चुनाव नजदीक आ रहे हैं

चुनाव नजदीक आ रहे हैं.गठबंधन बन और बिगड रहे हैं.भारतीय जनता पार्टी का साथ छोड कर जाने वालों की संख्या बढेगी, ऐसा अनुमान किया जा रहा है. क्या इसकी वजह सैद्धांतिक है? क्या वाकई बीजू जनता दल को भाजपा की संकीर्ण मुस्लिम और इसाई विरोधी विचारधारा से अरुचि हो  गयी है? इस तरह के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है क्योंकि आज के राजनीतिक परिवेश के लिए ऐसे प्रश्न प्रासंगिक ही नहीं माने जाते.साम्प्रदायिक तर्क को कितनी स्वीकृति मिल गई है, यह आप कांग्रेस के उस बयान से भी जान सकते हैं, जिसके जरिए उसने अकालियों को शिव सेना का उदाहरण दे कर यह कहा है कि अगर शिव सेना शरद पवार को प्रधान मंत्री बनाए जाने पर तैयार हो सकती है तो एक पंजाबी सिख मनमोहन सिंह के नाम पर वे  क्यों नहीं राजी हो सकते! कांग्रेस के प्रवक्ता ने सोचा होगा कि वे एक चतुर तर्क दे रहे हैं, लेकिन शायद वे भूल गए कि इस तर्क की परिणति असम में बिहारियों की हत्या और मुंबई में उनकी पिटाई में हुई थी. इस तर्क ने गुजरात में एक असाध्यप्राय सामाजिक बीमारी का रूप ले लियाहै जहां मुसलमानों के लिए इंसाफ की कोई भी मांग गैर-गुजरातियों की गुजरात विरोधी साजिश मानी जाती है.

व्यावहारिक राजनीति में विश्वास रखनेवालों के लिए यह समय वैचारिक मुद्दों पर बर्बाद करने का नहीं हैं. जमीनी, असली समीकरण देखे जाने हैं और उन्हें अपने अनुकूल किया जाना है. लेकिन ठीक यही वजह है कि बौद्धिक समुदाय अपने राजनीतिक कर्तव्य का निर्वाह करे और वैचारिक मुद्दों को जिंदा रखे. लोकतंत्र विचारों के इर्द-गिर्द बहुमत निर्माण करने में ही सार्थक हो सकता है, धर्म और जाति जैसी पहचान की पुरानी इकाइयों की जोड-तोड से उसे जीवंत रखना कठिन होगा. ऐसे में वह औपचारिक तौर पर तो जीवित रह सकता है, पर उसकी अंतर्वस्तु न तो नई होगी और न लोकतांत्रिक.

नकार से शुरू करना हमेशा नकारात्मक नहीं होता. इसलिए इस चुनाव में भी, पिछले चुनावों की तरह ही, यह कहना होगा कि कुछ ऐसी राजनीतिक शक्तियां हैं जिन्हें सत्ता देना देश और समाज के लिए प्राणांतक हो सकता है. उनमें सबसे पहला नाम भारतीय जनता पार्टी का है. इस दल को एक दिन के लिए भी सत्ता में रहने देना एक ऐसे कीटाणु को न्योता देना है जो आपके शारीरिक तंत्र में यों घुसकर बैठ जाता है और धीरे धीरे अपनी जगह बढाता जाता है कि कोई भी दवा और इलाज आपको उससे मुक्ति नहीं दिला सकता. गुजरात में फासिज्म का जो सामाजिक सौन्दर्यीकरण हुआ है और उसने इस तरह की सेक्स अपील हासिल कर ली है कि गुजरात के अधिकांश  हिन्दू पुरुष और स्त्री उसमें विलीन हो जाने में ही अपार सुख का अनुभव कर रहे हैं. यह आकर्षण सिर्फ गुजरात तक सीमित नहीं , यह तब पता लगा जब भारत के पूंजीपतियों ने हाथ जोड कर नरेन्द्र मोदी को देश की बागडोर हाथ में लेने की अपील की.

