मुक्तिबोध की काव्यभाषा

कहते हैं लोग-बाग बेकार है मेहनत तुम्हारी सब

कविताएं रद्दी हैं.

भाषा है लचर उसमें लोच तो है ही नहीं

बेडौल हैं उपमाएं ,विचित्र हैं कल्पना की तस्वीरें

उपयोग मुहावरों का शब्दों का अजीब है

सुरों की लकीरों की रफ्तार टूटती ही रहती है.

शब्दों की खड़-खड़ में खयालों की भड़-भड़

अजीब समां बांधे है!!

गड्ढों भरे उखड़े हुए जैसे रास्ते पर किसी

पत्थरों को ढोती हुई बैलगाड़ी जाती हो.

माधुर्य का नाम नहीं, लय-भाव-सुरों का काम नहीं

कौन तुम्हारी कविताएं पढ़ेगा

 

 

मुक्तिबोध को प्रायः दुरूह कवि माना जाता रहा है. उनकी भाषा पर  ऊबड़खाबड़पन  , अनगढ़पन  और शब्दबहुलता का आरोप लगाया जाता रहा है. प्राय: उनकी राजनीति के कारण मुक्तिबोध के प्रशंसक भी उनकी भाषा को लेकर असुविधा का अनुभव करते रहे हैं.  इसके पीछे कविता की एक विशेष समझ काम कर रही है जिसके मुताबिक कविता एक तराशी हुई कलाकृति है जिसकी सारी नोकें घिसकर गोल कर दी गई हैं.इस समझ के अनुसार कथा-रचना में तो भाषा में फैलाव हो सकता है लेकिन कविता शब्दों का ऐसा प्रयोग है जो अनिवार्यता के सिद्धांत का पालन करता है. कविता में शब्द ही सबसे पहले है और वही अंतिम भी है,कवि ऐसे ही शब्द चुनता है जिनके बिना उसका काम नहीं चल सकता और जिन्हें दूसरे शब्दों से बदला नहीं जा सकता.हर कविता एक गठी हुई संरचना है, ऐसी इमारत है , जिसका एक-एक शब्द एक-एक ईंट की तरह है,जो खास तरह से एक पर एक जमाई जाती हैं और बीच से उनमें से किसी को खिसका देने से इमारत के भरभरा कर गिरने का खतरा है.  कविता छोटी हो या लम्बी , यह बात दोनों पर लागू होती है.

 

इस समझ के अनुसार कविता एक संरचना और एक शिल्प है. यह भी कि हर कविता एक फ्रेम में कसी रहती है.और वह फ्रेम भी कसा हुआ होता है. वह चूंकि शब्दों की संरचना है, उसके शिल्पत्व की रक्षा के लिए आवश्यक है कि उसके एक-एक शब्द में अर्थगर्भत्व का गुण हो.कवि की चिंता प्रथमतः अर्थ-संप्रेषण की होती है और वह वही होना चाहिए जो उसने सिरजा है,इसलिए भी वह सावधानी बरतता है कि न सिर्फ हर शब्द एक निश्चित अर्थ का संवहन करे,बल्कि शब्दों के बीच का क्रम भी ऐसा ही हो जो हर शब्द की अर्थ-संभावना की रक्षा करे,साथ ही शब्दों के संयोजन –विशेष में भी अस्पष्टता का दोष न आ पाए.दूसरे शब्दों में,कविता के शब्द प्रयोग में फालतूपन से बचा जाना चाहिए.

 

अर्थ सृजन की प्रक्रिया पर ध्यान दें तो फालतूपन उपयोगी नज़र आने लगेगा. बच्ची के भाषा-संसार में आत्मविश्वास हासिल करने की प्रक्रिया बिना उसके चारों ओर शब्दों के जंगल के संभव नहीं. भाषा मात्र शब्द नहीं है, उसके साथ ध्वनियां, प्रयोक्ता की शारीरिक  मुद्राएं और भंगिमाएं जुड़ी हुई हैं. जो वयस्क हैं और भाषा के सांसारिक प्रयोग के अभ्यासी हैं, एक नए भाषा प्रयोक्ता के चारों ओर शब्दों का अम्बार लगा देते हैं. अतिशयता  न सिर्फ बच्चे के, बल्कि  वयस्क  के भाषिक व्यवहार का अनिवार्य गुण है. हम तमाम ऐसी ध्वनियों, मुद्राओं का प्रयोग करते हैं और शब्दों का इतना अधिक  निरर्थक इस्तेमाल भी कि उसमें मात्र अर्थपूर्ण शब्द अल्पसंख्यक हो जाता है. बच्ची इसी अम्बार से अर्थ निकालना सीखती है.फिर प्रश्न यह है कि क्या फालतू सचमुच  फालतू है या वह अर्थ-निर्माण के लिए अनिवार्य  है?

