या डॉक्टर की या एक कारीगर की, कितनी अस्थानांतरणीय है! देह की केंद्रीयता  किसी नर्तक या अभिनेता के जीवन के लिए कोई आश्चर्यजनक बात नहीं. लेकिन उस देह को गढ़ने के लिए गहन और दीर्घ अभ्यास की आवश्यकता होती है. क्या प्रत्येक देह सांस्कृतिक देह बन सकती है? हम जब नर्तकों, गायकों या अभिनेताओं को देखते या सुनते हैं तो उनका अधूरापन या उनके निर्माण की प्रक्रिया हमारे सामने नहीं होती. ज़ोहरा सहगल की इस आत्मकथा में तरह-तरह की व्याधियों के दौरान पृथ्वीराज कपूर के पत्रों को पढ़ने से पता चलता है कि एक अभिनेता के अपनी देह को बनाने और उसे वापस हासिल करने का संघर्ष कितना यातनापूर्ण होता है, “…हमारा काम तो उम्र भर का रियाज़ माँगता है. उम्र की मश्क और हज़ार उम्रों का वक्त और फुर्सतें और बेपनाह तन्हाइयां. मुझे ही देख लीजिए, जुहू के झोंपड़े में बिलकुल अकेला रहता हूँ. सितार बजाता हूँ… बाजे पर रियाज करता हूँ. आईने के सामने अपने आप को मुँह चिढ़ाता हूँ.”

एक दूसरे खत में, जो मार्च 1970 में लिखा जा रहा है, याद रखिए, पृथ्वीराज कपूर काफी पहले  पृथ्वीराज हो चुके हैं, वे लिखते हैं, “बंगलौर इस खुशी में जा रहा हूँ कि वहाँ ‘साक्षात्कार’ एक कन्नड़ फिल्म में काम रहा हूँ. और इसके लिए कन्नड़ भाषा ज़ोर-शोर से सीखी जा रही है. उस्तादों में और इजाफा हो रहा है.

इस उम्र में नई-नई भाषा, नई-नई बातें सीखने का लुत्फ़ तो बेहद आता है. बचपन लौटकर आ जाता है. अपने आप पर हँसी भी आती है, साथ ही सब अकड़-बल भी निकल जाते हैं. लेकिन एक फ़ायदा बेपनाह हो रहा है, नई-नई भाषाओं के ‘क,ख,ग,घ’, ‘अलिफ़,बे,पे,ते’ लिखने बैठता हूँ तो सब चिंताएं भाग जाती हैं. एक बाल गोपाल सा बन जाता हूँ. कुछ देर के लिए जी चाहता है सब कपड़े उतार कर मिट्टी में लथपथ होकर खेलने लगूं. आईने में अपनी सूरत देखकर मुँह चिढाने को जी चाहता है और माथे की शिकनें, सिलवटें सब साफ हो जाती हैं. मैं, मैं, मैं, मुझे, मुझे, मुझे, मेरा, मेरा, मेरा, मेरा ये अहसासात थोड़ी देर के लिए भाग जाते हैं, ये क्या कम है.”

पृथ्वीराज कपूर के पत्रों में पहले पत्र में जो 1960 की मई में लिखा गया था, वे ज़ोहरा सहगल को थिएटर के बंद होने की खबर अपने ही अंदाज में देते हैं, “हाँ न जाने क्यों ये सूचना अभी कुछ दिन और आपको नहीं देना चाहता था कि theatre बंद हो रहा है – हमेशा के लिए तो ज़ात ख़ुदा की ही रहती है. जनाबे हश्र ने भी लिखा है. दुनिया फानी है. हर शय यहाँ की आनी जानी है लेकिन जाहेरा नज़र आते हुए भी ख़याल न था कि इतनी जल्दी theatre बंद कर देना होगा. मुझे अपनी ढिठाई पर नाज़ था पर अब वो ढिठाई भी ढीठ हो गई.”

इसी पत्र में पृथ्वीराज अपनी आवाज़ के साथ अपने संघर्ष का बिना आत्मदया के वर्णन करते हैं,

“श्रीरामपुर का दौरा इसीलिए तय किया था कि आवाज़ को देखूँ कहाँ तक खींच पाता हूँ …6 अप्रैल को यहाँ से निकले, उससे पहले 3 अप्रैल को मुगलेआज़म का डबिंग किया कोई चार घंटे भर – वहाँ भी तो बड़ी बकट (विकट?) आवाज़ इस्तेमाल करता हूँ, गले ने साथ दिया और वो काम खातिरख्वा हो गया. 7 को श्रीरामपुर पहुँचे. ये अहमदनगर से कोई चालीस मील पर है और उधर साईंबाबा की शिरडी से 20 मील. पहले दिन किसान खेला. आवाज़ ने आख़िर तक साथ दिया, दूसरे दिन मौन साधे पड़ा रहा. रात को ‘आहुति’ खेला, आवाज़ ने साथ दिया, शो भी खूब जमा. तीसरे दिन ‘पैसा’ था. आख़िरी एक्ट तक आवाज़ साथ रही और आख़िरी ऐक्ट में तो ये जान पड़ता था कि थैली में हो जैसे जिधर चाहे घुमा आऊँ.”