ओडीसा में अकेले सत्ता में न होने पर भी भारतीय जनता पार्टी ने समाज का जो विभाजन पिछ्ले पांच साल में कर दिया है, उसे पाटना अब एक असंभव काम लग रहा है. लोग हिंसा से एक समय के बाद थक जाते हैं, लेकिन उनकी तमाम प्रतिक्रियाएं उसी हिंसक विचार से परिचालित होती रहती हैं. इसलिए 1984,1992 या 2002 या ओडीसा का 2007-2008 हमेशा नहीं जारी रह्ता , पर वह विचार निरंतर सक्रिय रहता है जो इनकी आवृत्ति सम्भव करता है.

कर्नाटक भारतीय जनता पार्टी के लिए नई जगह है. पर वहां जो कुछ हो रहा है, उसे देखते हुए क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि कर्नाटक में भाजपा या आर.एस. एस. के विचार के लिए व्यापक स्वीकृति मौजूद है?बल्कि इस विचार की हिंसा ने कर्नाटक में वह रूप धारण किया है जो आज तक देश के दूसरे हिस्सों में देखने में नहीं आया था. सबसे ताजा उदाहरण मैंगलोर का है जहां एक सिनेमा हाल में एक साथ बैठे प्रेमी युगल के बारे में एक हिन्दू सांस्कृतिक दल को खबर दी गई कि वे अलग-अलग् सम्प्रदाय के है और उस दल का एक जत्था हाल के बाहर उन्हें सबक सिखाने को पहुंच गया. वह तो स्थानीय पुलिस की सतर्कता ठी कि यह जोडा बच गया.या शायद इसकी वजह यह रही हो कि अंत में यह मालूम पडा कि दोनों एक ही समुदाय के थे. कर्नाटक में विभिन्न समुदायों के लड्के-लडकियों के लिए साथ रहना घातक हो सकता है और उसमें हमेशा पुलिस वह भूमिका नहीं निभाती जो ऊपर बताए गए मामले में उसकी रही.

इससे ठीक पहले का एक मामला उडुपी में बैदुर के नजदीक एक जगह पर चार्ली चैपलीन की मूर्ति को लेकर उठा. फिल्मकार हेमंत हेगडे ने चैपलीन की एक विशालकाय प्रतिमा का निर्माण शुरू करवाया था कि एक हिन्दू सांस्कृतिक दल के लोग वहां पहुंच गए और यह कह कर प्रतिमा का विरोध शुरू किया कि यह एक इसाई की मूर्ति है और हेगडे को विवेकानंद की मूर्ति बनवानी चाहिए.यह प्रसंग इतना हास्यास्पद है कि अविश्वसनीय लगता है, पर यह खतरनाक रूप से सच है. इस मामले में सम्बन्धित मंत्री ने भी मूर्ति के विरोध से सहमति जताई और कहा कि अगर स्थानीय लोग विवेकानंद की प्रतिमा चाहते हैं तो हर्ज क्या है! आखिर चार्ली चैपलीन का भारत से कोई लेना देना नहीं था! ये मंत्री उसी सरकार के हैं जिसके एक दूसरे मंत्री ने बंगलोर में आधुनिक कला दीर्घा के उद्घाटन के अवसर पर आधुनिक कला को भारतीय संस्कृति का विरोधी बता कर असकी लानत मलामत की औए कुछ कलाकारों के विरोध करने पर उन्हें पुलिस से    कह कर बाहर करवा दिया.

जब समाज में यह स्थिति हो जाए कि आप चार्ली चैप्लीन और विवेकानंद में एक ही चुन सकते हैं और वह चुनाव भी आपका नहीं हो तो यह समझ् लेना चाहिए कि बहुत देर हो चुकी है. इस चुनाव के बाद फिर ऐसा ही पछतावा न करना पडे, इसके लिए हमें अभी से ही कुछ करना, और कहना होगा.

विलंबित, जनसत्ता, अप्रैल, 2009

 

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