 

या क्या हम यह कहना चाह रहे हैं कि फालतू या अतिरिक्त शब्द दरअसल ऐसी थूनियां हैं , जिनके सहारे एक पौधे को खड़ा किया जाता है और फिर जब वह जड़ पकड़ लेता है तो थूनियां व्यर्थ हो जाती हैं ? और क्या हम ऐसा कह कर यह  नहीं  कह रहे कि एक वयस्क भाषा प्रयोक्ता को  इस शैशवावस्था से निकल आना चाहिए और एक बार भाषा के नियमों की  व्यवस्था , यानी उसके व्याकरण से परिचित हो जाने के बाद सिर्फ ज़रूरी प्रयोग ही करने चाहिए? वयस्क बच्चे जैसी आज़ादी की मांग नहीं कर सकता.उसे व्याकरण का पालन करना ही होगा.

जिसे व्याकरण कहा जाता है,उसमें एक प्रकार की यादृक्षिकता होती ही है. विट्गेंस्टाइन ( ज़ेटेल-58) इस प्रसंग में एक दिलचस्प प्रश्न करते हैं: ‘ऐसा क्यों है कि मैं पाकक्रिया  के नियमों को यादृक्षिक नहीं कहता , और क्यों मैं व्याकरण के नियमों को यादृक्षिक  कहना चाहता हूं?’ इसका उत्तर वे यों प्रस्तावित करते हैं, ‘पाकक्रिया अपने उद्देश्य से परिभाषित होती है,जबकि ‘ बोलने’ के साथ ऐसा नहीं है. यही कारण है कि भाषा-प्रयोग एक मायने में स्वायत्त होता है जिस रूप में पाकक्रिया और प्रक्षालन की क्रियाएं स्वायत्त नहीं हैं. आप खराब ढंग से खाना बनाएंगे अगर आपने सही नियमों की जगह किन्हीं और नियमों का पालन किया, लेकिन अगर आप शतरंज के नियमों के स्थान पर  की जगह किन्हीं अन्य नियमों के अनुसार खेल रहे हैं तो आप कोई और ही  खेल खेल रहे हैं और अगर आप फलां-फलां नियमों की जगह किन्हीं और नियमों का अनुसरण करेंगे तो इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि आप कुछ गलत बोल  रहे हैं,नहीं, आप किसी और चीज़ के बारे में बात कर रहे हैं.”

विट्गेंस्टाइन के अनुसार भाषा किसी एक उद्देश्य-विशेष को पूरा करने वाली व्यवस्था नहीं है. वे उसे एक संग्रह मानते हैं. कविता मात्र के लिए और विशेषकर मुक्तिबोध की कविता के लिए भाषा को संग्रह माने वाली प्रस्तावना का उपयोग किया जा सकता है. चूंकि एक भाषा सिर्फ एक भाषा नहीं है और दूसरे, भाषाएं दूसरी भाषाओं के सान्निध्य में जीवनयापन करती हैं, उनमें से किसी एक रूप में न्यस्त दर्शन को एक सीमा तक ही स्वीकार किया जा सकता है. इसका तात्पर्य यह है कि हर  भाषा में  हमेशा नई भाषा की संभावना छिपी रहती है. इस सम्भावना को कैसे रूपायित किया जाता है?

मुक्तिबोध ने नेमिचंद्र जैन को एक पत्र में लिखा,” मेरे अत्यंत आत्मीय विचार मराठी या अंग्रेज़ी में निकलते थे;जिनका तर्जुमा,यदि अवसर हो,तो हिन्दी में हो जाता था. .. मेरा ख्याल है कि मेरी भाषा सुन्दर न भी हो सके वह सशक्त होकर रहेगी, क्योंकि उसके पीछे अंदर का ज़ोर रहेगा. मुझे साज-संवार की प्रतिष्ठित बोली पसन्द नहीं.” आगे वे अपनी हिन्दी को सक्षम, सप्राण और अर्थ-दीप्त कर पाने की इच्छा व्यक्त करते हैं.मुक्तिबोध की हिन्दी की सहचर भाषाएं मराठी और अंग्रेज़ी थीं, नागार्जुन की मैथिली, संस्कृत और बांग्ला और अज्ञेय की संस्कृत और अंग्रेज़ी और एक हद तक बांग्ला.

भाषा की संभावना की पहचान या तलाश इस समझ के बिना नहीं हो सकती कि उसका प्रयोक्ता भी संभावनाओं का आगार है. साथ ही यह कि उसमें अनिश्चयात्मकता का तत्व ही उसे परिभाषित करता है. इसलिए जब हम कोई योजना बनाते हैं( पुनः विट्गेंस्टाइन) तो सिर्फ इसलिए नहीं कि हमें ठीक तरीके से समझ लिया जाए, बल्कि इसलिए भी कि हम खुद भी उस प्रसंग विशेष के मामले में अपने लिए स्पष्टता चाहते हैं.इसका अर्थ यही हो सकता है कि भाषा अपने संप्रेषणात्मकता के दायित्व से बाधित नहीं की जा सकती, न ही उसे प्रचलित अर्थ में अभिव्यक्ति का माध्यम कहा जा सकता है. वह प्रयोक्ता के लिए भी अर्थ-ग्रहण की प्रक्रिया है. यह कहा जा सकता है कि रचनाकार जिस तलाश में है ,उसके लिए  उपलब्ध अर्थ-संसार में  साधनों या उपकरणों की कमी है.आगे बढ़कर यह भी कहा जा सकता है कि उसकी दिलचस्पी  अर्थ-विशेष की प्राप्ति नहीं, बल्कि अर्थ-सृजन की प्रक्रिया में है. और वह कुछ नया किसी और के लिए नहीं बनाता या हासिल करता  बल्कि हर बार खुद को ही नया उपलब्ध करता है.

