उच्चतम न्यायालय की उदारता

उच्चतम न्यायालय ने वरुण गांधी पर राष्ट्रीय सुरक्षा  कानून लगाए जाने के खिलाफ उनके द्वारा दायर की गयी याचिका पर सुनवाई शुरू कर दी है. मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति पी. सथासिवम की पीठ ने सुनवाई शुरू  होते ही पूछा कि क्या उत्तर प्रदेश की सरकार इसे लेकर वाकई गम्भीर है. उसके बाद अखबारी रिपोर्ट के मुताबिक पीठ ने यह सुझाया कि अगर वरुण यह वचन दे दें कि आइंदा वे इस तरह के  भड्काऊ भाषण नहीं देंगे तो उस पर विचार किया जाना चाहिए. आखिर  वे कोई अपराधी नहीं हैं और उनके खिलाफ इतने सख्त कदम की ज़रूरत नहीं थी! वरुण के वकील ने वहीं पर यह कहा कि वे फौरन यह वचन देने को तैयार हैं. बिना अपने मुवक्किल से कोई मशविरा किए कैसे वकील मुकुल रोहतगी ने यह कह दिया, यह एक अलग सवाल है. क्या वे वरुण के उन बयानों से नावाकिफ हैं जो  इस घटना के बाद उन्होने दिए जिनमें पीलीभीत के अपने भाषण पर कायम रहने की बात उन्होने कही है?उनके इस भाषण की हजारों सी.डी. बांटी जा रही हैं , क्या यह जानने के लिए किसी खुफिया एजेंसी की मदद की  दरकार है?

उच्चतम न्यायालय को वचनों और उनके हश्र के इतिहास के लिए बहुत पीछे जाने की मेहनत नहीं करनी पडेगी. आज से सतरह साल पहले इसी न्यायालय में उत्तर प्रदेश के तब के मुख्य मंत्री ने यह वचन दिया था कि बाबरी मसजिद के पास कारसेवा के दौरान मस्जिद को कोई नुकसान नहीं होगा. वचन भंग के चलते उस मुख्य मंत्री को  कोई ऐसा  दंड उच्चतम न्यायालय ने दिया हो  कि आगे से इस तरह का झूठा वचन न दिया जा सके, इसकी  हमें याद नहीं.

उच्चतम न्यायालय के इस निष्कर्ष पर भी हमें हैरानी है कि वरुण कोई अपराधी नहीं हैं. यह  अदालत में सिद्ध होना अभी बाकी है. पीलीभीत में हिन्दुओं के सताएजाने और हिन्दू लडकियों के बलात्कार को उन्होंने जिस तरह मुद्दा बनाया, उससे  उनके आपराधिक इरादे बहुत साफ हो जाते हैं. यह कोई अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता का मामला नहीं है, जैसा वरुण की पार्टी बताने की कोशिश कर रही है. वरुण के भाषण के बाद उनके मां , जो भारतीय जनता पार्टी की नेता हैं और उस पार्टी के अन्य नेताओं के बयान और व्यवहार से भी यह स्पष्ट है कि वरुण का भाषण एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा था जिसकी दूसरी भूमिकाएं अन्य लोगोंऔर संगठनों को निभानी ठी. यह सब कुछ इतनी चतुराई से और इतने खुलेआम किया जा रहा है और इसमें इतने अभिनेता हैं कि कोई एक आपराधिक मामला कानूनी तौर पर बनाया जाना नामुमकिन होगा.

उच्चतम न्यायालय की इस टिप्पणी से कुछ और सवाल उठ खडे हुए हैं. मसलन राष्टीय सुरक्षा के मायने  क्या हैं? जैसा घृणा का प्रचार वरुण के इस तथाकथित भाषण के जरिए किया गया, क्या वह राष्ट्र को एक रखने के रास्ते में बाधा है या नहीं? उच्चतम न्यायालय को इस तरह के घृणा प्रचार का उदाहरण रामजन्मभूमि  अभियान से बेहतर और कहां मिलेगा? नफरत की उस गोलबन्दी ने भारतीय समाज में जो स्थायी विभाजन पैदा किया , क्या उस पर कभी माननीय न्यायमूर्तिगण विचार करेंगे? क्या वे कभी इसे लेकर आत्मचिंतन करेंगे कि 1992 के बाबरी मस्जिद के ध्वंस और उसके बाद हुए खूनखराबे को रोक देने में उनकी कुछ भूमिका हो सकती ठीक जो नहीं निभाई जा सकी!