पृथ्वीराज सिनेमा के दर्शकों के लिए अपनी बुलंद आवाज़ के लिए जाने जाते हैं, बल्कि उनकी बुलंद शख्सियत की बुनियाद उनकी आवाज़ की पुख्तगी ही मानी गई है. इस पत्र में इस आवाज़ से साथ उनकी जद्दोजहद का वर्णन, जिसमें वे आखिर हार जाते हैं काफी मार्मिक है, “चौथा खेल … ‘पठान’… proverbial last straw साबित हुआ. गले के सब कंगूरे ढह गए. आख़िरी ऐक्ट में तमाम पंजर बोल रहा था – यूँ लगता था पसलियाँ फेंफड़ों में धँस जाएँगी. आवाज़ जो मिकल रही थी काम के लिए निहायत मौज़ू थी जैसे किसी पहाड़ी दर्रे में से शां-शां करती हुई तेज़ हवा चल रही हो. देखनेवालों ने तारीफ़ की लेकिन साथियों का बुरा हाल था – सबके चेहरों पर पीलाहट पुत गई थी इस खौफ़ से कि कहीं मैं वहीं collapse न कर जाऊं.”

कला शारीरिक श्रम है. शरीर के सारे अंगों का अलग-अलग दुरुस्त रहना और एक दूसरे की संगति में भी रहना आवश्यक है. जिस तरह सितार का एक तार भी अधिक कस जाए या उतर जाए तो संगीत का आनंद जाता रहता है.

पृथ्वीराज कपूर के खतों को आत्मकथा का हिस्सा बनाना ज़ोहरा का दिलचस्प फैसला है, वैसे ही जैसे अपने मामा डॉक्टर साहेबजादा सैदुज्ज्फर खान को लिखे अपने पत्रों को शामिल करना. ये दोनों ही व्यक्ति ज़ोहरा सहगल की शख्सियत के निर्माण में काफी अहम हैं. और किताब की इस संरचना या स्थापत्य से आत्मकथा लिखने के उनके मकसद का कुछ अंदाज लगाया जा सकता है. इन पत्रों के साथ अगर उस डायरी को भी जोड़ लें जो ज़ोहरा ने 1962 की अपनी यूरोप यात्रा के दौरान लिखी थी, तो किताब शुरू से अंत तक एक आख्यान के रूप में लिखी जान नहीं पड़ती. किताब एक नाटक की तरह दृश्यों और अंकों में बंटी हुई है. प्रत्येक के केंद्र में ज़ोहरा नहीं हैं. एक में पृथ्वीराज और पृथ्वी थिएटर मुख्य भूमिका निभाते हैं तो दूसरे हिस्से में मुख्य पात्र उदय शंकर, उनकी नृत्य मंडली और फिर उनका  संस्थान है. ऐसे अवसरों पर इस किताब में ज़ोहरा बिकुल पर्दे में चली जाती हैं और इन शख्सियतों के किस्से लुत्फ़ लेकर और विस्तार से बताती हैं, बिना किसी असुरक्षा के.

यह एक औरत की आत्मकथा है, ऐसी औरत की जो तबीयत से सैलानी, दुस्साहसी और शौक व शिक्षा से नर्तकी और अभिनेत्री है. लेकिन यह हमेशा एक संघर्षरत शरीर की कथा नहीं है और न यह औरत के बनने की कथा है. ज़ोहरा अदाकारा थीं, इस लिहाज से कहा जा सकता है कि वे अपनी पूरी ज़िंदगी को अदायगी के तौर पर देख पा रही होंगी. ब्रेख्तियन सिद्धांत के मुताबिक़ शायद वे अपने पाठकों को खुद को दिखा रही हैं एक ऐसी शख्स के रूप में जो अपनी ज़िंदगी के, जो मुल्क और दुनिया के भूगोल और इतिहास में, अलग-अलग पड़ाव पर अलग-अलग फैसले लेती है. लेकिन यह कुल मिलाकर खुशी की खोज की कहानी है.