अर्थ की तलाश या अर्थ-निर्माण की यात्रा में किसी एक अंतिम बिन्दु पर पहुंच जाने से अधिक संधान पर ज़ोर है.इस यात्रा के क्रम में यात्री,यानी कवि का बदल जाना अनिवार्य है. हर क्षण अपने को बदलता देखने की उत्तेजना उसकी भाषा को भी आश्चर्य के तत्व से संयुक्त करती है. लेकिन यह यात्रा प्रत्येक कवि के लिए एक-सी नहीं होती.काव्य यात्रा का बाहरी संसार की भौगोलिक दूरी तय करने वाली यात्रा से कोई  मेल नहीं लेकिन कहा  जा सकता है कि हर कवि स्वभावतः यात्री नहीं होता. मुक्तिबोध का कविस्वभाव यात्री का था , यह उनकी कविताओं के शिल्प को देख कर आसानी से समझा जा सकता है. बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि वे असमाप्य यात्राओं के यात्री थे.यह किंचित आश्चर्यजनक लग सकता है, उनकी घोषित मार्क्सवादी विचारधारा को देखते हुए,जो समाजों के सफ़र को निश्चित प्रस्थान बिन्दुओं और आगमन बिन्दुओं के बीच समझती और परिभाषित करती है.

मुक्तिबोध स्वयं यात्री नहीं थे. हम कह सकते हैं कि उनकी यात्रा उनके मन के भीतर ही होती रहती थी. उनके समकालीन और दो कवियों से उनकी तुलना करें तो बात कुछ और साफ होती है. अज्ञेय बड़े यायावर थे. भारत और भारत के बाहर उनकी यात्राओं के बारे में हमें पता है. नागार्जुन का तो नाम ही यात्री था.

मुक्तिबोध को बाहरी यात्रा की सुविधा नहीं थी. साहस-यात्राओं की तो बिल्कुल नहीं. उनकी कोई भी यात्रा निरुद्देश्य नहीं हो सकी. हर सफर घरेलू आवश्यकताओं से निर्देशित था.अपने मित्रों को वे इसलिए हसरत से भी देखते हैं. वे अंतत: एक कस्बाई परिवेश में जीवन बिताने को बाध्य हुए. यह नहीं कि बाहर निकलने की उनकी इच्छा न थी. पर हर बार कुछ ऐसा होता रहा कि वे किसी बड़ी जगह से छोटी जगह पर लौट आने को बाध्य हुए. प्रेम-विवाह के बाद बसी गृहस्थी को वे कभी किसी बड़े सामाजिक या कलात्मक लक्ष्य के आगे छोड़ नहीं पाए.1945 में नेमिचन्द्र जैन को एक अन्य पत्र में उन्होंने इस घरेलू कर्तव्य की बाधा के बारे में लिखा, “ क्या ज़रूरी है कि कर्तव्य किया ही जाए, और उस समय आने वाली आपकी याद को बाहर ही खड़ा रख मन के दरवाजे को बन्द कर दिया जाए. कर्तव्य के फलसफे की बात ज़्यादा समझ में नहीं आती.

इसी कर्तव्य ने तो लोगों को पंगु कर दिया है, उनके हृदय के पंख तोड़ कर उसे (उन्हें) अधिक सामान्य बना दिया है.” इस पत्र के आगे के अंश को ध्यान से पढ़ने पर मुक्तिबोध की भाषा की प्रकृति को समझ पाने में सहायता मिलती है, “ सरदी की पारदर्शिनी , हल्की-हल्की चोटें करने वाली यह धूप और उसका ऊष्ण स्पर्श मानों मुझे जगा देता है. मन दैनिक नींद से जाग उठता है. वृक्षों के पत्र सम्भार पर फैलकर उनके गाढ़े हरियाले अंतराल में छाया-प्रकाश उत्पन्न करने वाली यह धूप मन में सपने जगा देती है. कोई विलास- स्वप्न नहीं वरन विजय-स्वप्न. जिन्हें देख लें पुराने मकान की जीर्ण मुंडेर पर बैठकर दूसरे के आंगन में झांकनेवाले लोग- कर्तव्य के पुराने मुहल्ले के बाशिन्दे.” ( मु.र.-6-226)

इस पत्र में, जो एक आत्मीय को लिखा गया है, शब्दों की अतिशयता को लक्ष्य किया जाना चाहिए. मुक्तिबोध काम के रोज़मर्रेपन से ऊब कर जीवन को एक ऊंची सतह पर जाने को व्याकुल हैं. लेकिन यह कहने के लिए उन्हें काफी कुछ कहना होता है. प्रकृति उनके सोचने के पूरे पैटर्न को तय करती है.पत्र में जीवन के शिखर की तलाश के साथ आत्मीयता के लिए आकुलता झलकती है. वाक्- संयम से उनका काम नहीं चलेगा.