उच्चतम न्यायालय को शायद यह याद दिलाने कि ज़रूरत नहीं होनी चाहिए कि भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को बनाए रखने का दायित्व सिर्फ सरकार का नहीं, उसका भी है. क्या यह भी बताए जाने कि आवश्यकता है कि उसके फैसलों और उस क्रम में उसकी टिप्पणियों पर जनता के कान  हैं और उनसे वह  अपने नतीजे निकालती  है. हिन्दुत्व की  परिभाषा करने में इसी उच्चतम न्यायालय ने कभी जो उदारता दिखाई उसका परिणाम यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी को अपनी विभाजनकारी राजनीति के लिए एक कानूनी सहारा मिल गया.

वरुण को लेकर उच्चतम न्यायालय की उदारता अन्य लोगों को नसीब नहीं .वरुण के मुकदमे की खबर पढ्ते हुए इसी न्यायालय का एक और दृश्य याद आ गया. दिसंबर, 2007 मे जब बिनायक सेन की जमानत की याचिका लेकर सोली सोराबजी खडे हुए तो उसे ठीक से सुनने  लायक भी नहीं माना गया. यह सवाल बार-बार पूछा गया कि वे तैंतीस बार जेल मे एक माओवादी नेता से मिलने क्यों गऎ, मानो यह बिनायक के ऐसे खतरनाक अपराधी होने का पर्याप्त सबूत है कि उन्हें जमानत भी न दी जाए. यह तथ्य कि यह जानकारी मिलने पर कि पुलिस उन्हें खोज रही है, वे खुद पुलिस के पास गए, भूमिगत नहीं हुए, कि उनका  सार्वजनिक जीवन बिलकुल खुला रहा है और उनके पक्ष पूरी दुनिया के सभ्य शिक्षित समाज के प्रतिनिधि बोल रहे हैं हमारी न्यायव्यवस्था पर कोई असर नहीं डाल पा  रहा है. क्या इसका मतलनब यह है कि न्यायवयवस्था राष्ट्रिय सुरक्षा की पुलिस परिभाषा को ही  कमोबेश मानती है?इसी न्यायव्यवस्था से निकले हुए लोगों से बने मानवाधिकार आयोग के जांच दल ने जिस तरह सलवा जुडुम की आलोचना करने से इनकार कर दिया , उससे भी यही सन्देश मिलता है.

कुछ रोज़ पहले एक और न्यायमूर्ति ने क्रोध भरी टिप्पणी  में मुसलमानों के दाढ़ी रखने और तालिबानीकरण के बीच जो सीधा रिश्ता खोज लिया , उसने भी यह चिंता पैदा की है कहीं हमारी न्यायव्यवस्था उन्हीं पूर्वग्रहों का शिकार तो नहीं , जिनका फायदा राष्ट्रीय् स्वयंसेवक संघ ने उठाया है. वरुण आगे से ऐसे ऐसे भाषण न देने का वचन दे दें और उसके आधार पर उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने से जुडे आरोपों से बरी कर दिया जाए यह उसी पूर्वग्रह के एक दूसरा  पहलू है जिसमें कोई हिन्दू कभी  भी भारतीय राष्ट्र के लिए खतरनाक  हो ही नहीं हो सकता. इसी लिए पूरे देश में मुस्लिम विरोधी घृणा की गोलबन्दी करने वाले लालकृष्ण आडवानी के साथ बैठने में भले नीतीश और उनसे भी भले नवीन पट्नायक को   गुरेज नहीं, खुलेआम मुसलमानों के कत्लेआम को जायज़ ठहरानेवाले नरेन्द्र्मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करने में भारतीय पूंजी के अगुओं को कोई हिचक नहीं और उच्चतम न्यायालय को भी वरुण् के पीलीभीत के भाषण और उसके बाद की घटनाओं के बाद भी उनसे अच्छे व्यवहार का वचन लेने का  सुझाव मामले पर बहस शुरू होने के पहने देने की तत्परता : ये सब धर्मनिरपेक्ष् भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए कोई शुभ संकेत नहीं.

विलंबित, जनसत्ता, अप्रैल, 2009

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