क्या ज़ोहरा सहगल हर जगह निर्णय खुद ले रही हैं? मसलन, अगर उनके अब्बा यह फैसला न करते कि उन्हें और उनकी बहनों को परिवार, देहरादून से बहुत दूर, लाहौर में क्वीन मैरी’ज में भेजा जाए, अलीगढ नहीं, जहाँ कुलीन परिवारों के लड़के-लड़कियाँ जाया करते थे, अगर उनकी माँ यह वसीयत न करतीं कि उनकी सारी दौलत उनकी बेटियों की पढ़ाई में लगा दी जाए, अगर उनके मामा उन्हें सड़क के रास्ते मोटरकार पर यूरोप चलने का न्योता न देते, जो उस वक्त बड़ी अनोखी बात थी, तो ज़ोहरा सहगल वह न होतीं जो इस किताब के जरिए अपनी ज़िंदगी  की यादों की साझेदारी हमसे करने को बैठी हैं.

ज़ोहरा सहगल की ज़िंदगी अगर उनका फैसला है तो दूसरों का भी. इसलिए ज़ोहरा के स्वर में सबके प्रति कृतज्ञता है, जिसने भी उनके जीवन को शक्ल देने में भूमिका निभाई.

ज़ोहरा सहगल एक नवाब खानदान की थीं और उनकी परवरिश शानो-शौकत से हुई. बाद में उन्होंने एक कामकाजी औरत की ज़िंदगी चुनी जिसने मामूली-से-मामूली काम बिना शिकायत के किया. लेकिन  उनकी ज़िंदगी बनना शुरू हुई सफ़र से. वह पहला सफ़र जो अपने डॉक्टर मामा के साथ दसवीं पास करने के फौरन बाद उन्होंने एक खुली कार में यूरोप के लिए किया और जिसके दौरान वे पेशावर, क्वेटा, बलूचिस्तान के खुश्क इलाके नौशकी, फारस, इराक, बेरुत, तेल अबीब, जेरूसलम और गाजा तक गईं. आज जब मैं उनके इस सफ़र को फिर से पढ़ता हूँ तो सोचता हूँ कि तेल अबीब और गाजा के बारे में अपनी ज़िंदगी के बाद के दिनों में ज़ोहरा क्या सोचती होंगी. वे उन दिनों वहाँ गई थीं जब गाजा दरअसल गाजावालों की जगह थी और वे वहाँ से बेदखल नहीं किए गए थे.

ज़ोहरा सहगल अभिनेत्री बनने के लिए प्रशिक्षण लेने के खयाल से यूरोप को निकली थीं लेकिन बीच में इत्तफाकन मामूजद भाई के उन्हें नाचते देख तारीफ करने के बाद नृत्य का प्रशिक्षण लेने का ख्याल आया और वे लन्दन की जगह जर्मनी पहुँच गईं. ज़िंदगी जितना सुचिंतित निर्णयों का परिणाम है उससे कहीं ज़्यादा संयोगों का नतीजा है.

ज़ोहरा सहगल उन औरतों में शुमार की जा सकती हैं जिनकी प्रकृति ही कॉस्मोपॉलिटन थी. यह भी खासी दिलचस्प बात है कि चाहे आनंदीबाई हों या रमा बाई, सबकी जीवन-दृष्टि में अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों का केन्द्रीय महत्त्व है. अगर हम इस्मत चुग्ताई, रशीद जहाँ के साथ अगर ज़ोहरा सहगल जैसी शख्सियतों की ज़िंदगी को देखें तो राष्ट्रवादी फ्रेम से बाहर निकल कर एक भारतीय आत्म की खोज और उसके गढ़ने का अलग आख्यान मिलता है. सूए यह फिक्र भी नहीं है कि वह भारतीय है या नहीं. ज़ोहरा सहगल बार-बार यूरोप लौटती हैं और इसके लिए माफी नहीं मांगती. ज़ोहरा सहगल का पूरा प्रशिक्षण पाश्चात्य सांगीतिक और कलात्मक भाषा में होता है. इसे लेकर भी  वे कभी अपराध बोध से ग्रस्त नहीं होतीं. उदय शंकर के साथ वे एक ऐसी नृत्य शैली का प्रशिक्षण लेती हैं जो पाश्चात्य और भारतीय कलानुभवों के सम्मिश्रण और समन्वय से रची गई थी. लोक और नागर के बीच के द्वंद्व या भारतीय की तलाश की बेचैनी यहाँ नहीं है.

आत्मकथा की जाँच कई बार इस तरह की जाती है कि वह अपने वक्त की कहानी कह रही है या नहीं. एक इन्सान के बनने की कथा अपने आप में दिलचस्प या महत्वपूर्ण हो सकती है या नहीं? क्या उसे हमेशा खुद को एक सामाजिक इकाई के रूप में वैध साबित करना ही होगा ? इसलिए ज़ोहरा सहगल की कहानी में एक औरत या एक मुसलमान औरत या पारंपरिक ढांचों से निकल कर नए पेशे चुनने वाली शिक्षित मुसलमान औरत जो खुद से आठ साल छोटे हिंदू से शादी का फैसला करके खुद को सहगल कहना तय करती है और अपने बच्चों को पवन और किरण नाम देती है या अपना ठिकाना खोजती कामकाजी औरत, सब उभरती हैं लेकिन वास्तव में यह अपनी ज़िंदगी में खुशी के सोते तलाशने की कहानी है.