30 अक्टूबर, 1945 के पत्र में जैसे इसी बात को वे दुहराते हैं, “सहसा आपकी याद आ रही है, मीठी बयार के औचक जगाने वाले झोंके-सी.” “…. क्षण भर के लिए ही सही, मैं जाग्रत हो उठा हूं तो सहसा यह वाक्य निकल आता है- Lo, there is born a man with a disturbed soul-disturbed with the highest duties of age and the greatest weakness of his times…. न सिर्फ मैं अपनी राह को खोजता हूं बल्कि वह भी मुझे खोजती है… .”

इस पत्र में आत्म-भर्त्सना नहीं है; आत्म-विश्वास है जो इस वाक्यांश से जाहिर होता है कि राह भी मुझे खोजती है. व्यक्ति को यदि अपना समाज खोजना पड़ता है तो हर समाज भी अपना व्यक्ति खोजता है.और वह कोई अमूर्त इकाई नहीं. किसी एक व्यक्ति का व्यर्थ होना किसी समाज के लिए बड़ी हानि है.व्यक्ति के इस मह्त्वबोध के कारण मुक्तिबोध किसी तुच्छता और व्यर्थता बोध  की दलदल में फंसे रहने से बच गए. एक जगह उन्होंने घुटन भरी ज़िन्दगी का जिक्र किया है और लिखा है कि सिनिसिज़्म सेंटिमेंटलिज़्म से अधिक बुरी चीज़ है और यह भी कि सारे रंजोगम के बावजूद ज़िन्दगी से शिकायत नहीं, तकाजा है.

मुक्तिबोध के पत्रों  में बार-बार जग उठने और जाग्रतावस्था में नए स्वप्न देखने का प्रसंग आता है. ये स्वप्न उनके अपने जीवन –यथार्थ को चुनौती देते हैं. यह यथार्थ व्यक्तित्व को छोटा बना देता है,‘दैनिक जीवन के पूर्ण आबद्ध कार्यक्रम में आदर्शवाद की बू तक नहीं रहती. कहीं मन का विस्तार नहीं हो पाता…..मनुष्य का वास्तविक सामर्थ्य और उसकी शक्ति …सो जाती है.” इसके साथ ही यह अह्सास कि, “ .. in a dark unknowable way I am cut off from the people…incapacitated to ‘realize’, to fully feel the lives of others , the concrete emotions of their life, as if I am unable to feel them , as if I cannot partake emotionally in their life.’

दूसरों के जीवन में भावनात्मक भागीदारी न कर पाने की बेचैनी के साथ अपने व्यक्तित्व के पुन:निर्माण की व्यग्रता की जुड़ी हुई है. वे अपने-आप को एक ध्वस्त किले की तरह देखते  हैं,जिसकी हरेक दीवार गिर चुकी है, एक-एक ईंट और पत्थर अलग हो गए हैं और उस मलबे से एक नई इमारत की तामीर की भयानक इच्छा उनके मन के भीतर ज़ोर मारती है, “ I am a demolished castle of romantic associations. Every wall , every part of this huge glorious and gloomy structure has been brought down.” वे लिखते हैं कि उनके भीतर दरअसल आदिम गुफाओं में निवास करने वाला एक शिकारी,बर्बर है जिसे ऐन्द्रिक आनंद और उल्लास प्रिय है.

नेमिचन्द्र जैन के सम्पर्क और मित्रता ने जैसे इस भव्य किले-से व्यक्तित्व में डाइनामाइट लगा कर उसे ध्वस्त कर दिया. इस तरह यह ध्वंस  कोई धीमे-धीमे होने वाला क्षरण न था.

फिर नए मुक्तिबोध  का जन्म कैसा है? इस ध्वस्त किले में नए पेड़-पौधे, नई वनस्पतियां उग रही हैं. आवेगपूर्ण आनंद के गोपनीय कक्ष में नंगी उनके जंघाओं और विस्तृत वक्षवाला पीपल उग आया है. अंदर और बाहर, हर  तरफ नए वृक्ष उग रहे हैं जिससे  ध्वस्त किले में  एक वन्यता और सौन्दर्य भर गया है.एक नया मुक्तिबोध, या नया व्यक्ति पनप रहा है.

‘हरे वृक्ष’ शीर्षक कविता इस पत्र के लिखे जाने के आस-पास की मालूम पड़ती है :

ये हरे वृक्ष

सहचर मित्रों-से हैं बाहें पसार

( ये आलिंगन-उत्सुक बांहें फैली हज़ार)

अपने मर्मर अंगार-राग

से मधु-आवाहन के स्फुलिंग

बिखरा देते हैं बार-बार..

डंस जाती है हृत्तल इनकी यह हरी आग.

यह स्नेहामंत्रण है. अपने को मिटा देने का,किसी विराट् में विलीन कर देने का आवाहन नहीं है. खुद को नया करने करने के लिए आवश्यक है मित्रता, कोई ऐसा जिसमें आपको सुनने की धैर्योत्सुकता हो. जो आपको आत्म-समीक्षा की राह पर ले जाए, लेकिन वह होगा ‘परसुएशन’,न कि भर्त्सना. इसी लिए तो पेड़ से स्फुलिंग बिखर रहे हैं. यह आग दिल के भीतर तक पहुंच जाती है. इसमें जलन  है लेकिन प्रकाश भी है. ध्यान दिया जाना चाहिए कि आग हरी है.नेमिजी को अपने पत्रों में मुक्तिबोध कहते हैं कि उनकी मित्रता ने अपनी स्थिति के प्रति  उनके भीतर भयानक असंतोष पैदा कर दिया है.लेकिन जो आत्म-समीक्षा वे करते हैं,वह आत्म-भर्त्सना नहीं है. वे खुद को कोड़े लगाने वाली आत्म-पीड़ा के सुख में डूबे रहना नहीं चाहते.एक पत्र में वे नेमिचंद्र जैन को कहते हैं कि आत्म-प्रताड़णा को वे अच्छा नहीं मानते.वे न तो अपने प्रति और न ही जीवन के  प्रति कोई शिकायती रवैया रखना चाहते हैं.

यह हरी आग जो “प्राकृत औदार्य-स्निग्ध /पत्तों-पत्तों से” फूट रही है,प्राण की “स्नेह-मुग्ध चेतना” को जाग्रत कर देती है.और उसके कारण ”इस हरी दीप्ति में भभक उठा मेरे उर का व्यापक अभाव”.अभाव छोटा नहीं है,वह व्यापक जीवन-जगत से अपने अलगाव के कारण पैदा हुआ है.यह जो अभाव,या“मन के अन्दर गहरी दरार” है,उसमें चेतना की स्नेह-मुग्धता के कारण “उग आते कुसुम,पत्र,नव-नवल लता, तरु का प्रसार..”

धीरे-धीरे देह ही वृक्ष में परिणत हो जाती है: “चरणों से शिख तक देह वृक्ष /हो गई कि ये अंतर्गामी तरु-मूल वन्य/मेरी जंघाओं से बढ़कर मेरे उर में डालें पसार,/निज आलिंगन-उत्सुक बांहें फैला हज़ार/बन जाते आदिम स्नेह-हरित वेदना-भार.”वेदना का यह भार सुखकर है. हरा इस कविता का  रंग है. क्षितिज के कोने में जो बादल हैं वे हरिताभ हो उठे हैं और फिर आगे आर्द्र अंतर-धरा के गर्भ से “हरी ज्वाला-सा”अंकुर उठता है.स्निग्धता और शक्ति का विलक्षण मेल मुक्तिबोध की भाषा में है : मेरे अंतर के गहन कूल/पर दृढ़ अनुभव-सा बना एक,/मैं अनुभव करता तरु का श्यामल तना एक.” जो अंकुर फूटा है वह सत्य के “अप्रमेय नव-वृक्ष-बाल” सा बढ़ रहा है.अप्रमेय शब्द के प्रयोग को लक्ष्य किया जाना चाहिए. यह जो सत्य का अंकुर फूटा है, जिसके वृक्षत्व में संदेह नहीं है, लेकिन जिसकी बढ़त को मापा नहीं जा सकता.अप्रमेय का एक अर्थ अज्ञेय भी है. सत्य को पूरी तरह जान लेने और उसकी दिशा की भविष्यवाणी करने का दावा मार्क्सवाद की ‘वैज्ञानिकता’ ने किया था. यहां उसका आश्वासन नहीं है. वह शायद बहुत महत्त्वपूर्ण भी नहीं.असल बात है उसका धरती से जुड़ा रहना,“अपनी धरती से /जुड़ा हुआ जंघा-मूलों में दुर्विजेय.” चूंकि वह धरती से जुड़ा हुआ है इसलिए दुर्विजेय भी है.

स्नेह और शक्ति का संयोग या स्नेह के कारण ही शक्ति: “ सुरभित मादक रस-रक्त खींचता सर्व काल.” फिर इस विकसमान वृक्ष का चित्र देखिए: “रस-गर्वपूर्ण/ विश्वास-पुष्ट/दृढ़ भुजस्कन्ध/ उन्मुक्त पत्र, डालें प्रलम्ब/ फैली अबन्ध.” जैसे एक पेड़ सिर्फ एक डाल नहीं है ,वैसे ही मुक्तिबोध का यह वृक्ष जो कि वास्तविक वृक्ष नहीं, एक रूपक मात्र है, अनेक विशेषणों से  ही परिभाषित हो पाता है.यह रस-गर्वपूर्ण, और उसी वजह से विश्वास-पुष्ट है, इसकी भुजाएं और कन्धे मजबूत हैं और इसमें प्रयाप्त फैलाव है, इसके पत्ते उन्मुक्त हैं,डालें बिना किसी रुकावट के फैल रही हैं.