ज़ोहरा सहगल की ज़िंदगी एक सदी की कहानी है, दो विश्वयुद्धों से बिंधी, हिंसा और नाइंसाफी के अहसास के साथ इन्सान के बहैसियत इंसान अपनी खुदमुख्तारी हासिल करने की जद्दोजहद की कहानी भी है. आप इसमें आज़ाद हिन्दुस्तान को बड़ा होते देख सकते हैं. इसका अर्थ यह नहीं कि यह इंसानी या समाजी क्षुद्रताओं को अनदेखा करती है. आदर्श व्यक्तित्व ज़ोहरा सहगल के लेकिन चार हैं और सभी पुरुष, लेकिन क्या वे पारंपरिक ‘पुरुषोचित’ गुणों के कारण?

कामेश्वर सहगल से अपने विवाह के किस्से में भी वे असाधाणता का पुट नहीं देतीं. उसी तरह उनकी मृत्यु के वर्णन में भी अतिरिक्त नाटकीयता का इस्तेमाल नहीं करतीं.

इस आत्मकथा या यादों की किताब पर आरोप लग सकता है कि इसमें ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य नदारद है. मसलन,न तो यहाँ भारत के स्वाधीनता संग्राम के प्रसंग हैं, न द्वितीय विश्वयुद्ध के. भारत-पाकिस्तान बँटवारे पर भी वे बहुत कुछ नहीं लिखतीं हालाँकि इसका सीधा असर उनके परिवार पर पड़ा है. लेकिन कुछ गौर से पढ़ें तो इस किताब में बीसवीं सदी की बेचैनियाँ पैबस्त मिलेंगी. उदाहरण के ली,यूरोप यात्रा की डायरी में जर्मनी के विभाजन के कारण अपनी नृत्य शिक्षक से न मिल पाने पर उनकी बेचैनी.

इसमें आप तरह-तरह की सामूहिकता के निर्माण की कहानियाँ भी पढ़ सकते हैं.उदय शंकर की नृत्य मंडली, इप्टा, पृथ्वी थिएटर की कहानियाँ इसी सामूहिकता की संवेदना की कहानियाँ हैं. दिलचस्प यह है कि आज़ादी के बाद इस तरह के किसे अनुभव से जोहरा सहगल के जुड़ने के किस्से नहीं मिलते. उसके बाद नए राज्य की संस्थाओं के बनने और उनकी पेचीदगियों से जोहरा सहगल का सामना होता है. पहले के अनुभवों में जहाँ वैयक्तिक सपर्श है और मित्रता है वहाँ इन राजकीय संस्थाओं में निर्वैयक्तिकता है.यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि चाहे उदय शंकर का समूह हो, या पृथ्वीराज का, या इप्टा, हमारे स्वाधीनता संग्राम के नेताओं ने बावजूद इनसे बहुत अच्छे रिश्तों के, इन पर कभी भी इस आन्दोलन का सांस्कृतिक प्रवक्ता होने के लिए  इन पर कोई दबाव नहीं डाला.यही दौर इब्राहिम अल्काजी, हबीब तनवीर,पुपुल जयकार जैसे व्यक्तियों के उभरने का भी है.मित्रताएँ क्यों इस दौर में जैसी बनीं , आज़ादी के बाद न बन सकीं, यह सवाल भी इस किताब को पढ़ते वक्त कौंधता है.

ज़ोहरा कहीं पछतावा करती, किसी और पर अपनी मुश्किलों के लिए दोष धरती नहीं दीखतीं. अगर उनका नजरिया या उनका ‘लिविंग प्रिंसिपल’ जानना हो तो पृथ्वी राज कपूर के पहले खत की शुरुआत को ही फिर से पढ़ लें,

अजीज़ी ज़ोहराजी,

“गो मैं रहा रहीनेकरम हाय रोज़गार

लेकिन तेरे ख़याल से ग़ाफ़िल नहीं रहा.

शायर ने तो सितम लिखा था, मैंने बदल कर करम कर दिया है. मैंने सितम को माना नहीं इसलिए मुझ पर जो कुछ भी हुआ है वो करम रहा है कुदरत का. …सो शिकवा नहीं शुक्र की जगह है, बहादुर ख़ान  मोरे शुक्र शुक्र….”

तो ज़ोहरा सहगल का हर लफ्ज़ यही कहता जान पड़ता है, बहादुर खान मोरे शुक्र शुक्र…

  • समकालीन साहित्य, 2014
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