व्यक्तित्व के विकास के इस  रूपक में ताकत है. पहले नेमिचंद्र जैन को लिखे पत्र में व्यक्तित्व के किले के ध्वंस  के  बीच ही नई वनस्पतियों और वृक्षों के फलने –फैलने के मनोरम दृश्य का वर्णन हम देख चुके हैं.एक मजबूत पेड़ के जड़ जमाने का दृश्य उसकी लम्बी, पत्तों से लदी बेतरतीब डालों के बिना पूरा नहीं होता, “इस हृदय- वृक्ष में छायी हैं/घन पत्राच्छादित उत्सुक शाखाएं हज़ार.” असल चीज़ वह शक्ति भी नहीं है. यह वृक्ष हृदय के भीतर से उगा है और वह स्नेहोत्सुक है,“…आलिंगन-अनुभव अपार / उस नग्न वृक्ष की हरित- शीत जंघाओं का/ शाखाओं का, मर्मर रव का/ मानो उत्सुक हो उठा विश्व से स्नेह/ आज फिर  मेरे अंतर.” यह स्नेही हृदय है क्योंकि इसके पास अपार आलिंगन-अनुभव है.

इस छोटी-सी कविता को लगभग पूरा पढ़ने का कारण एक ही है.और वह है मुक्तिबोध की भाषा-योजना को समझना.इसमें विशेषणों का प्राचुर्य ध्यातव्य है: हरे वृक्ष, सहचर मित्र, सहस्र डालें, आलिंगन-उत्सुक बांहें, मधु-आवाहन, अंगार-राग मर्मर, हरी आग,औदार्य-स्निग्ध पत्ते, स्नेह-मुग्ध चेतना, हरी दीप्ति, व्यापक अभाव, गहरी दरार, नव-नवल लता,नया भार,गहन क्षितिज,नील शांत कोना,गहरे हरे मेघ, गहरी तृषा, अंतर्गामी वन्य तरु-मूल, स्नेह-हरित वेदना-भार, दृढ़ अनुभव, श्यामल तना, गभीर गर्भांतराल, हरी ज्वाला, अप्रमेय नव-वृक्ष, मादक रस-रक्त, घन पत्राच्छादित, उत्सुक शाखाएं.

इस छोटी से कविता में हरे रंग की उपस्थिति पर भी ध्यान जाना चाहिए.अक्सर मुक्तिबोध को विषाद और क्षोभ के नीले और श्याम रंगों से जोड़कर देखा जाता रहा  है . यहां हरे के साथ नीला भी जीवन के नएपन और उसके विस्तार को प्रतीकित करता है.

विशेषणों के इस बाहुल्य से, जिसकी चर्चा अभी की गई है, भाषा में अतिशयता और  शब्द बाहुल्य को लेकर मुक्तिबोध में किसी भी प्रकार के संकोच के अभाव का पता चलता है. हेमिंग्वे ने कभी यह इच्छा ज़रूर जाहिर की थी कि बिना विशेषण के उपयोग के एक उपन्यास लिख सकें.लेकिन मुक्तिबोध भाषा के भरेपूरेपन की ऊर्जा का पूरा उपयोग करना चाहते थे. भाषा की मांसलता और उसकी ऐन्द्रिकता की उपेक्षा मुक्तिबोध की राजनीति के विरुद्ध पड़ती. यह भी कहा जा सकता है कि किसी भी कवि के दर्शन या उसकी राजनीति को भाषा के प्रति उसके व्यवहार से ही समझा जा सकता है. नेमिचन्द्र जैन को एक बार उन्होंने लिखा कि वे अपनी कविता में शक्ति का प्रवाह चाहते हैं,इस वजह से भाषा में किसी भी तरह की तराश या सिंगार के पक्ष में नहीं हैं.नामवर सिंह  ने भी उनकी  भाषा की प्राणशक्ति की ओर ध्यान दिलाया है और उसे सृजनशीलता की अनिवार्य शर्त बताया है.उनके अनुसार ‘ मुक्तिबोध की प्राणवान काव्यभाषा उनके प्राणवान कथ्य की प्रति-ध्वनि है.’

मुक्तिबोध के पाठकों के लिए इस ‘प्राणवान’को समझना आवश्यक है. प्राणवान के साथ ही उस चीख या शोर को भी याद रखना आवश्यक है जो मुक्तिबोध की कविताओं का स्वभाव माना जाता है.‘चकमक की चिनगारियाँ’ की ये पंक्तियाँ देखी:

अधूरी और सतही जिन्दगी के गर्म रास्तों पर,

अचानक सनसनी भौंचक

कि पैरों के तलों को काट-खाती काउ-सी यह आग?

…………….

…………..

अनगिन अग्निमय तन-मन व् आत्माएं,

व उनकी प्रश्न-मुद्राएँ,

ह्रदय की द्युति-प्रभाएँ,

जन-समस्याएँ कुचलता चल चल निकलता हूँ.

इसी से, पैर तलुओं में

नुकीला एक कीला तेज़

गहरा गड़ गया औ’ धँस गया इतना

कि ऊपर प्राण-भीतर तक घुसा आया,

……..

व्रणाहत पैर को लेकर

भयानक नाचता हूँ, शून्य

मन  के तीन-छत पर गर.

हर पल चीखता हूँ, शोर करता हूँ

कि वैसी चीखती कविता बनाने में लजाता हूँ

प्रश्न फिर भी यह रहता है कि क्या भाषा के ऐसे प्रयोग से भावों की निश्चित और सटीक अभिव्यक्ति में कोई बाधा तो नहीं पड़ती? दूसरे, क्या यह भाषिक प्रयोग उनके भीतर किसी कलात्मक शक्ति के अभाव की पूर्ति का प्रयास तो नहीं? 1958 में नामवर सिंह ने ही ‘आत्म-संघर्ष के कवि: गजानन माधव मुक्तिबोध’ शीर्षक निबंध में यह शंका जाहिर की थी: ‘मुझे ऐसा लगता है कि मुक्तिबोध जितना बड़ा विषय लेते हैं उसके लिए उनके पास गहरी चिंतनशक्ति तो है परंतु उतनी ही समर्थ कलात्मक शक्ति नहीं है.’

नामवर सिंह जिस कलात्मक शक्ति की बात यहाँ कर रहे हैं, जाहिर है वह कुछ दूसरी तरह की कविताओं में उन्हें दीख पड़ती होगी. उन्होंने उस कलात्मकता को परिभाषित नहीं किया,जिसका अभाव वे मुक्तिबोध में पाते हैं. यह कसौटी किस तरह की कविताओं के आधार पर बनाई गई होगी, यह विचारणीय होना चाहिए.

नेमिचन्द्र जैन के नाम पत्र से ही जाहिर है कि मुक्तिबोध को इस आरोप का अहसास था, तभी तो वे यह कहते हैं कि वे इसकी परवाह नहीं करते कि उनकी भाषा कलात्मक है या नहीं.

अपने एक लेख ‘मुक्तिबोध की कविता की बनावट में”कुंवर नारायण कलात्मकता के इस प्रश्न पर एक अलग ढंग से विचार करते हैं, “अक्सर ऐसा लगता है कि मुक्तिबोध की कविताएँ एक ‘अवलांश’ की तरह लुढ़कती-पुढ़कती, शब्द बटोरती आगे बढ़ती है –किसी ऊबड़-खाबड़ सतह पर सरपट जिसमें एक प्राकृतिक दृश्य की छटा है, पर कसाव और संगठन के लिए धैर्य नहीं. इसलिए शायद बहुधा यह लगता है कि उनकी भाषा में एक भाषायी पैटर्न तो है पर वह संरचना नहीं जिसके पीछे एक ख़ास तरह का सतर्क नियोजन, निदेशन और संयोजन होता है.वे असंगठित लगती हैं; लगती ही नहीं शायद होती भी हैं मानो उन्हें  जानबूझकर इस तरह रचा गया हो कि वे एक उखड़े हुए, बड़बड़ाते यथार्थ के पागलपन का अहसास करा सकें-अपने कथ्य द्वारा ही नहीं, अपने फॉर्म द्वारा भी.”

कुँवर नारायण इसे सुघड़ता की संस्कृति के खिलाफ एक विद्रोह की तरह देखते हैं, जिस सुगढ़ता के पीछे  ऐसी संस्कृति और इतिहास की यादें हैं जिसके पास बारीक कारीगरी, पच्चीकारी के लिए धैर्य और आराम का लंबा सामती समय था. वे मुक्तिबोध की कविताओं में एक ख़ास तरह की झपट भरी जल्दी देखते हैं “कही,कुछ ऐसे आवश्यक को नष्ट हो जाने से बचाने की जल्दी में जिसके साथ आदमीयत के जीवन और मरण का प्रश्न झूल रहा हो?”

यह व्याख्या मुक्तिबोध के प्रति सहानुभूतिशील तो है पर वह खुद कुंवर नारायण के उस ख्याल के मेल में नहीं जिसके मुताबिक़ मुक्तिबोध की कविता को पढ़ने के लिए ‘भारी धैर्य और लंबा समय चाहिए’.यह लंबा समय सामंती न होकर जनतांत्रिक या सर्वहारा का लंबा समय कैसे हो?

मुक्तिबोध की काव्यभाषा में जो अतिरिक्तता है और अनिवार्यता के सिद्धांत का प्रतिकार है वह एक प्रकार से मनुष्यता या मानवीयता के प्रति उनके दृष्टिकोण की ही अभिव्यक्ति है.वह भाषा के भीतर की सारी संभावना को साकार कर लेने की आकांक्षा भी है.

एक उत्पादन व्यवस्था है जो समाज के बहुलांश को मात्र अनिवार्य जीवन जीने की स्थितियां उपलब्ध कराती है.अतिरिक्तपन चंदेक की सुविधा है.लेकिन मनुष्य कुछ नहीं अगर यह अतिरिक्तपन उससे छीन लिया जाए.वह मात्र अनिवार्य जीवन नहीं जीता, सिर्फ उतना ही करके संतुष्ट नहीं रह जाता जितना आवश्यक है.कहा जा सकता है अतिरिक्तता ही मनुष्यता का पारिभाषिक गुण है.यह उसकी अस्तित्वगत विवशता है. इस  कारण ही वह कला या काव्य का सृजन करता है.

संयमित जीवन और संयमित भाषा में क्या कोई रिश्ता है?  ऐसी भाषा जो ऐन्द्रिक अनुभव के संपूर्ण विस्तार और उसकी गहराई को उसके पूरेपन में व्यक्त करने से झिझकती हो,क्या हमारी संकुचित जीवन-स्थिति का ही परिणाम तो नहीं? क्या हम अपने-आप को पूरी ईमानदारी के साथ, खुल कर अभिव्यक्त कर पाते हैं,बिना

इस भय के कि हमें कहीं गलत तो नहीं समझ लिया जाएगा? क्या हमारी भाषा मानवीय दूरियों की भाषा बन पाती है?मानवीय दूरी से तात्पर्य ऐसी दूरी से है जिसे संवाद के माध्यम से पाटा जा सकता है. अभी  हम ऐसे परिवेश में रह रहे हैं, जिसमें हर कोई एक दूसरे से कवच ओढ़कर  या नकाब पहन कर  मिलता है.ऐसी हालत में संवाद,या सच्चा संवाद संभव नहीं हो पाता.

अपने व्यक्तित्व का उतना ही हिस्सा उद्घाटित करना,जितना करना सुरक्षित हो, आज के जीवन की बाध्यता है. मैं आपको ताड़ता रहता हूं, हमेशा जो आपने कहा , उसके पीछे के आशय की खोज में लगा रहता हूं क्योंकि मुझे यह मालूम है कि आपने अपने वास्तविक आशय को छिपा लिया है.अपने सारे राज दे देना बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं. खुद को निष्कवच करके किसी को सौंप देना हिमाकत होगी.इस तरह पूरा समाज ‘डिप्लोमैटिक ऑंनक्लेव्स’ का समूह भर रह जाता है.

संवाद शब्द में एक प्रकार की औपचारिकता है, इसलिए मुक्तिबोध की कविता उसकी जगह बातचीत का प्रस्ताव करती है. यह बातचीत कई बार आतंरिक आलाप भी बन जाती है. या मुखर चिंतन. बातचीत में एक खुलापन है लेकिन एक खतरा भी है.जब मैं अपनेआप को आपके समक्ष अनावृत करता हूं तो आपके भीतर भय भी पैदा करता हूँ. क्या मुझे भी खुद को आपके लिए खोलना देना होगा? क्या बिना इस अपेक्षा के आप मुझसे बात करने को प्रस्तुत हैं?

नेमिचंद्र जैन से पत्राचार कवि मुक्तिबोध के स्वभाव को समझने के लिहाज से उपयोगी है.इस पत्राचार में मुक्तिबोध एक कमज़ोर इंसान के रूप में उभरते हैं. उनका रोज़मर्रापन अपनी साधारणता में प्रकट हो जाता है. उनके पत्रों से ही जाहिर होता है कि जिन्हें वे संबोधित हैं वह उतना प्रगल्भ नहीं है.अनेक पत्र अनुत्तरित भी हैं. फिर भी पत्रों का सिलसिला खत्म नहीं होता. कई बार ऐसा लगता है कि आपका सामना ऐसे व्यक्ति से है जो भावना-ही-भावना है,सरापा संवेदना है. ऐसा भी नहीं कि उसे इसका अहसास नहीं.वह अगर तीव्रता से अनुभव करता है तो अपने हर अनुभव की व्याख्या करने की क्षमता भी है उसके पास. फिर भी जैसे वह किसी और तरीके से सोच भी नहीं पाता. संवेदना के रास्ते ही सोच पाना मुक्तिबोध की विवशता है.और इसमें कवि का संपूर्ण शरीर, उसका स्नायुतंत्र सन्नद्ध रहता है.

अपने मित्र को खींच कर अपने मन के तहखाने में ले जाने में उसे कोई संकोच नहीं.अपने आप को निरावृत करते हुए उसे कोई भय नहीं.इस शिकायत के बाद भी  कि उसका मित्र प्राय: खामोश रहता है, वह बात करना बन्द नहीं कर देता. पत्रों में मुक्तिबोध हीनतर आर्थिक स्थिति में भी नज़र आते हैं. लेकिन इससे उनके स्वर में किसी प्रकार का संकोच नहीं झलकता.

मुक्तिबोध के पत्रों को उनकी कविताओं,कहानियों और निबंधों के साथ मिलाकर पढें, तीनों में ही लिखना एक अविभाज्य क्रिया है.मुक्तिबोध ने तीन अलग रजिस्टर जैसे बनाए ही नहीं है इन भिन्न विधाओं के लिए.कब वे काव्यात्मक हैं,कब गद्यात्मक, कहना कठिन है.उनके लेखन में कौन-सा अंश ज्ञानप्रधान है,कौन सा अंश विचारप्रधान है और कौन-सा भावनाप्रधान,बताना मुश्किल है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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